11 विधानसभा सीटों वाले अहीरवाल में वर्चस्व की जंग तेज, BJP नेतृत्व की चुप्पी को लेकर सियासी हलकों में अटकलें
गुरुग्राम/रेवाड़ी। अहीरवाल की राजनीति में दशकों से कायम राव इंद्रजीत सिंह के एकछत्र प्रभाव को पहली बार उनके ही राजनीतिक कुनबे से खुली चुनौती मिल रही है। नायब सैनी सरकार में कैबिनेट मंत्री राव नरबीर सिंह और पूर्व मंत्री डॉ. अभय सिंह यादव अब बिना किसी लाग-लपेट के, नाम लेकर, केंद्रीय राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह और उनकी बेटी, हरियाणा सरकार में मंत्री आरती राव पर सीधा हमला बोल रहे हैं।
यह टकराव सिर्फ व्यक्तिगत बयानबाजी नहीं, बल्कि 11 विधानसभा सीटों वाले अहीरवाल क्षेत्र में वर्चस्व की लड़ाई का संकेत माना जा रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इतनी खुली जुबानी जंग के बावजूद भाजपा नेतृत्व की खामोशी राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर रही है।
छोटे दिल वाला’, ‘अहीर समाज का ठेकेदार’—नाम लेकर हमले
राव इंद्रजीत पर अब तक परोक्ष आलोचना होती थी, लेकिन हालिया बयानों में भाषा और तेवर दोनों बदले हुए हैं।
रविवार को गुरुग्राम में कैबिनेट मंत्री राव नरबीर सिंह ने कहा—
“राव इंद्रजीत पर उम्र का तकाजा है। वे पुरानी बातें भूल गए हैं। मेरा राजनीतिक जीवन ही उन्हें हराकर शुरू हुआ। 26 साल की उम्र में जाटूसाना जाकर मैंने उन्हें उनके गढ़ में हराया था।”
वहीं डॉ. अभय सिंह यादव ने राव इंद्रजीत को “छोटे दिल वाला” और “अहीर समाज का ठेकेदार” बताते हुए कहा कि अहीरवाल में अब किसी एक परिवार का राज स्वीकार नहीं किया जाएगा।
BJP की चुप्पी: मौन स्वीकृति या रणनीतिक संकेत?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव यूं ही नहीं चल रहा।
दक्षिण हरियाणा की राजनीति पर नजर रखने वाले पॉलिटिकल एनालिस्ट नरेश चौहान कहते हैं—
“यह माना जा सकता है कि भाजपा अब राव इंद्रजीत को धीरे-धीरे साइडलाइन करने की रणनीति पर काम कर रही है। तभी उनके सबसे बड़े विरोधी राव नरबीर सिंह को खुली छूट दिखाई दे रही है।”
पिछले कई महीनों से राव इंद्रजीत की हर गतिविधि मीडिया और सोशल मीडिया में चर्चा में है, लेकिन इसके बावजूद पार्टी की ओर से अनुशासनात्मक कार्रवाई का अभाव इस धारणा को मजबूत करता है।
यह सिर्फ बयानबाजी नहीं, अहीरवाल के ‘बड़े नेता’ की जंग
हरियाणा की राजनीति पर चर्चित पुस्तक ‘द पॉलिटिक्स ऑफ चौधर’ के लेखक वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सतीश त्यागी मानते हैं कि— “रामपुरा हाउस का प्रभाव अहीरवाल में तीन पीढ़ियों से रहा है। राव नरबीर और राव इंद्रजीत के परिवारों की प्रतिद्वंद्विता पुरानी है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह लड़ाई खुलकर सामने आ गई है।”
उनके अनुसार,
- राव नरबीर अहीरवाल में खुद को सबसे प्रभावी भाजपा नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।
- डॉ. अभय सिंह यादव राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।
- और राव इंद्रजीत अपने प्रभाव के क्षरण को लेकर आक्रामक हो गए हैं।
राव इंद्रजीत क्यों बदले तेवर में हैं?
राजनीतिक जानकार इसके पीछे तीन बड़े कारण गिनाते हैं—
1. रिटायरमेंट और उत्तराधिकार की चिंता
75 वर्ष की उम्र में राव इंद्रजीत अब पहले जैसी चुप्पी नहीं साध रहे। वे सार्वजनिक रूप से बेटी आरती राव को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बता चुके हैं।
2. 2024 के बाद की टीस
लगातार चुनाव जीतने के बावजूद मुख्यमंत्री न बन पाने की कसक अब उनके बयानों में दिखने लगी है। वे दक्षिण हरियाणा को “उचित राजनीतिक इनाम” न मिलने की बात कह चुके हैं।
3. वर्चस्व पर सीधी चोट
नरबीर और अभय द्वारा उन्हें ‘आउटडेटेड’ साबित करने की कोशिशों ने उन्हें और मुखर कर दिया है।
डॉ. अभय सिंह यादव: तीसरा ध्रुव
पूर्व IAS अधिकारी और नांगल चौधरी से विधायक रह चुके डॉ. अभय सिंह यादव अब इस संघर्ष में तीसरे बड़े खिलाड़ी के रूप में उभर रहे हैं। वे खुद को राव इंद्रजीत के विकल्प के तौर पर पेश करने की कोशिश में हैं और खुलकर उनके ‘राजघराना प्रभाव’ पर सवाल उठा रहे हैं।
पार्टी क्या बोलेगी?
इस पूरे घटनाक्रम पर पहली औपचारिक प्रतिक्रिया भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मोहन लाल बड़ौली की आई है। दिल्ली में उन्होंने कहा— “पार्टी इस पूरे मामले का संज्ञान लेगी। राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया पूरी होते ही संबंधित नेताओं को बुलाकर बातचीत की जाएगी।”
निष्कर्ष
अहीरवाल में चल रही यह जुबानी जंग महज व्यक्तिगत अहंकार की लड़ाई नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर नेतृत्व परिवर्तन, क्षेत्रीय संतुलन और भविष्य की रणनीति का संकेत है।
अब नजर इस बात पर है कि पार्टी हाईकमान इसे यूं ही बहने देता है या फिर अहीरवाल की राजनीति में कोई बड़ा फैसला लेता है।








