— सुरेश गोयल ‘धूप वाला’

हाल के दिनों में सिरसा जिले से सामने आई दो हृदयविदारक घटनाओं ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। एक ओर सिरसा में लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे एक प्रेमी युगल ने ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली, वहीं दूसरी ओर ऐलनाबाद (सिरसा) में लिव-इन में रह रहे एक अन्य जोड़े ने कीटनाशक पीकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। ये दोनों घटनाएँ एक ही दिन की हैं, परंतु इनके पीछे छिपा संदेश केवल दो परिवारों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आखिर ऐसी घटनाएँ बढ़ क्यों रही हैं? और क्या लिव-इन रिलेशनशिप वास्तव में आधुनिक स्वतंत्रता का प्रतीक है या सामाजिक विघटन की ओर बढ़ता हुआ एक खतरनाक कदम?
स्वतंत्रता के नाम पर असुरक्षा
लिव-इन रिलेशनशिप को आज की तथाकथित आधुनिक जीवनशैली का प्रतीक बताया जा रहा है। इसमें बिना विवाह के युवक-युवती का साथ रहना ‘निजी स्वतंत्रता’ और ‘व्यक्तिगत निर्णय’ के अधिकार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। कानून भी कुछ परिस्थितियों में इसे स्वीकार करता दिखाई देता है। किंतु यह स्वतंत्रता बाहर से जितनी आकर्षक लगती है, भीतर से उतनी ही खोखली और असुरक्षित भी है।
भारतीय संस्कृति बनाम लिव-इन संस्कृति
भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि से लिव-इन संबंध सर्वथा अस्वीकार्य रहे हैं। हमारे सामाजिक इतिहास में बिना विवाह के साथ रहने की परंपरा नहीं रही। विवाह केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि एक पवित्र संस्कार है—जो केवल दो व्यक्तियों को नहीं, बल्कि दो परिवारों, दो संस्कारों और दो पीढ़ियों को जोड़ता है। इसके विपरीत, लिव-इन संबंध सुविधा और इच्छा पर आधारित होते हैं, जिनमें न स्थायित्व होता है, न उत्तरदायित्व।
सामाजिक दबाव और मानसिक टूटन
लिव-इन संबंधों का पहला दुष्प्रभाव सामाजिक स्तर पर दिखाई देता है। परिवार और समाज की नकारात्मक दृष्टि से ऐसे जोड़े निरंतर मानसिक दबाव में रहते हैं। सामाजिक स्वीकृति के अभाव में आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती है, जिससे तनाव, अकेलापन और अवसाद जन्म लेता है। भारतीय समाज, जहाँ परिवार और समाज जीवन का आधार हैं, वहाँ यह टकराव और भी घातक सिद्ध होता है।
मनोवैज्ञानिक अस्थिरता की खतरनाक सच्चाई

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी लिव-इन संबंध अत्यंत अस्थिर होते हैं। साथ रहने के शुरुआती दिनों का आकर्षण और तथाकथित ‘हनीमून पीरियड’ शीघ्र समाप्त हो जाता है। इसके बाद रोजमर्रा की अपेक्षाएँ, टकराव और मतभेद सामने आने लगते हैं। जब एक पक्ष स्थायी प्रतिबद्धता चाहता है और दूसरा केवल स्वतंत्रता, तब संबंध असुरक्षा की ओर बढ़ता है। ब्रेकअप की स्थिति में यही असुरक्षा गहरे अवसाद में बदल जाती है।
चंडीगढ़ के एक अस्पताल में मात्र दो महीनों में 15 युवतियों का अवसाद का इलाज इस भयावह सच्चाई की ओर संकेत करता है।
युवतियों पर पड़ता असमान बोझ
लिव-इन संबंधों में युवतियाँ विशेष रूप से अधिक प्रभावित होती हैं। समाज में उन्हें अधिक प्रश्नों, आरोपों और अस्वीकृति का सामना करना पड़ता है। कई मामलों में लिव-इन के बाद विवाह से इनकार या अंतरजातीय विवाह की अस्वीकृति युवतियों को मानसिक रूप से तोड़ देती है। हाल ही में सामने आए एक मामले में तीन वर्षों तक साथ रहे जोड़े के ब्रेकअप ने युवती को गंभीर अवसाद की स्थिति में पहुँचा दिया।
कानूनी अस्पष्टता और भविष्य का अंधकार
कानूनी दृष्टि से भी लिव-इन संबंध एक अनिश्चित क्षेत्र में आते हैं। विवाह न होने के कारण न संपत्ति पर स्पष्ट अधिकार होता है, न भविष्य की सुरक्षा। ब्रेकअप की स्थिति में भरण-पोषण, उत्तराधिकार और बच्चों के अधिकार अस्पष्ट रहते हैं। यह अस्पष्टता भावनात्मक ही नहीं, आर्थिक असुरक्षा का भी कारण बनती है।
आधुनिकता की भारी कीमत
समाज में भले ही लिव-इन संबंधों को प्रगतिशील सोच के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा हो, लेकिन इसके दीर्घकालिक दुष्परिणाम अब सामने आने लगे हैं। आत्महत्याएँ, अवसाद, टूटते परिवार और असुरक्षित भविष्य—यही इस तथाकथित स्वतंत्रता की भारी कीमत है।
समाधान की दिशा
आवश्यकता इस बात की है कि युवा पीढ़ी क्षणिक आकर्षण और दिखावटी आधुनिकता के बजाय भारतीय संस्कृति के स्थायी मूल्यों को समझे। विवाह जैसे संस्कार को बोझ नहीं, बल्कि सुरक्षा, सम्मान और स्थिरता का आधार माना जाए।
आज समय आ गया है कि समाज, परिवार और नीति-निर्माता इस विषय पर गंभीरता से विचार करें। केवल कानून के सहारे नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद, संस्कार और जिम्मेदारी के माध्यम से ही ऐसी त्रासदियों को रोका जा सकता है। लिव-इन संबंधों की चमक के पीछे छिपे अंधेरे को पहचानना ही भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित मार्ग प्रशस्त कर सकता है।







