मानव स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिकी तंत्र पर एक समग्र अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण
आधुनिक कृषि की अदृश्य कीमत— अल्पकालिक उत्पादन लाभ के लिए दीर्घकालिक प्राकृतिक संसाधनों का बलिदान आत्मघाती है
“रासायनिक खादों का संकट केवल कृषि का मुद्दा नहीं है; यह मानव स्वास्थ्य, पर्यावरणीय सुरक्षा, खाद्य संप्रभुता और भावी पीढ़ियों के अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है।”
— एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

हरित क्रांति से हरित संकट तक
बीसवीं सदी की हरित क्रांति को मानव इतिहास की सबसे बड़ी कृषि उपलब्धियों में गिना गया। रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और उन्नत बीजों के व्यापक उपयोग ने अकाल से जूझती दुनिया को खाद्य आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर किया।
लेकिन इक्कीसवीं सदी में यही कृषि मॉडल अब वैश्विक पर्यावरणीय, स्वास्थ्य और पारिस्थितिक संकट का रूप ले चुका है।
आज रासायनिक खादों का अंधाधुंध प्रयोग मिट्टी की उर्वरता, भूजल की शुद्धता, भोजन की पोषण गुणवत्ता और जैव विविधता—इन चारों आधार स्तंभों को एक साथ कमजोर कर रहा है। यह संकट किसी एक देश तक सीमित नहीं, बल्कि एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका—हर महाद्वीप पर इसके दुष्परिणाम स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।
मिट्टी: केवल माध्यम नहीं, एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र
मिट्टी केवल फसल उगाने का माध्यम नहीं, बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिक प्रणाली है, जिसमें अरबों सूक्ष्मजीव, केंचुए, फफूंद और जीवाणु सक्रिय रहते हैं। यही जीव मिट्टी को भुरभुरा बनाते हैं, पोषक तत्वों का चक्र चलाते हैं और पौधों को प्राकृतिक रूप से पोषण उपलब्ध कराते हैं।
नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश आधारित रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग इस संतुलन को नष्ट कर देता है। लगातार रसायनों के प्रयोग से मिट्टी की जैविक कार्बन सामग्री घटती है, जल धारण क्षमता कम होती है और मिट्टी कठोर, निर्जीव तथा बंजर बनने लगती है।

अंतरराष्ट्रीय मृदा विज्ञान संगठनों के अनुसार, विश्व की लगभग 33 प्रतिशत कृषि भूमि पहले ही किसी न किसी रूप में क्षरण का शिकार हो चुकी है। भारत, चीन और अमेरिका जैसे कृषि प्रधान देशों में मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत तेजी से समाप्त हो रही है।
रासायनिक खेती का दुष्चक्र
रासायनिक खादों का सबसे घातक प्रभाव मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों पर पड़ता है। नाइट्रोजन स्थिर करने वाले जीवाणु, माइकोराइजा फफूंद और जैविक अपघटक जीव निष्क्रिय हो जाते हैं या नष्ट हो जाते हैं।
परिणामस्वरूप मिट्टी अपनी आत्मनिर्भरता खो देती है और किसान और अधिक रसायनों पर निर्भर हो जाता है—एक ऐसा दुष्चक्र, जिससे बाहर निकलना अत्यंत कठिन हो जाता है।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) चेतावनी दे चुका है कि यदि यही प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले दशकों में विशाल कृषि क्षेत्र जैविक रूप से मृत हो सकते हैं।
भूजल प्रदूषण: अदृश्य लेकिन घातक संकट
रासायनिक खादों का बड़ा हिस्सा पौधों द्वारा अवशोषित नहीं हो पाता और वर्षा व सिंचाई के साथ रिसकर भूजल में मिल जाता है। नाइट्रेट और फॉस्फेट जैसे तत्व पेयजल को जहरीला बना देते हैं।
भारत के इंदौर में जहरीला जल पीने से हुई मौतों की घटना इस संकट की भयावहता का संकेत है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, नाइट्रेट-प्रदूषित जल से ब्लू बेबी सिंड्रोम, कैंसर और अन्य दीर्घकालिक रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
यूरोप के नीदरलैंड्स और फ्रांस, तथा अमेरिका के “डेड ज़ोन” इस बात के अंतरराष्ट्रीय प्रमाण हैं कि कृषि रसायनों का असर खेतों तक सीमित नहीं, बल्कि नदियों, झीलों और समुद्रों तक फैलता है।
जहरीला भोजन और गिरता पोषण स्तर

रसायनों के अत्यधिक प्रयोग से फसलें भले ही देखने में आकर्षक हों, लेकिन उनकी पोषण गुणवत्ता घटती जा रही है। साथ ही उर्वरकों और कीटनाशकों के अवशेष भोजन में बने रहते हैं, जो मानव शरीर में जमा होकर कैंसर, मधुमेह, हार्मोन असंतुलन और तंत्रिका तंत्र संबंधी बीमारियों को जन्म देते हैं।
अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी (IARC) कई कृषि रसायनों को संभावित कार्सिनोजेन की श्रेणी में रख चुकी है। यह एक “साइलेंट पैंडेमिक” है, जो धीरे-धीरे समाज की स्वास्थ्य संरचना को खोखला कर रहा है।
जैव विविधता पर प्रहार और मानव अस्तित्व का प्रश्न
रासायनिक खेती से केंचुए, कीट, परागण करने वाले जीव, पक्षी और जलीय जीव तेजी से विलुप्त हो रहे हैं। पारिस्थितिकी तंत्र का यह असंतुलन अंततः मानव जीवन को ही संकट में डालता है।
समाधान: जैविक खाद और टिकाऊ खेती ही भविष्य
इस वैश्विक संकट का समाधान रासायनिक खेती में नहीं, बल्कि जैविक खाद, हरी खाद, कंपोस्ट, वर्मी-कंपोस्ट और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों में निहित है। ये मिट्टी को पुनर्जीवित करती हैं, जल प्रदूषण रोकती हैं और सुरक्षित व पोषक भोजन प्रदान करती हैं।
यूरोपीय संघ की Farm to Fork Strategy, भारत की प्राकृतिक खेती पहल और अफ्रीका में एग्रो-इकोलॉजी आंदोलन इस दिशा में आशाजनक संकेत हैं।
निष्कर्ष
रासायनिक खादों पर आधारित कृषि मॉडल अल्पकालिक उत्पादन तो बढ़ा सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण और सभ्यता—तीनों के लिए आत्मघाती सिद्ध हो रहा है। अब समय आ गया है कि नीति निर्माता, किसान और उपभोक्ता मिलकर टिकाऊ कृषि को विकल्प नहीं, अनिवार्यता के रूप में अपनाएँ।
संकलनकर्ता / लेखक: एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी विशेषज्ञ स्तंभकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, साहित्यकार
गोंदिया, महाराष्ट्र







