डिजिटल युग में अफवाहें, पेड प्रमोशन और डर आधारित मार्केटिंग लोकतंत्र व जनस्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा, फेक न्यूज़ एक्ट 2026 की मांग

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मिसिंग पर्सन्स की अफवाहों से बढ़ा सामाजिक भय; सख्त कानून, डिजिटल जवाबदेही और जन-जागरूकता को बताया जरूरी

 -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं 

गोंदिया (महाराष्ट्र)। इक्कीसवीं सदी के डिजिटल युग ने सूचनाओं की अभूतपूर्व शक्ति प्रदान की है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स ने दुनिया को एक-दूसरे से जोड़ा है, लेकिन इसके साथ अफवाहों और फेक न्यूज का संकट भी तेजी से गहराया है। एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी का कहना है कि झूठी, भ्रामक और जानबूझकर फैलाई गई सूचनाएं अब केवल सामाजिक चिंता का विषय नहीं रहीं, बल्कि राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, जनस्वास्थ्य और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की शुचिता से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुकी हैं।

भावनानी के अनुसार अफवाहों का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि वे अक्सर सच का भ्रम पैदा कर देती हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर वायरल सामग्री भावनाओं को भड़काने, डर फैलाने और पूर्वाग्रहों को मजबूत करने का काम करती है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में यह प्रवृत्ति सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर सकती है, जबकि वैश्विक स्तर पर नस्लीय तनाव और कूटनीतिक संबंधों पर भी इसका प्रभाव देखा गया है।

उन्होंने कहा कि फेक न्यूज का सीधा असर सामाजिक सौहार्द पर पड़ता है। सांप्रदायिक अफवाहें, एडिटेड वीडियो और संदर्भ से काटे गए बयान कई बार हिंसा और सामाजिक तनाव का कारण बनते हैं। पिछले वर्षों में सोशल मीडिया संदेशों के कारण भीड़ हिंसा और टकराव की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाती हैं।

मिसिंग पर्सन्स की अफवाहें: भय बनाम तथ्य

भावनानी ने मिसिंग पर्सन्स को लेकर फैल रही चर्चाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ समय पहले मुंबई में भी इस तरह की अफवाहें फैली थीं, लेकिन पुलिस के तथ्यों और चेतावनियों के बाद स्थिति स्पष्ट हो गई। अब दिल्ली में लापता व्यक्तियों के आंकड़ों को लेकर फिर भय का माहौल बन रहा है। एक रिपोर्ट में 2026 के पहले 15 दिनों में 800 से अधिक लोगों के लापता होने का दावा किया गया, हालांकि यह स्पष्ट नहीं था कि इनमें से कितने मामले पारिवारिक विवाद, स्वेच्छा से घर छोड़ने या गलत रिपोर्टिंग से जुड़े थे।

आंकड़ों के विश्लेषण के हवाले से उन्होंने कहा कि दिल्ली में मिसिंग पर्सन्स की रिकवरी दर लगभग 77 प्रतिशत है, जो कई अंतरराष्ट्रीय महानगरों की तुलना में बेहतर मानी जाती है। पुलिस अधिकारियों ने भी हालिया मामलों को पिछले वर्षों के औसत के अनुरूप बताते हुए अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की है।

लोकतंत्र और जनस्वास्थ्य पर प्रभाव
भावनानी का मानना है कि चुनावों के दौरान फेक न्यूज मतदाताओं की सोच को प्रभावित कर चुनावी निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगा सकती है। कई देशों में संगठित भ्रामक अभियानों और विदेशी हस्तक्षेप तक की पुष्टि हो चुकी है।

जनस्वास्थ्य के संदर्भ में उन्होंने कोविड-19 महामारी का उदाहरण देते हुए कहा कि झूठी सूचनाओं ने वैक्सीन को लेकर डर पैदा किया, खतरनाक घरेलू नुस्खों को बढ़ावा दिया और स्वास्थ्य प्रणालियों पर अविश्वास फैलाया, जिससे जानमाल की क्षति हुई।

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और पेड प्रमोशन का एंगल

उन्होंने कहा कि व्हाट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म अफवाहों के बड़े वाहक बन चुके हैं। एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन, अनियंत्रित फॉरवर्डिंग और एल्गोरिदम आधारित प्रमोशन झूठी खबरों को तेजी से फैलाते हैं। कई इन्फ्लुएंसर्स और पेज डरावनी सामग्री फैलाकर व्यूज, एंगेजमेंट और पेड प्रमोशन हासिल करते हैं, जिसे उन्होंने “डर आधारित मार्केटिंग स्ट्रेटेजी” बताया।

फेक न्यूज़ एक्ट 2026 की आवश्यकता

भावनानी ने एक विशिष्ट और सख्त कानून “फेक न्यूज़ एक्ट 2026” बनाने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि इसमें अफवाहों की स्पष्ट परिभाषा, जानबूझकर झूठ फैलाने वालों के लिए दंडात्मक प्रावधान और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय होनी चाहिए। साथ ही, इस वैश्विक समस्या से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और साझा नियामक ढांचे की भी आवश्यकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि केवल कानून पर्याप्त नहीं होगा। डिजिटल और मीडिया साक्षरता, स्कूलों और समुदायों में जागरूकता अभियान तथा जिम्मेदार नागरिक भागीदारी अफवाहों के खिलाफ मजबूत ढाल बन सकती है।

अंत में भावनानी ने चेतावनी दी कि अफवाहें एक मौन लेकिन शक्तिशाली हथियार बन चुकी हैं, जो लोकतंत्र, जनस्वास्थ्य और सामाजिक सौहार्द को कमजोर कर रही हैं। उनके अनुसार सख्त कानून, मजबूत डिजिटल नियमन और व्यापक जन-जागरूकता के समन्वय से ही इस चुनौती पर प्रभावी नियंत्रण संभव है।

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Author: Bharat Sarathi

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