डॉ सत्यवान सौरभ

भारतीय ग्रामीण जीवन में मिट्टी के बर्तन केवल उपयोग की वस्तुएँ नहीं रहे, बल्कि वे लोकभाषा, परंपरा और सामूहिक स्मृति के वाहक भी रहे हैं। हांडी, बरैली, भोलवा, डहरड़ी, कटोनी, बिलोनी, मटका और माट—ये बर्तन न केवल पहचान के प्रतीक हैं, बल्कि ग्रामीण जीवन की प्रत्येक आवश्यकता, भावना और कार्य को प्रतिबिंबित करते हैं। इन बर्तनों के नाम उनके आकार, प्रयोजन और उपयोग के अनुसार बने और पीढ़ी दर पीढ़ी सजीव रहे। ये नाम लोकभाषा की संपन्नता, सांस्कृतिक समझ और अनुभवों के संग्रह के प्रतीक हैं।
हांडी ग्रामीण रसोई का सबसे केंद्रीय पात्र रही है। इसमें दाल, सब्ज़ी और चावल जैसे भोजन पकाए जाते थे। मिट्टी की हांडी में धीमी आँच पर पका भोजन स्वाद और पोषण दोनों में श्रेष्ठ माना जाता था। ग्रामीण घरों में हांडी केवल खाना पकाने का साधन नहीं, बल्कि परिवार और सामूहिकता का प्रतीक भी थी। हांडी में भोजन पकाना केवल रसोई का कार्य नहीं, बल्कि धैर्य, श्रम और प्यार की अभिव्यक्ति थी। हांडी की मिट्टी भोजन को प्राकृतिक स्वाद और पोषण देती, जो आधुनिक उपकरणों से संभव नहीं हो पाता।
बरैली प्रायः दही, छाछ या किसी तरल पदार्थ को सुरक्षित रखने के लिए उपयोग की जाती थी। इसका विशेष आकार वस्तु को लंबे समय तक ठंडी और ताजी बनाए रखने में सहायक था। ग्रामीण घरों में बरैली का होना समृद्ध घरेलू व्यवस्था और स्वच्छता का संकेत माना जाता था। भोलवा अपेक्षाकृत कम चर्चित बर्तन है, लेकिन यह अत्यंत बहुउपयोगी और आवश्यक था। इसमें अनाज, पानी या घरेलू सामग्री रखी जाती थी। इसका चौड़ा और मजबूत आकार इसे ग्रामीण जीवन की उस समझ का प्रतीक बनाता है जिसमें सीमित साधनों से अधिकतम लाभ उठाने की कला निहित थी।
ग्रामीण रसोई में डहरड़ी, कटोनी और बिलोनी जैसे बर्तन विशेष कार्य-संस्कृति को सामने लाते हैं। बिलोनी दही मथने और मक्खन निकालने के लिए प्रयुक्त होती थी। इसमें मथानी से दही मथने की प्रक्रिया केवल खाद्य उत्पादन नहीं, बल्कि श्रम, धैर्य और घरेलू सहभागिता का प्रतीक भी थी। ग्रामीण आहार में बिलोनी का महत्व इतना था कि इसके बिना दही और मक्खन आधारित भोजन अधूरा माना जाता था। कटोनी छोटा बर्तन है, जिसमें सब्ज़ी, दही, चटनी या पकवान परोसे जाते थे। इसके आकार और गहराई से ग्रामीण शालीनता और सादगी की झलक मिलती थी, साथ ही साझा भोजन की भावना भी उजागर होती थी। डहरड़ी ढकने, रखने या सहेजने के काम आती थी। इसका होना ग्रामीण जीवन में संरक्षण, सुव्यवस्था और अनुशासन की गहरी समझ को दर्शाता है। हर बर्तन का निश्चित स्थान और उद्देश्य था, जिससे दैनिक जीवन संतुलित और सुव्यवस्थित रहता था।
मटका और माट ग्रामीण जीवन के अत्यंत परिचित और आवश्यक पात्र हैं। मटका पानी ठंडा रखने का प्राकृतिक साधन रहा है। बिना बिजली या किसी तकनीक के, इसमें रखा पानी स्वाभाविक रूप से ठंडा और स्वास्थ्यवर्धक होता था। गर्मियों में मटका ग्रामीण जीवन का सबसे बड़ा सहारा माना जाता था। माट विशेष रूप से दही जमाने के लिए प्रयुक्त होता था। इसमें जमा दही स्वाद, गाढ़ेपन और शुद्धता में अद्वितीय माना जाता था। माट का उपयोग ग्रामीण आहार संस्कृति में दुग्ध उत्पादों की अहमियत और घरेलू स्वावलंबन को दर्शाता है।
इन सभी बर्तनों पर उनके नाम लिखे होना अपने आप में एक सांस्कृतिक वक्तव्य है। यह दर्शाता है कि ग्रामीण समाज में वस्तु और भाषा का संबंध कितना गहरा था। इन नामों के माध्यम से पीढ़ियों ने अनुभव, ज्ञान और परंपराओं को संजोया। हर बर्तन न केवल अपनी उपयोगिता, बल्कि ग्रामीण जीवन की सोच, सामाजिक संरचना और जीवन-दर्शन का भी प्रतीक था। आज जब प्लास्टिक और धातु के बर्तनों ने इनकी जगह ले ली है, तब ये नाम और उनके अर्थ धीरे-धीरे विस्मृत हो रहे हैं।
ग्रामीण रसोई की मिट्टी की ये वस्तुएँ केवल भौतिक नहीं थीं, बल्कि उनमें अनुभव, श्रम और जीवन के छोटे-बड़े पाठ गूंथे हुए थे। हांडी में पका भोजन परिवार के आपसी संबंधों को मजबूत करता, बरैली घर की समृद्धि और व्यवस्था को दर्शाती, भोलवा सीमित साधनों में अधिकतम उपयोग की कला को उजागर करता, बिलोनी श्रम और धैर्य का प्रतीक होती, कटोनी साझा भोजन और सादगी का संदेश देती, डहरड़ी अनुशासन और सुव्यवस्था की झलक दिखाती, मटका गर्मियों में जीवन की सहजता और स्वास्थ्य का सहारा बनता और माट दुग्ध आधारित आहार संस्कृति की गुणवत्ता और स्वावलंबन को संजोकर रखता। इन बर्तनों में केवल मिट्टी नहीं, बल्कि ग्रामीण बुद्धिमत्ता, अनुभव और जीवन दर्शन गूंथा हुआ था।
इन बर्तनों को समझना और उनकी पहचान को संजोना, दरअसल ग्रामीण संस्कृति की आत्मा को संरक्षित करने जैसा है। यह हमें यह याद दिलाता है कि मिट्टी के पात्र सिर्फ भौतिक उपयोग की वस्तुएँ नहीं थे, बल्कि उनमें जीवन, प्रेम, परंपरा और संस्कृति का गहरा संबंध मौजूद था। आज जब आधुनिक उपकरणों और सामग्री ने इनकी जगह ले ली है, तब भी इनके महत्व और स्मृति को याद रखना आवश्यक है। मिट्टी के ये बर्तन ग्रामीण जीवन की सजीव स्मृति और संस्कृति की धरोहर हैं, जिन्हें समझना और संजोना हमारे लिए सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जिम्मेदारी है।







