मासिक धर्म स्वास्थ्य पर सुप्रीम निर्णय के निहितार्थ

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

 डॉ.वेदप्रकाश……असिस्टेंट प्रोफेसर
किरोड़ीमल कालेज,दिल्ली विश्वविद्यालय   

नारी सृष्टि है। संतान के रूप में बच्चे को जन्म देकर वह इस सृष्टि चक्र को निरंतरता प्रदान करती है। मासिक धर्म संतान उत्पत्ति हेतु तो विशेष है ही, यह महिलाओं के स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यह एक प्राकृतिक और जैविक प्रक्रिया है। एक अवस्था में मासिक धर्म का आरंभ होना और एक अवस्था तक इसकी निरंतरता किसी भी महिला के अच्छे स्वास्थ्य और गर्भधारण की क्षमता का संकेत देती है। किसी भी स्वस्थ महिला में मासिक धर्म की प्रक्रिया लगभग 5 से 6 दिन चलती है। इसमें शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं और गर्भाशय आंतरिक रूप से स्वच्छ और स्वस्थ होता है। महिलाओं में मासिक धर्म यह भी सुनिश्चित करता है कि प्रजनन अंग स्वस्थ हैं और ठीक से काम कर रहे हैं। हमारा शरीर हार्मोनल संतुलन से चलता है। हारमोंस का घटना या बढ़ता उसे अस्वस्थ बनाता है। महिलाओं में मासिक धर्म उनके शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे आवश्यक हार्मोन्स को नियंत्रित रखता है।

मासिक धर्म महिलाओं के शरीर से अतिरिक्त आयरन और टॉक्सिन्स को बाहर निकालता है, जिससे उनका स्वास्थ्य बेहतर होने में सहायता मिलती है।

यह विडंबना ही है कि महिला स्वास्थ्य से जुड़े हुए इस प्रकार के महत्वपूर्ण विषय को समाज में कई बार हीनता की भावना एवं घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। जानकारी के अभाव में मासिक धर्म की स्थिति में सेनेटरी नैपकिन के स्थान पर गंदे कपड़े अथवा अस्वस्थ तरीके अपनाए जाते हैं। कम उम्र की बेटियों को इस विषय में समुचित जानकारी न होने के कारण कई बार अपमान भी झेलना पड़ता है। घर की समझदार और उम्र में बड़ी महिलाएं भी उन्हें ठीक प्रकार से जानकारी देने के स्थान पर डांटती- फटकारती हैं। आज भी देश में कुछ स्थानों पर मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को रसोई अथवा घर के अन्य लोगों से अलग रखा जाता है। ऐसी स्थिति में कई बार महिलाओं को मानसिक तनाव एवं प्रताड़ना भी झेलनी पड़ती है। जानकारी न होने के कारण महिलाएं लंबे समय तक एक ही सैनेटरी नैपकिन का प्रयोग करती हैं। यह अस्वस्थ प्रेक्टिस है। सेनेटरी पैड को समय-समय पर बदलना अनिवार्य है। ऐसा न होने की स्थिति में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। मासिक धर्म के दौरान पौष्टिक भोजन एवं समुचित देखभाल आवश्यक है। इसके अभाव में स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं। सकारात्मक यह भी है कि देश के कुछ प्रदेश ऐसे भी हैं जहां पर पहली बार मासिक धर्म की सूचना मिलने पर परिवारों में उत्सव मनाया जाता है।    

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल जाने वाली लड़कियों के मासिक धर्म स्वास्थ्य  पर अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने मासिक धर्म स्वास्थ्य को जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा बताते हुए शहरों व गांवों के निजी एवं सरकारी स्कूलों में लड़कियों को मुफ्त सेनेटरी पैड मुहैया कराने के आदेश दिए हैं। साथ ही कहा है कि स्कूल जाने वाले सभी लड़कियों व लड़कों के लिए अलग-अलग शौचालय बनाए जाएं और उनमें साबुन व निरंतर पानी की व्यवस्था की जाए। 126 पृष्ठ के फैसले में माननीय न्यायाधीशों ने कई दिशा निर्देश जारी किए हैं। पीठ ने मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता को जीवन के अधिकार और मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा के अधिकार से जोड़ते हुए कहा है कि मासिक धर्म स्वच्छता उत्पादों की अनुपलब्धता लड़कियों की गरिमा को ठेस पहुंचाती है। मासिक धर्म स्वास्थ्य संविधान के अनुच्छेद 21 में मिले जीवन के मौलिक अधिकार के अंतर्गत आता है।     

निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐतिहासिक है क्योंकि आज भी देश के अनेक हिस्सों में स्कूलों में शौचालय ही नहीं हैं। कहीं शौचालय हैं तो उनमें पानी नहीं है। कहीं पानी है तो उनमें दरवाजे नहीं हैं। इस दृष्टि से देश के सरकारी स्कूलों की स्थिति बेहद खराब है। अनेक स्कूलों में न तो कूड़ेदान हैं और न ही कूड़े के प्रबंधन के लिए ढांचागत सुविधाएं। कई बार बजट की कमी के कारण ये ढांचागत सुविधाएं तैयार नहीं हो पाती तो कई बार इन सुविधाओं के लिए मिला बजट भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। कभी जांच पड़ताल होती है तो फिर ढाक के तीन पात यानी स्थिति फिर बदहाल ही बनी रहती है। अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने प्रत्येक स्कूल में आक्सो बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन निशुल्क उपलब्ध करवाने और उनके मानकों के अनुरूप होने की बात कही है।

 आदेश में यह भी महत्वपूर्ण है कि प्रत्येक स्कूल में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन स्थल स्थापित हो। जहां अतिरिक्त अंत: वस्त्र, अतिरिक्त यूनिफॉर्म, डिस्पोजल बैग, मासिक धर्म से संबंधित आपात स्थितियों से निपटने के अन्य सामान उपलब्ध हों। सभी स्कूलों में सैनेटरी नैपकिन के निपटान के लिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि नवीनतम सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल के मुताबिक सुरक्षित स्वच्छ पर्यावरण अनुकूलन तंत्र हो। शौचालय में एक ढका हुआ कूड़ेदान होना चाहिए और उसकी नियमित सफाई सुनिश्चित की जाएगी। न्यायालय ने विशेष यह भी कहा है कि एनसीईआरटी और राज्य अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद को लिंग संवेदनशील पाठ्यक्रम शामिल करना होगा ताकि मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़े कलंक व वर्जनाओं को दूर किया जा सके।

   ध्यातव्य है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में स्कूल से ड्रॉप आउट विषय पर गंभीरता से विचार हुआ है। क्योंकि वहां यह माना गया है कि कक्षा 5 से 8 के बाद नामांकित छात्रों का एक महत्वपूर्ण अनुपात शिक्षा प्रणाली से बाहर हो जाता है। इसलिए यह ड्रॉप आउट न हो इसके लिए प्रयास किए जाएंगे। वहां लिखा है- ड्रॉपआउट रोकने के लिए प्रभावी और पर्याप्त बुनियादी ढांचा प्रदान किया जाएगा ताकि सभी छात्रों को इसके माध्यम से प्री प्राइमरी स्कूल से कक्षा 12 तक सभी स्तरों पर सुरक्षित और आकर्षक स्कूली शिक्षा प्राप्त हो सके। विडंबना यह है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लागू होने के बाद लंबे समय बीतने पर भी अभी अनेक विद्यालयों में पर्याप्त बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं है। अनेक विद्यालयों में बच्चों को मजबूरन खुले में बैठकर पढ़ना पड़ता है। लघु शंका आदि के लिए भी शौचालय न होने के कारण वे खुले में ही लघु शंका के लिए जाते हैं। क्या यह स्थिति एक संवेदनशील समाज के लिए और विद्यालय जैसे स्थान के आसपास के वातावरण के लिए लज्जाजनक नहीं है?

 यद्यपि पूर्व में भी कई बार मासिक धर्म स्वास्थ्य को लेकर चर्चाएं हुई हैं, राष्ट्रीय राजधानी और देश के महानगरों में इस विषय पर बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सेमिनार भी आयोजित किए जाते हैं लेकिन उसके व्यवहारिक स्वरूप पर अर्थात ढांचागत अनिवार्यताओं पर कभी ध्यान नहीं दिया जाता। माननीय सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला महिलाओं के स्वास्थ्य की दिशा में निर्णायक सिद्ध होगा। यदि यह फैसला समुचित रूप में और सही प्रकार से लागू होगा तो इससे विद्यालयों से ड्रॉप आउट रेट में भी कमी आएगी। सराहनीय यह भी है कि पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने लड़कियों की निजता से संबंधित इस विषय पर विस्तार से आदेश देते हुए शासन-प्रशासन के साथ-साथ पूरे देश को विचार करने का संदेश अभी दिया है।
    आइए , मासिक धर्म लज्जा व घृणा का नहीं, गर्व का विषय है, इस भाव से लड़के- लड़कियों व समाज को जागरूक करें।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

Leave a Comment

और पढ़ें