क्या दुनिया फिर “शक्ति ही न्याय है” की ओर लौट रही है?
— एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया। 21वीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक राजनीति एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहाँ अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और बहुपक्षीय व्यवस्था की अवधारणाएँ बार-बार शक्तिशाली देशों की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं के आगे कमजोर पड़ती दिखाई दे रही हैं। अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति को कथित रूप से हिरासत में लेना, वहाँ “शांति स्थापित होने तक” अमेरिकी नियंत्रण की घोषणा और समानांतर रूप से भारत को रूस से तेल खरीदने पर दी गई टैरिफ धमकी—ये तीनों घटनाएँ मिलकर एक गंभीर प्रश्न खड़ा करती हैं:
क्या दुनिया पुनः ‘शक्ति ही न्याय है’ के सिद्धांत की ओर लौट रही है?
ट्रंप की भाषा: कूटनीति या मनोवैज्ञानिक दबाव?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह कथन कि “यह कदम मुझे खुश करने के लिए उठाया गया”, केवल बयान नहीं बल्कि एक रणनीतिक संकेत है। यह अमेरिकी विदेश नीति की उस शैली को दर्शाता है, जिसमें अस्पष्टता, दबाव और व्यक्तिगत अहं को कूटनीति का हथियार बनाया जाता है। यह भारत सहित अनेक देशों को सोचने पर मजबूर करता है कि क्या पर्दे के पीछे दबावपूर्ण सौदे हो रहे हैं।
रिलायंस और रूसी तेल: अर्थशास्त्र बनाम भू-राजनीति

6 जनवरी 2025 को रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड द्वारा एक्स (पूर्व ट्विटर) पर दिया गया बयान कि बीते तीन सप्ताह से रिफाइनरी में कोई तेल कार्गो नहीं आया है और जनवरी में रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति की उम्मीद नहीं है—वैश्विक ऊर्जा बाजार की संवेदनशीलता को उजागर करता है।
यह निर्णय विशुद्ध रूप से व्यावसायिक है या अंतरराष्ट्रीय दबाव का परिणाम—यह प्रश्न अपने आप में गंभीर है। क्योंकि जब रिलायंस जैसी निजी कंपनी कोई निर्णय लेती है, तो उसका प्रभाव केवल कॉर्पोरेट दायरे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा और विदेश नीति तक जाता है।
यदि कंपनियाँ भू-राजनीतिक दबाव में निर्णय लेने लगें, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या देश की आर्थिक संप्रभुता धीरे-धीरे कमजोर की जा रही है?
भारत की ऊर्जा संप्रभुता पर सीधा हमला
भारत अपनी 85 प्रतिशत से अधिक कच्चे तेल की आवश्यकता आयात से पूरी करता है। रूस से मिलने वाला रियायती तेल केवल आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि घरेलू महंगाई नियंत्रण, औद्योगिक स्थिरता और आम नागरिक की क्रयशक्ति से जुड़ा प्रश्न है।
ऐसे में अमेरिका द्वारा धमकी देना कि रूस से तेल खरीदने पर भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाएगा—भारत की स्वतंत्र ऊर्जा नीति पर सीधा हमला है।
रणनीतिक साझेदार या आज्ञाकारी सहयोगी?
यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या अमेरिका भारत को एक स्वतंत्र रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है, या फिर एक आज्ञाकारी सहयोगी के रूप में?
यदि भारत से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी ऊर्जा, व्यापार और विदेश नीति वॉशिंगटन के निर्देशों पर तय करे, तो यह भारत की गुटनिरपेक्ष परंपरा और रणनीतिक स्वायत्तता के बिल्कुल विपरीत है।
एकतरफा टैरिफ की धमकी न केवल विश्व व्यापार संगठन (WTO) की भावना के विरुद्ध है, बल्कि यह वैश्विक व्यापार को नियमों से नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन से संचालित करने की प्रवृत्ति को दर्शाती है।
वेनेजुएला: अंतरराष्ट्रीय कानून पर सीधा आघात

वेनेजुएला के निर्वाचित राष्ट्रपति को अमेरिकी नियंत्रण में लेना संयुक्त राष्ट्र चार्टर, वियना कन्वेंशन और संप्रभु समानता के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन प्रतीत होता है।
“शांति स्थापित होने तक अमेरिकी नियंत्रण” जैसी भाषा औपनिवेशिक मानसिकता की याद दिलाती है—जिसका प्रयोग पहले अफगानिस्तान, इराक और लीबिया में किया गया, और परिणाम दुनिया के सामने हैं।
लैटिन अमेरिका में अमेरिकी हस्तक्षेप का लंबा इतिहास रहा है—चिली, क्यूबा, निकारागुआ और पनामा इसके उदाहरण हैं। वेनेजुएला का तेल-समृद्ध होना इस पूरे संकट का केंद्रीय कारण प्रतीत होता है, जिसे मानवीय चिंता की आड़ में ढका जा रहा है।
भारत की भूमिका: संतुलनकारी शक्ति
रूस, चीन और वैश्विक दक्षिण के देश इन घटनाओं को गंभीरता से देख रहे हैं। यह स्थिति विश्व को पुनः शीत युद्ध जैसी ध्रुवीकरण की ओर धकेल सकती है।
भारत अब केवल एक विकासशील देश नहीं, बल्कि उभरती वैश्विक शक्ति है। उसकी भूमिका किसी एक धड़े में शामिल होने की नहीं, बल्कि संतुलन बनाए रखने वाली शक्ति की है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51 अंतरराष्ट्रीय शांति, संप्रभुता और स्वतंत्र विदेश नीति को बढ़ावा देने का निर्देश देता है। रूस से तेल खरीदना भारत का संवैधानिक और आर्थिक अधिकार है।
निष्कर्ष: संप्रभुता या दबाव?
वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप, भारत को टैरिफ की धमकी और रूसी तेल को लेकर बनाया गया दबाव—ये सभी संकेत देते हैं कि विश्व एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है।
प्रश्न यह नहीं है कि अमेरिका क्या चाहता है, बल्कि यह है कि भारत क्या चाहता है—
एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और संतुलित वैश्विक भूमिका, या दबाव में बनाई गई नीतियाँ?
भारत की शक्ति टकराव में नहीं, बल्कि संतुलन में है।
न दबाव में झुकना, न अनावश्यक टकराव—
यही भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक सफलता की कुंजी है।
-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र







