दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय-म्यूचुअल कंसेंट डिवोर्स के लिए एक वर्ष तक अलग रहने की शर्तअनिवार्य नहीं है
हजारों दंपति,वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटते रहते हैं,रिश्तों की भावनात्मक पीड़ा कानूनी तारीखों,वकीलों की फीस और सामाजिक दबावों में और गहरी हो जाती है
– एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया – वैश्विक स्तर पर भारत में विवाह को केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि दो परिवारों, दो संस्कृतियों और दो जीवन-दृष्टियों का पवित्र मिलन माना जाता रहा है। इसे सात जन्मों का बंधन, संस्कार और धर्म से जोड़कर देखा गया। इसी कारण “तलाक” शब्द आज भी भारतीय सामाजिक मानस में दुख, असफलता और विघटन का प्रतीक माना जाता है।
परंतु मैं, एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया (महाराष्ट्र), यह मानता हूँ कि आधुनिक जीवन की जटिलताओं, बदलती सामाजिक संरचना और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बढ़ती चेतना ने इस पवित्र संस्था की पारंपरिक परिभाषा को गंभीर चुनौती दी है।
आज तलाक केवल व्यक्तिगत संबंधों का अंत नहीं, बल्कि एक लंबी, थकाने वाली और मानसिक रूप से पीड़ादायक कानूनी प्रक्रिया बन चुका है, विशेषकर तब जब मामला फैमिली कोर्ट के लंबे और जटिल चक्रव्यूह में फँस जाता है।
फैमिली कोर्ट का उद्देश्य और व्यवहारिक वास्तविकता
भारत में फैमिली कोर्ट की स्थापना का उद्देश्य वैवाहिक विवादों का त्वरित, संवेदनशील और सुलह-आधारित समाधान था। किंतु व्यवहार में स्थिति इसके ठीक विपरीत दिखाई देती है।
हजारों दंपति वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटते रहते हैं। रिश्तों की भावनात्मक पीड़ा कानूनी तारीखों, वकीलों की फीस और सामाजिक दबावों के बीच और गहरी हो जाती है। कई बार तलाक की प्रक्रिया उसी पीड़ा को बढ़ा देती है, जिससे मुक्ति पाने के लिए पक्ष अदालत पहुँचे होते हैं।
यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या कानून वास्तव में टूट चुके रिश्तों को जोड़ने का माध्यम बन रहा है या मात्र समय की औपचारिकता निभा रहा है।
न्यायिक दृष्टिकोण में परिवर्तन : सुप्रीम कोर्ट से हाई कोर्ट तक

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय न्यायपालिका ने वैवाहिक विवादों को देखने के अपने दृष्टिकोण में उल्लेखनीय परिवर्तन किया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि हर विवाह को बचाया जाना न तो संभव है और न ही आवश्यक।
यदि विवाह भावनात्मक, मानसिक या सामाजिक रूप से पूरी तरह टूट चुका है, तो उसे कृत्रिम रूप से जीवित रखना दोनों पक्षों के साथ अन्याय हो सकता है।
इसी क्रम में 17 दिसंबर को दिल्ली हाई कोर्ट का “शिक्षा कुमारी बनाम संतोष कुमार” निर्णय एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बनकर उभरा है।
दिल्ली हाई कोर्ट का ऐतिहासिक स्पष्टिकरण
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत म्यूचुअल कंसेंट डिवोर्स के लिए एक वर्ष तक अलग-अलग रहने की शर्त अनिवार्य नहीं है, यदि दोनों पक्ष पूर्ण सहमति में हों।
कोर्ट ने कहा कि यह शर्त कानून की आत्मा नहीं, बल्कि प्रक्रिया का एक हिस्सा है, जिसे उपयुक्त मामलों में वेव किया जा सकता है।
यह निर्णय केवल एक कानूनी तकनीकी व्याख्या नहीं, बल्कि वैवाहिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत गरिमा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
फटाफट तलाक : राहत या जल्दबाजी?
“फटाफट तलाक” शब्द सुनते ही समाज में मिश्रित प्रतिक्रियाएँ सामने आती हैं। कुछ इसे विवाह संस्था के पतन के रूप में देखते हैं, जबकि कुछ के लिए यह जीवन में नई शुरुआत का अवसर है।
विशेष रूप से वे लोग जो टॉक्सिक, हिंसक या मानसिक रूप से दमनकारी रिश्तों में फँसे होते हैं, उनके लिए लंबा कानूनी इंतजार किसी अतिरिक्त सजा से कम नहीं होता।
ऐसे मामलों में एक वर्ष अलग रहने और फिर छह महीने के कूलिंग-ऑफ पीरियड की अनिवार्यता राहत नहीं, बल्कि पीड़ा को लंबा करने का माध्यम बन जाती है।
बच्चों की दृष्टि से तलाक की प्रक्रिया
जब वैवाहिक विवादों में बच्चे शामिल होते हैं, तब मामला और भी संवेदनशील हो जाता है। लंबे समय तक चलने वाली कोर्ट-कचहरी बच्चों के मानसिक विकास पर गहरा प्रभाव डालती है।
घरेलू तनाव, माता-पिता के बीच टकराव और अनिश्चित भविष्य बच्चों में असुरक्षा की भावना पैदा करता है।
यदि आपसी सहमति से तलाक शीघ्र और सम्मानजनक ढंग से हो जाए, तो बच्चों को उस लंबे संघर्ष से बचाया जा सकता है। इस दृष्टि से “फटाफट तलाक” कई परिवारों के लिए व्यावहारिक समाधान बनकर उभरता है।
म्यूचुअल कंसेंट डिवोर्स : कानून क्या कहता है
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13B के अंतर्गत म्यूचुअल कंसेंट डिवोर्स का प्रावधान है। इसके अनुसार यदि पति-पत्नी यह मानते हैं कि वे साथ नहीं रह सकते, तो आपसी सहमति से तलाक लिया जा सकता है।
धारा 13B(2) में एक वर्ष अलग-अलग रहने और उसके बाद छह महीने के कूलिंग-ऑफ पीरियड का उल्लेख है।
इसका उद्देश्य जल्दबाजी में लिए गए निर्णय से बचाना और पुनर्विचार का अवसर देना था।
कूलिंग-ऑफ पीरियड : उद्देश्य और वास्तविकता
सैद्धांतिक रूप से कूलिंग-ऑफ पीरियड एक सकारात्मक अवधारणा है, किंतु व्यवहार में यह कई मामलों में मात्र औपचारिकता बनकर रह गया है।
वर्षों से संघर्ष झेल चुके दंपतियों के लिए छह महीने का अतिरिक्त इंतजार समाधान नहीं, बल्कि मानसिक बोझ बन जाता है।
इसी कारण न्यायालयों ने इसकी अनिवार्यता पर पुनर्विचार शुरू किया।
सुप्रीम कोर्ट का 2017 का ऐतिहासिक निर्णय
अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर (2017) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 13B(2) का छह महीने का कूलिंग-ऑफ पीरियड मैंडेटरी नहीं, बल्कि डायरेक्टरी है।
यदि विवाह पूरी तरह टूट चुका हो, सुलह की कोई संभावना न हो और सभी मुद्दों पर सहमति बन चुकी हो, तो यह अवधि माफ की जा सकती है।
अनुच्छेद 142 और न्यायिक विवेक
सुप्रीम कोर्ट ने यह शक्ति अनुच्छेद 142 के तहत प्रयोग की, जो उसे “पूर्ण न्याय” करने का अधिकार देता है।
तलाक मामलों में इसका प्रयोग यह दर्शाता है कि अदालतें अब विवाह को केवल कानूनी अनुबंध नहीं, बल्कि एक जीवंत मानवीय संबंध के रूप में देख रही हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला : सुप्रीम कोर्ट की सोच का विस्तार
दिल्ली हाई कोर्ट का निर्णय सुप्रीम कोर्ट की इसी मानवीय और संवैधानिक सोच का विस्तार है। यह फैमिली कोर्ट्स के लिए एक स्पष्ट मार्गदर्शक सिद्धांत प्रस्तुत करता है कि प्रक्रिया, न्याय के मार्ग में बाधा नहीं बननी चाहिए।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य : दुनिया तलाक को कैसे देखती है
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई विकसित देशों में नो-फॉल्ट डिवोर्स की अवधारणा लागू है।
अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के अनेक देशों में आपसी सहमति होने पर तलाक प्रक्रिया सरल और त्वरित है।
भारत में हालिया न्यायिक रुझान इसी वैश्विक सोच के अनुरूप दिखाई देता है।
संविधान, अनुच्छेद 21 और व्यक्तिगत गरिमा
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ गरिमा के अधिकार को भी सुनिश्चित करता है।
यदि कोई विवाह व्यक्ति की मानसिक शांति और आत्मसम्मान को नष्ट कर रहा है, तो उससे बाहर निकलने का अधिकार भी इसी संवैधानिक आत्मा से जुड़ा हुआ है।
क्या फटाफट तलाक से विवाह संस्था कमजोर होगी?
यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। आलोचक मानते हैं कि इससे विवाह को हल्के में लिया जाएगा।
परंतु सच्चाई यह है कि मजबूरी में निभाए जा रहे रिश्ते विवाह संस्था को मजबूत नहीं, बल्कि खोखला बनाते हैं। सम्मानपूर्वक अलग होने की सुविधा विवाह को डर नहीं, बल्कि विकल्प आधारित संबंध बनाती है।
अतःअगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेषण करें तो हम पाएंगे क़ि मानवीय कानून की ओर बढ़ता भारत,दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय यह संकेत देते हैं कि भारतीय न्यायपालिका अब वैवाहिक विवादों को केवल कानूनी तकनीक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और संवैधानिक मूल्यों के साथ देख रही है।“फटाफट तलाक” विवाह के प्रति उदासीनता नहीं, बल्कि टूट चुके रिश्तों को सम्मानजनक अंत देने का प्रयास है।
यदि यह प्रवृत्ति संतुलन और विवेक के साथ आगे बढ़ती है, तो यह पीड़ितों के लिए राहत और न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता—दोनों को सुदृढ़ करेगी।
*-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र







