यूजीसी प्रमोशन ऑफ़ इक्विटी रेग्युलेशंस 2026 पर सुप्रीम कोर्ट की रोक

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क्या झूठी शिकायतों पर दंड का अभाव सामाजिक न्याय को सामाजिक विभाजन में बदल देगा?

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया। सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा अधिसूचित प्रमोशन ऑफ़ इक्विटी रेग्युलेशंस 2026 के क्रियान्वयन पर रोक लगाते हुए केंद्र सरकार को इन नियमों को दोबारा ड्राफ़्ट करने के निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने प्रथम दृष्टया इन नियमों में अस्पष्टता और दुरुपयोग की गंभीर आशंका जताई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक नए सिरे से संतुलित और स्पष्ट मसौदा प्रस्तुत नहीं किया जाता, तब तक 2012 के पूर्ववर्ती नियम ही प्रभावी रहेंगे

यह आदेश ऐसे समय आया है, जब ठीक एक दिन पहले 28 जनवरी 2026 को संसद के बजट सत्र के प्रथम दिन राष्ट्रपति के अभिभाषण में यह दावा किया गया था कि वर्ष 2014 में जहाँ सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ केवल 25 करोड़ नागरिकों तक सीमित थीं, वहीं आज लगभग 95 करोड़ भारतीय सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आ चुके हैं। एक ओर यह सरकारी दावा है, तो दूसरी ओर शिक्षा क्षेत्र में समानता और सुरक्षा के नाम पर सामाजिक असंतोष खुलकर सामने आ रहा है।

उच्च शिक्षा: केवल ज्ञान नहीं, संवैधानिक जिम्मेदारी भी

भारत का उच्च शिक्षा तंत्र केवल डिग्रियाँ बाँटने वाला ढाँचा नहीं है, बल्कि यह संविधान के मूल्यों—समानता, न्याय और मानव गरिमा—का वाहक भी है। यूजीसी इस व्यवस्था का केंद्रीय नियामक निकाय है, जिसके बनाए नियम लाखों छात्रों, शिक्षकों और प्रशासकों के जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।

13 जनवरी 2026 को अधिसूचित और 15 जनवरी से प्रभावी किए गए यूजीसी प्रमोशन ऑफ़ इक्विटी रेग्युलेशंस 2026 का घोषित उद्देश्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पहली बार ओबीसी समुदाय को उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव से संरक्षण देना है। उद्देश्य निस्संदेह संवैधानिक है, किंतु इसके क्रियान्वयन में किए गए दो संशोधनों ने देशव्यापी संवैधानिक, कानूनी और नैतिक बहस को जन्म दे दिया है।

देशभर में विरोध क्यों? मुद्दा आरक्षण नहीं, प्रक्रिया है

इन नियमों के लागू होते ही बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान सहित कई राज्यों में सवर्ण समाज के संगठनों द्वारा विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह विरोध आरक्षण के विरुद्ध नहीं, बल्कि कानूनी प्रक्रिया में असमानता और झूठी शिकायतों पर दंड के पूर्ण अभाव के खिलाफ है।

आलोचकों का कहना है कि ये नियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) और प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) की मूल भावना को कमजोर करते हैं।

पहला संशोधन: ओबीसी को संरक्षण—ऐतिहासिक लेकिन अधूरा संतुलन

यूजीसी का पहला बड़ा संशोधन यह है कि अब ओबीसी समुदाय के छात्र और शिक्षक भी जातिगत भेदभाव के औपचारिक संरक्षण दायरे में आ गए हैं। यह सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि ओबीसी समुदाय आज भी शिक्षा संस्थानों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भेदभाव का सामना करता है।

लेकिन विवाद इस बात पर नहीं है कि ओबीसी को सुरक्षा क्यों दी गई, बल्कि इस बात पर है कि सुरक्षा का ढाँचा एकतरफा क्यों बना दिया गया। यदि किसी जनरल कैटेगरी के छात्र या शिक्षक पर एससी, एसटी या ओबीसी से जुड़े व्यक्ति द्वारा भेदभाव का आरोप लगाया जाता है, तो उसके खिलाफ तत्काल संस्थागत प्रक्रिया शुरू हो जाती है—
जाँच, निलंबन, प्रशासनिक कार्रवाई और सामाजिक बदनामी।
यह प्रक्रिया उसके करियर और प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुँचा सकती है, भले ही वह अंततः निर्दोष ही क्यों न साबित हो।

दूसरा और सबसे विवादास्पद संशोधन: झूठी शिकायतों पर दंड का पूर्ण अभाव

यूजीसी विनियम 2026 का सबसे गंभीर और विवादास्पद प्रावधान यह है कि यदि कोई शिकायत झूठी या दुर्भावनापूर्ण पाई जाती है, तब भी शिकायतकर्ता के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी

पहले के नियमों और कई विश्वविद्यालयीय आचार संहिताओं में कम से कम अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान मौजूद था। अब उसे पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। आलोचकों के अनुसार यह प्रावधान कानूनी दुरुपयोग को संस्थागत वैधता देता है।

किसी जनरल कैटेगरी के व्यक्ति पर आरोप लगते ही वह दोषी सिद्ध होने से पहले ही सामाजिक अपराधी मान लिया जाता है। उसकी नौकरी, शोध, पदोन्नति और सामाजिक प्रतिष्ठा सब कुछ दांव पर लग जाता है। लेकिन यदि वर्षों बाद वह निर्दोष सिद्ध होता है, तब भी न्याय अधूरा रह जाता है, क्योंकि झूठा आरोप लगाने वाले पर कोई जवाबदेही तय नहीं होती

सुप्रीम कोर्ट का संकेत: सामाजिक न्याय संतुलन से ही संभव

सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन नियमों पर रोक यह स्पष्ट संकेत देती है कि सामाजिक न्याय का अर्थ किसी एक वर्ग को पूर्ण संरक्षण और दूसरे को पूर्ण असुरक्षा में डालना नहीं हो सकता। न्याय तभी न्याय होता है, जब उसमें सुरक्षा के साथ जवाबदेही भी हो

यदि झूठी शिकायतों पर दंड का प्रावधान नहीं जोड़ा गया, तो आशंका है कि ये नियम सामाजिक न्याय को मजबूत करने के बजाय सामाजिक विभाजन और अविश्वास को और गहरा करेंगे।

निष्कर्ष

यूजीसी प्रमोशन ऑफ़ इक्विटी रेग्युलेशंस 2026 का उद्देश्य प्रशंसनीय है, लेकिन उद्देश्य की पवित्रता तभी सार्थक होगी, जब प्रक्रिया न्यायपूर्ण, संतुलित और द्विपक्षीय हो।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप एक अवसर है—सरकार और यूजीसी के लिए—कि वे ऐसे नियम बनाएँ जो संरक्षण भी दें और दुरुपयोग से भी बचाएँ
अन्यथा, सामाजिक न्याय का यह प्रयास इतिहास में एक और सामाजिक टकराव के रूप में दर्ज हो सकता है।

-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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