मकर संक्रांति : भारतीय संस्कृति का शाश्वत महापर्व

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सुरेश गोयल ‘धूप वाला’

भारतीय संस्कृति पर्वों और उत्सवों की जीवंत परंपरा है। यहाँ प्रत्येक पर्व केवल उल्लास का अवसर नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन, प्रकृति से संवाद और आत्मचिंतन का सशक्त माध्यम है। इन्हीं पर्वों में मकर संक्रांति का विशेष और विशिष्ट स्थान है। यह पर्व सूर्य, प्रकृति और मानव जीवन के गहरे व शाश्वत संबंधों को उजागर करता है। मकर संक्रांति मात्र एक तिथि या धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन, सकारात्मक ऊर्जा और नवजीवन का प्रतीक है।

मकर संक्रांति का खगोलीय महत्व अत्यंत विशिष्ट है। इस दिन सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे उत्तरायण कहा जाता है। उत्तरायण का तात्पर्य है—अंधकार से प्रकाश की ओर, नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर अग्रसर होना। शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन माना गया है। महाभारत में भीष्म पितामह द्वारा उत्तरायण की प्रतीक्षा इस पर्व के गहरे आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित करती है।

यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि जीवन में कितनी ही कठिनाइयाँ क्यों न हों, अंधकार के बाद प्रकाश निश्चित है। सूर्य का उत्तर दिशा में गमन इस बात का प्रतीक है कि मानव जीवन भी निराशा, आलस्य और हताशा को त्यागकर कर्म, तप और सकारात्मक चिंतन की ओर अग्रसर हो सकता है।

मकर संक्रांति का सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप भी अत्यंत व्यापक है। भारत के विभिन्न प्रांतों में यह पर्व भिन्न-भिन्न नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है—उत्तर भारत में मकर संक्रांति, पंजाब में लोहड़ी, तमिलनाडु में पोंगल, असम में भोगाली बिहू, महाराष्ट्र में तिलगुल, कर्नाटक में संक्रांति और गुजरात में उत्तरायण। नाम भले ही अलग हों, किंतु भाव एक ही है—प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और जीवन के प्रति उल्लास

इस पर्व पर तिल और गुड़ का विशेष महत्व है। तिल शक्ति और स्वास्थ्य का प्रतीक है, तो गुड़ मधुरता और सौहार्द का। “तिलगुल घ्या, गोड गोड बोला” केवल एक कहावत नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का संदेश है—कटुता छोड़कर मधुर संबंधों को अपनाने का आह्वान। दान-पुण्य, स्नान, जप-तप और सूर्योपासना जैसे संस्कार भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा हैं, जो मकर संक्रांति पर विशेष रूप से दृष्टिगोचर होते हैं।

कृषि प्रधान भारत में मकर संक्रांति किसानों के सम्मान और आशा का पर्व है। नई फसल के आगमन पर किसान सूर्य और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। यह पर्व श्रम की गरिमा और अन्नदाता के महत्व को ससम्मान स्थापित करता है। पतंग उड़ाने की परंपरा भी इसी उल्लास और स्वतंत्रता की भावना का प्रतीक है—जो आकाश की ऊँचाइयों को छूने की मानवीय आकांक्षा को दर्शाती है।

आज के भौतिकवादी युग में मकर संक्रांति का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह पर्व हमें प्रकृति से जुड़ने, संतुलित जीवन अपनाने और आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने का अवसर देता है। यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है।

अतः मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का वह महापर्व है, जो धर्म, विज्ञान, समाज और प्रकृति—चारों को एक सूत्र में बाँधता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जब सूर्य अपनी दिशा बदल सकता है, तो मानव जीवन भी नई दिशा और नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ सकता है।
यही मकर संक्रांति की सबसे बड़ी सीख और सबसे बड़ा उत्सव है।

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Author: Bharat Sarathi

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