जल्दबाज़ी और अपारदर्शी मतदाता पुनरीक्षण से करोड़ों मतदाताओं के मताधिकार पर संकट

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• जूरी की चेतावनी: सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर ‘वास्तविक और गंभीर’ खतरा

• SIR प्रक्रिया को तत्काल रोकने, पुनर्विचार और परिवर्तन की मांग

दिल्ली, 14 जनवरी 2026 – मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) पर एक प्रतिष्ठित जूरी ने एक विस्तृत और चिंताजनक आकलन प्रस्तुत किया है। जूरी ने चेतावनी दी है कि यह प्रक्रिया बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित किए जाने का एक “वास्तविक और गंभीर” खतरा पैदा कर रही है और इसे अपने वर्तमान स्वरूप में तुरंत रोका जाना चाहिए।

इस जूरी में सुप्रीम कोर्ट के दो सेवानिवृत्त न्यायाधीश — न्यायमूर्ति ए. के. पटनायक और न्यायमूर्ति मदन लोकुर — के साथ वरिष्ठ पत्रकार पामेला फिलिपोस, अर्थशास्त्री डॉ. ज्यां द्रेज और प्रख्यात राजनीतिक चिंतक प्रो. निवेदिता मेनन शामिल थीं।

जूरी ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण आवश्यक है, लेकिन उसकी वैधता पूरी तरह इस बात पर निर्भर करती है कि वह प्रक्रिया निष्पक्ष, सटीक और समावेशी हो। जूरी के शब्दों में: “बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित किए जाने की संभावना वास्तविक और गंभीर है… इन बुनियादी शर्तों को पूरा करने के लिए SIR प्रक्रिया पर पुनर्विचार और उसका परिवर्तन आवश्यक है, और तब तक, अंतरिम रूप से, इसे रोका जाना चाहिए।”

यह निष्कर्ष जूरी ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की रक्षा पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में प्राप्त गवाहियों के आधार पर निकाला। यह सम्मेलन 20 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में भारत जोड़ो अभियान (BJA), नेशनल एलायंस ऑफ पीपल्स मूवमेंट्स (NAPM) और पीपल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़ (PUCL) द्वारा आयोजित किया गया था।

नौ राज्यों (असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, गोवा और  तमिलनाडु) से प्रभावित नागरिकों और समूहों की गवाही सुनने के बाद जूरी ने पाया कि SIR को जल्दबाज़ी में, असंगत तरीके से और आवश्यक प्रक्रियात्मक सुरक्षा के बिना लागू किया गया है, जो चुनावी कानूनों और संविधान की भावना का उल्लंघन करता है।

जूरी द्वारा पहचानी गई संरचनात्मक खामियाँ: जूरी ने SIR की रूपरेखा और क्रियान्वयन में कई गंभीर त्रुटियाँ चिन्हित कीं:

* दस्तावेज़ी प्रमाणों पर अत्यधिक निर्भरता और 2003 की मतदाता सूची से जोड़ने की शर्त आम नागरिकों — खासकर प्रवासी, गरीब और अस्थायी आवास में रहने वालों — पर असंगत बोझ डालती है।

* कृषि मज़दूरों और प्रवासी कामगारों की बड़ी संख्या इसलिए बाहर रह गई क्योंकि गणना उनके काम के व्यस्त मौसम में की गई जब वे अपने घरों से बाहर थे।

* झुग्गी बस्तियों में रहने वाले, विस्थापित लोग, वन समुदाय और ध्वस्तीकरण से प्रभावित नागरिक पता और दस्तावेज़ खोने के कारण व्यवस्थित रूप से बाहर कर दिए गए।

* मुस्लिम, विमुक्त जनजातियाँ, आदिवासी और ट्रांसजेंडर समुदाय विशेष रूप से इस प्रक्रिया के दिखाई देते हैं।

* महिला मतदाताओं की संख्या में अचानक और असामान्य गिरावट देखी गई है, क्योंकि विवाह के बाद अधिकांश महिलाएँ माता–पिता से जुड़े दस्तावेज़ प्रस्तुत नहीं कर पातीं।

* EPIC डेटा में त्रुटियाँ और स्वचालित विलोपन के कारण पूरे परिवारों के नाम एक साथ हटाए गए।

* शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता जैसे फ्रंटलाइन कर्मचारी लंबे समय तक आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं से हटाकर इस प्रक्रिया में लगाए गए, जबकि बूथ लेवल अधिकारियों पर अत्यधिक दबाव डाला गया।

* कई बुज़ुर्ग नागरिकों को मतदाता सूची में ग़लती से “मृत” घोषित कर दिया गया, जिससे उनकी पेंशन और अन्य अधिकार भी छिन गए।

जूरी की पूरी रिपोर्ट संलग्न है और भारत जोड़ो अभियान की वेबसाइट पर उपलब्ध है। https://www.bharatjodoabhiyaan.com/event-details/national-convention-on-defending-universal-adult-franchise

भारत जोड़ो अभियान (BJA), NAPM और PUCL जूरी के इस गंभीर और सिद्धांतपरक मूल्यांकन के लिए उनका आभार व्यक्त करते हैं और भारत के चुनाव आयोग तथा भारत सरकार से आग्रह करते हैं कि वे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की रक्षा के लिए इन निष्कर्षों पर तुरंत कार्रवाई करें।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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