— सुरेश गोयल ‘धूप वाला’
पूर्व जिला महामंत्री व मीडिया प्रभारी, भाजपा जिला हिसार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक बार फिर अपने बयानों और आक्रामक नीतिगत रुख के कारण पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। वेनेजुएला को लेकर की गई सैन्य कार्रवाई और वहाँ के निर्वाचित नेतृत्व के संदर्भ में सामने आए घटनाक्रम के बाद ट्रम्प जिस प्रकार की भाषा और अहंकारपूर्ण बयानबाज़ी कर रहे हैं, उसने न केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति की मर्यादाओं को आघात पहुँचाया है, बल्कि अमेरिका की वैश्विक साख पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
लोकतंत्र का स्वयंभू प्रहरी कहलाने वाला अमेरिका, आज ट्रम्प के नेतृत्व में तानाशाही प्रवृत्तियों की ओर झुकता दिखाई दे रहा है। किसी संप्रभु राष्ट्र के आंतरिक मामलों में सैन्य हस्तक्षेप करना और फिर खुले मंच से उसे उचित ठहराना, यह दर्शाता है कि ट्रम्प के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून, मानवाधिकार और राष्ट्रों की संप्रभुता का कोई विशेष महत्व नहीं रह गया है। एशिया, यूरोप और लैटिन अमेरिका के देशों को जिस प्रकार वे धमकी भरे लहजे में चेतावनी देते रहे हैं, उससे वैश्विक शक्ति-संतुलन गंभीर रूप से डगमगाने लगा है।
ट्रम्प की भाषा और सोच दोनों ही असंयमित तथा अहंकार से भरी प्रतीत होती हैं। राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से जिस परिपक्वता, संयम और दूरदर्शिता की अपेक्षा की जाती है, वह उनके वक्तव्यों में प्रायः अनुपस्थित दिखाई देती है। “मेरी बात मानो या परिणाम भुगतो” जैसी मानसिकता किसी लोकतांत्रिक नेता की नहीं, बल्कि एक घमंडी तानाशाह की पहचान होती है।
भारत के संदर्भ में ट्रम्प की टिप्पणी विशेष रूप से चिंताजनक और आपत्तिजनक है। यह कहना कि “प्रधानमंत्री मोदी अच्छे व्यक्ति हैं और जानते हैं कि मुझे खुश करना कितना ज़रूरी है”, न केवल भारत जैसे संप्रभु और आत्मसम्मानशील राष्ट्र के नेतृत्व का अपमान है, बल्कि यह अमेरिका की औपनिवेशिक और वर्चस्ववादी सोच को भी उजागर करता है। भारत कोई ऐसा देश नहीं है जिसे किसी विदेशी ताक़त को “खुश” रखने की आवश्यकता हो। भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति, वैश्विक कूटनीतिक समझ और राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए जाना जाता है। ट्रम्प की यह टिप्पणी अमेरिकी राष्ट्रपति पद की गरिमा और परिपक्वता—दोनों पर प्रश्न खड़े करती है।
वास्तव में, ऐसे बयान यह संकेत देते हैं कि ट्रम्प मित्र राष्ट्रों को भी अधीनस्थ समझने की भूल कर रहे हैं। आज यदि भारत पर इस प्रकार की टिप्पणी की जा सकती है, तो कल किसी अन्य राष्ट्र की संप्रभुता को भी इसी अहंकार की बलि चढ़ाया जा सकता है। यही सोच विश्व को अविश्वास, अस्थिरता और टकराव की ओर धकेल रही है।
ट्रम्प की नीतियाँ केवल शब्दों तक सीमित नहीं हैं। आर्थिक प्रतिबंधों, सैन्य दबाव और राजनीतिक हस्तक्षेप के माध्यम से वे विश्व को लगातार तनाव की स्थिति में बनाए हुए हैं। इसका प्रत्यक्ष परिणाम यह है कि वैश्विक स्तर पर युद्ध की आशंका, हथियारों की होड़ और आर्थिक अनिश्चितता बढ़ती जा रही है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब किसी एक शक्ति ने स्वयं को सर्वशक्तिमान समझा है, तब-तब पूरी दुनिया को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्व के जिम्मेदार राष्ट्र, संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ ट्रम्प की इस बेलगाम और वर्चस्ववादी प्रवृत्ति के विरुद्ध एकजुट हों। अब चुप्पी या तटस्थता कोई विकल्प नहीं रह गई है। यदि समय रहते ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह अहंकार पूरी मानवता को एक गहरे वैश्विक संकट की ओर ले जा सकता है।
विश्व शांति केवल बड़े-बड़े भाषणों से नहीं, बल्कि संतुलित नेतृत्व, परस्पर सम्मान और अंतरराष्ट्रीय नियमों के ईमानदार पालन से संभव है। ट्रम्प की वर्तमान कार्यशैली और बयानबाज़ी इस संतुलन को लगातार नुकसान पहुँचा रही है। ऐसे में दुनिया को यह समझना होगा कि बेलगाम सत्ता—चाहे वह किसी भी देश के हाथ में हो—अंततः पूरी मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाती है।







