आचार्य डॉ. महेन्द्र शर्मा ‘महेश’, पानीपत

संक्रांति मूलतः सूर्य पर्व है, जो प्रत्येक माह सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करने पर घटित होता है। संक्रांति को छोड़कर सनातन धर्म के लगभग सभी पर्व चंद्रमा की गति के आधार पर निर्धारित होते हैं।
सूर्य प्रतिदिन लगभग 1 अंश की गति से आगे बढ़ते हैं, जबकि चंद्रमा की दैनिक गति लगभग 12 अंश होती है। एक अंश की अवधि चार मिनट मानी जाती है। इस प्रकार सूर्य की प्रतिदिन की गति लगभग 4 मिनट तथा चंद्रमा की गति लगभग 48 मिनट होती है। इसी कारण शुक्ल और कृष्ण पक्ष में तिथि, नक्षत्र, योग और करण का निर्माण होता है।
वार का निर्धारण एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक होता है।
चंद्र तिथि और सौर (प्रविष्टे) तिथि के मध्य प्रतिदिन लगभग 48 मिनट का अंतर रहता है। उदाहरण स्वरूप यदि किसी दिन सूर्योदय और चंद्रोदय दोनों प्रातः 6 बजे (0°) हों, तो अगले दिन सूर्योदय 6:04 बजे तथा चंद्रोदय लगभग 6:48 बजे होगा। इसी गणना से पक्षों का निर्माण होता है, जब 15 दिनों में चंद्रमा 180° की यात्रा पूर्ण करता है।
चंद्रमा प्रत्येक मास में शुक्ल और कृष्ण पक्ष के माध्यम से कुल 360° की यात्रा करता है, जबकि सूर्य एक मास में लगभग 30° और एक वर्ष में 360° की परिक्रमा पूर्ण करते हैं। इसी कालगणना के आधार पर पंचांग का संचालन होता है, जिसमें तिथियों की वृद्धि और क्षय स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसी कारण पर्वों की तिथियों और उनके स्वरूप में समय-समय पर परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है।
मकर संक्रांति और एकादशी: भिन्न प्रकृति, समान श्रद्धा
मकर संक्रांति और षड्तिला एकादशी विपरीत प्रकृति के पर्व हैं।
संक्रांति पर अन्नदान द्वारा ग्रहों के संतुलन का विधान है, जबकि एकादशी व्रत चंद्रमा से संबंधित होकर मन की वृत्तियों और इंद्रियों के संयम का पर्व है। एकादशी पर अन्न ग्रहण निषिद्ध है।
शास्त्रों में श्राद्ध नियमों में भी इसका समाधान मिलता है। यदि किसी दिवंगत की श्राद्ध तिथि एकादशी को पड़ती है, तो एकादशी के दिन फलाहार से श्राद्ध किया जाता है तथा द्वादशी को अन्नदान द्वारा श्राद्ध पूर्ण किया जाता है।
गृहस्थों को द्वादशी के दिन एकादशी व्रत के पारण की अनुमति है, क्योंकि सृष्टि का उद्भव भी अन्नमय कोश से माना गया है।
दान-विधान का शास्त्रसम्मत समाधान
14 जनवरी 2026 को जब मकर संक्रांति और षड्तिला एकादशी एक ही दिन पड़ रहे हों, तो—
- संक्रांति के दिन मानसिक संकल्प लेकर
- फल, कुट्टू, सांवक, तिल, वस्त्र आदि का दान करें।
- अगले दिन 15 जनवरी (द्वादशी) को
- एकादशी व्रत का पारण करते हुए
- अन्न, वस्त्र, घी, ऋतु फल एवं दक्षिणा का दान करें।
गत 82 वर्षों में यह संयोग कोई पहली बार नहीं है। वर्ष 1946, 1952, 1960, 1979, 1984 और 2003 में भी मकर संक्रांति और एकादशी का ऐसा द्विपर्व संयोग बन चुका है।
संक्रांति के साथ अमावस्या या पूर्णिमा का एक ही दिन होना भी असामान्य नहीं है; यह वर्ष में एक-दो बार घटित होता ही है। किंतु जब संक्रांति के साथ कोई बड़ा पर्व जुड़ता है, तब अनावश्यक भ्रम उत्पन्न किया जाता है।
निष्कर्ष
सनातन धर्म की महानता नियमन और शास्त्रसम्मत समाधान में निहित है। ऐसा कोई प्रश्न नहीं है, जिसका समाधान शास्त्रों में उपलब्ध न हो। श्रद्धा और विधि के साथ दोनों व्रतों का पालन करने से ही पूर्ण फल की प्राप्ति होती है।
मकर संक्रांति और षड्तिला एकादशी सभी के लिए शुभ एवं कल्याणकारी हों।







