डिजिटल प्रदूषण : बचपन पर मंडराता संकट

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सोशल मीडिया पर लगाम की तैयारी, गाजियाबाद घटना बनी बहस का ट्रिगर पॉइंट — एक वैश्विक विश्लेषण

— एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया। वैश्विक डिजिटल युग ने मानव सभ्यता को अभूतपूर्व तकनीकी प्रगति प्रदान की है, लेकिन इसके समानांतर सामाजिक मूल्यों, रिश्तों और मानसिक संतुलन पर गहराता संकट भी स्पष्ट रूप से उभर रहा है। हजारों वर्षों में विकसित पारिवारिक संरचनाएं और सामूहिक चेतना आज सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग की तीव्र रफ्तार के सामने असहज दिखाई दे रही हैं। यह परिवर्तन न पूरी तरह नकारात्मक है और न ही पूर्णतः सकारात्मक, किंतु समस्या तब गंभीर हो जाती है जब समाज, विशेषकर बच्चे, इसके मनोवैज्ञानिक और नैतिक प्रभावों के लिए तैयार नहीं होते।

भारत जैसे देश में, जहां आध्यात्मिक परंपरा, पारिवारिक मूल्य और सामाजिक सहभागिता जीवन की आधारशिला रहे हैं, वहां डिजिटल प्लेटफॉर्म का अनियंत्रित विस्तार एक चेतावनी संकेत बनकर सामने आया है। सामाजिक सद्भाव और आपसी विश्वास, जो भारतीय समाज की रीढ़ माने जाते हैं, अब आभासी प्रतिस्पर्धा, तुलना, घृणा और गलत सूचना के दबाव में प्रभावित हो रहे हैं।

सामाजिक ताने-बाने पर सोशल मीडिया का दोहरा प्रभाव

सोशल मीडिया ने एक ओर लोगों को जोड़ने और सूचना के त्वरित आदान-प्रदान का सशक्त माध्यम दिया है, वहीं दूसरी ओर इसने पारंपरिक सामाजिक ढांचे को कमजोर भी किया है। आर्थिक सर्वेक्षण में सोशल मीडिया के सामाजिक प्रभावों पर चिंता जताया जाना इस बात का संकेत है कि यह मुद्दा अब केवल नैतिक बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नीति-निर्माण और भविष्य की पीढ़ियों की सुरक्षा से सीधे जुड़ गया है।

स्पष्ट है कि समाधान केवल सरकारी नीतियों से संभव नहीं। समाज, शैक्षणिक संस्थान, सिविल सोसायटी और विशेष रूप से माता-पिता की भूमिका यहां निर्णायक है। सरकार दिशा और नियंत्रण दे सकती है, लेकिन बच्चों के जीवन में डिजिटल संतुलन लाना सामूहिक प्रयास से ही संभव होगा।

गाजियाबाद की घटना : राष्ट्रीय बहस का ट्रिगर

गाजियाबाद में सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग की लत से जुड़ी बताई जा रही तीन सगी बहनों की आत्महत्या की दुखद घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस घटना को बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर सख्त नियमों की आवश्यकता के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण ट्रिगर माना जा रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण-2026 में पहले ही डिजिटल प्रदूषण और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर चिंता व्यक्त की जा चुकी है।

केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी सचिव ने भी संकेत दिए हैं कि सोशल मीडिया के लिए न्यूनतम आयु सीमा तय करने का मुद्दा समीक्षा के दायरे में है और इस संबंध में विभिन्न हितधारकों से परामर्श जारी है।

ऑनलाइन गेमिंग : मनोरंजन से मानसिक दबाव तक

आज का बच्चा ऐसे डिजिटल परिवेश में बड़ा हो रहा है जहां स्क्रीन उसकी पहली खिड़की बन चुकी है। ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया अब केवल मनोरंजन के साधन नहीं रहे, बल्कि वे बच्चों की सोच, भावनाओं और आत्म-छवि को आकार देने लगे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, जब आभासी दुनिया वास्तविक जीवन से अधिक महत्वपूर्ण लगने लगती है, तब मानसिक जोखिम कई गुना बढ़ जाते हैं। हार का डर, असफलता की शर्म और आभासी स्वीकृति की लालसा आत्म-सम्मान और भावनात्मक संतुलन को गहराई से प्रभावित करती है।

ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण : वैश्विक बहस तेज

इन खतरों को देखते हुए ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए टिकटॉक, एक्स, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, स्नैपचैट और थ्रेड्स जैसे प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। नए अकाउंट पर रोक के साथ कई मौजूदा प्रोफाइल भी निष्क्रिय किए गए।

यह कदम एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करता है—क्या बच्चों की सुरक्षा के लिए डिजिटल स्वतंत्रता को सीमित करना अब अनिवार्य हो गया है? कई देश इस मॉडल का अध्ययन कर रहे हैं।

भारत में बढ़ती डिजिटल लत

भारत में भी डिजिटल एडिक्शन के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। गाजियाबाद और भोपाल जैसी घटनाएं इस खतरे की गंभीरता को रेखांकित करती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट आने वाली पीढ़ियों के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

हालांकि अभी कोई आधिकारिक प्रतिबंध लागू नहीं है, लेकिन 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर सख्त नियमों को लेकर गंभीर मंथन जारी है। यह मुद्दा केवल तकनीकी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मानव पूंजी और सामाजिक स्थिरता से भी जुड़ा है।

मुनाफा बनाम नैतिक जिम्मेदारी

सोशल मीडिया और गेमिंग कंपनियां एल्गोरिदम के माध्यम से उपयोगकर्ताओं को अधिक समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने का प्रयास करती हैं। इससे मुनाफा बढ़ता है, लेकिन बच्चों के संदर्भ में यह रणनीति जोखिमपूर्ण हो सकती है। आयु-सत्यापन, कंटेंट फिल्टर और सुरक्षित डिजिटल ढांचे की कमी समस्या को और जटिल बनाती है।

विशेषज्ञों का मत है कि कंपनियों को सामाजिक जिम्मेदारी को अपने व्यावसायिक मॉडल का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा।

माता-पिता, स्कूल और समाज की साझा जिम्मेदारी

पूर्ण प्रतिबंध सरल समाधान प्रतीत हो सकता है, लेकिन व्यवहार में यह जटिल है। तकनीक को पूरी तरह रोकना संभव नहीं, परंतु सख्त नियम, समय सीमा, आयु-आधारित एक्सेस और प्रभावी कंटेंट मॉडरेशन उपयोगी उपाय साबित हो सकते हैं।

माता-पिता बच्चों की पहली सुरक्षा दीवार हैं। डिजिटल गतिविधियों पर संतुलित निगरानी, स्क्रीन टाइम सीमित करना और खुला संवाद आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। स्कूलों में डिजिटल एडिक्शन पर काउंसलिंग और जागरूकता कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए। खेल, कला, संगीत और सामाजिक गतिविधियां बच्चों को आभासी दबाव से बाहर निकालने में सहायक हो सकती हैं।

संतुलन ही समाधान

डिजिटल युग को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन उसे विवेक और संवेदनशीलता के साथ अपनाया जा सकता है। बच्चों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक विकास को प्राथमिकता देना सरकार, उद्योग, परिवार और समाज—सभी की साझा जिम्मेदारी है।

सवाल यह नहीं कि तकनीक रहे या न रहे, बल्कि यह है कि तकनीक किसके नियंत्रण में और किस उद्देश्य से रहे। यदि आज संतुलित और साहसी निर्णय नहीं लिए गए, तो इसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ सकती है।

संकलनकर्ता / लेखक – कर विशेषज्ञ | स्तंभकार | साहित्यकार | अंतरराष्ट्रीय लेखक | चिंतक | कवि | संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया, महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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