मकर संक्रांति पर सूर्योपासना से प्रसन्न होते हैं नारायण

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— वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक

भारत पर्वों और परंपराओं की भूमि है। यहाँ प्रत्येक पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, खगोल और जीवन-दर्शन से जुड़ा हुआ एक गहन संदेश देता है। इन्हीं महापर्वों में मकर संक्रांति का विशेष स्थान है। यह पर्व वैदिक काल से चला आ रहा है और आज भी देश के प्रत्येक प्रांत में विभिन्न नामों और परंपराओं के साथ श्रद्धा एवं उल्लास से मनाया जाता है।

मकर संक्रांति को ऋतु पर्व भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन भगवान सूर्य उत्तरायण होते हैं। शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण काल को देवताओं का ब्रह्म मुहूर्त माना गया है, जो साधना, तप, उपासना तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत श्रेष्ठ काल है। सूर्य उपासना के लिए यह दिन विशेष फलदायी माना गया है। हिंदू धर्म में सूर्य को प्रधान देवता का स्थान प्राप्त है, जो जीवन, ऊर्जा, अनुशासन और निरंतर प्रगति की प्रेरणा देते हैं।

ज्योतिष एवं मुहूर्त ग्रंथों के अनुसार गृहप्रवेश, देव-प्रतिष्ठा, यज्ञ, हवन तथा अन्य मांगलिक कार्यों के लिए उत्तरायण काल को सर्वोत्तम कहा गया है। यहां तक कि महाभारत में भी भीष्म पितामह द्वारा उत्तरायण की प्रतीक्षा कर प्राण त्यागने का उल्लेख मिलता है, जो इस काल की महत्ता को दर्शाता है।

15 जनवरी को मनाई जाएगी मकर संक्रांति

इस वर्ष मकर संक्रांति का पावन पर्व 15 जनवरी, गुरुवार को मनाया जाएगा। मकर संक्रांति उन गिने-चुने पर्वों में से है, जिनका निर्धारण सूर्य की गति के आधार पर होता है। जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है, तभी मकर संक्रांति होती है। पंचांग के अनुसार इस बार सूर्य 15 जनवरी को मकर राशि में प्रवेश करेंगे।

शास्त्रों में मकर संक्रांति के पुण्यकाल को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। इस दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक पुण्यकाल रहेगा। इसी के साथ शिशिर ऋतु में सूर्य का उत्तरायण प्रवेश होता है। शास्त्रों में दक्षिणायन को असुरों का और उत्तरायण को देवताओं का काल कहा गया है, इसलिए उत्तरायण को विशेष पुण्यदायी समय माना जाता है।

गंगासागर स्नान और दान का विशेष महत्व

मकर संक्रांति पर गंगासागर में स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। कोलकाता से लगभग 150 किलोमीटर दूर स्थित गंगासागर वह पवित्र स्थल है, जहां गंगा का सागर से मिलन होता है। यहां स्थित भगवान कपिलमुनि का प्राचीन मंदिर और विशाल मेला इस पर्व की आध्यात्मिक महत्ता का प्रतीक है।

इस दिन तीर्थस्थलों पर नाभि तक जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। संन्यासी और गृहस्थ—दोनों के लिए इस दिन स्नान, दान और जप-तप विशेष फल प्रदान करता है। चावल, दाल, खिचड़ी, तिल, गुड़, फल, ऊनी वस्त्र और मेवा का दान श्रेष्ठ माना गया है।

जिन लोगों का व्यापार मंदी से गुजर रहा हो या जो मानसिक तनाव से ग्रस्त हों, उन्हें इस दिन गौशालाओं में अपने वजन के बराबर हरी घास और गुड़ का दान करना चाहिए। इससे आर्थिक और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनिदेव से वैर भूलकर उनके घर गए थे। इसलिए इस दिन किया गया स्नान, दान और पूजा हजार गुना फल देने वाला माना गया है। इसी दिन मलमास की समाप्ति के साथ शुभ कार्यों का आरंभ भी हो जाता है।

पतंग महोत्सव का वैज्ञानिक पक्ष

मकर संक्रांति को ‘पतंग महोत्सव’ के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन पतंग उड़ाने की परंपरा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य से भी जुड़ी हुई है। सर्दियों में सूर्य के प्रकाश में कुछ समय बिताने से शरीर को आवश्यक विटामिन-डी मिलता है, जो हड्डियों, त्वचा और संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है।

मकर संक्रांति वास्तव में सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति का पर्व है, जो हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देता है।

— वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक …… संगठन सचिव, षडदर्शन साधुसमाज, गोविन्दानंद आश्रम, पिहोवा

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Author: Bharat Sarathi

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