आचार्य डॉ महेन्द्र शर्मा ‘महेश’…….पानीपत

आज वर्ष का सबसे छोटा दिन है। ऐसे में क्यों न इस सबसे छोटे दिन पर सबसे बड़ी बात को समझने-समझाने का प्रयास किया जाए।
संभव है कि इस आलेख को एक बार पढ़ने पर विषय जटिल लगे और समझ सिर के ऊपर से निकल जाए, लेकिन यदि इसे दो-चार बार ध्यान से पढ़ा जाए, तो धर्म के प्रति एकरसता और गहराई स्वतः उत्पन्न होगी।
मैं पूर्व जन्म का संन्यासी हूँ। मेरा जीवन नित्य-प्रति छोटा होता जा रहा है, किंतु धर्म, समाज और ब्राह्मण समाज के प्रति जो मेरा दायित्व है—विषय ज्ञान का वितरण—वह अभी भी अधूरा पड़ा है। यह प्राथमिक विषय है, देखिए बात कहाँ तक पहुँचती है।
वर्ष का सबसे छोटा दिन और ऋतु परिवर्तन
आज वर्ष का सबसे छोटा दिन है। आज का दिनमान 24/55 घटी-पल, अर्थात लगभग 9 घंटे 58 मिनट का है, जबकि रात 14 घंटे 2 मिनट की होगी। यह स्थिति लगभग 20 से 23 दिसंबर तक रहती है, जब सूर्य के आगे बढ़ने से दिन और रात के मान में केवल मामूली परिवर्तन होता है।
इसके विपरीत 20 से 24 जून के बीच दिनमान 35/10 घटी-पल, अर्थात लगभग 14 घंटे 4 मिनट का होता है और रात सबसे छोटी—लगभग 9 घंटे 56 मिनट की।
प्रत्येक वर्ष 21 मार्च और 22 सितंबर को विषुव दिवस होता है, जब दिन और रात लगभग बराबर होते हैं। उस समय दिनमान 30/08 घटी-पल, यानी लगभग 12 घंटे 3 मिनट का होता है। इन दिनों न अधिक गर्मी होती है, न अधिक सर्दी—बसंत और शरद ऋतु का यही स्वभाव है।
जब 20 से 24 दिसंबर के बीच सबसे छोटा दिन आता है, तभी से शिशिर ऋतु का प्रारम्भ माना जाता है, और 21 जून से वर्षा ऋतु। आज से शिशिर ऋतु प्रारम्भ हो चुकी है—आप स्वयं अनुभव कर सकते हैं कि आज सर्दी पहले से अधिक क्यों महसूस हो रही है।
ऋतुएँ, सूर्य और समय का विज्ञान
वर्ष भर में कुल छः ऋतुएँ होती हैं और प्रत्येक ऋतु की अवधि लगभग दो माह की होती है। समय में परिवर्तन वर्ष में चार बार होता है—अर्थात हर तीसरे माह।
हमारे पर्व भी ऋतुओं के अनुसार ही घटित होते हैं, और ऋतुएँ समय के अनुसार। समय सूर्य से चलता है। सूर्य प्रतिदिन लगभग 1 अंश (लगभग 4 मिनट) की गति से आगे बढ़ता है। सूर्य के पीछे-पीछे चंद्रमा प्रतिदिन लगभग 12 अंश (लगभग 48 मिनट) के अंतर से चलता है, जिससे तिथियों और पक्षों (शुक्ल व कृष्ण) का निर्माण होता है।
एक अहोरात्र (24 घंटे) में 12 लग्न होते हैं, जिनकी अवधि लगभग 1 घंटे 46 मिनट से लेकर 2 घंटे 14 मिनट तक होती है।
तिथि के आधे मान से योग, एक चौथाई से करण का निर्माण होता है। यहीं से हमारी सनातन संस्कृति के पर्व निर्धारित होते हैं—न कि किसी एक स्थान विशेष से, जैसा कि आज भ्रम फैलाया जाता है।
पंचांग और संकल्प का विज्ञान
यह विषय गहन चिंतन और अध्ययन की माँग करता है। अध्ययन के अभाव में हम पर्वों को स्थान विशेष से जोड़ने का प्रयास करते हैं, चाहे वे हमारे क्षेत्रीय पंचांग में आएँ या न आएँ।
इसी कारण प्रत्येक अनुष्ठान, पूजा या यज्ञ में ब्राह्मण द्वारा संकल्प के समय—आपके नाम, गोत्र, शाखा, प्रवर ऋषि, नगर और निवास स्थान के उच्चारण से पूर्व—पृथ्वी का अयन, गोल, तिथि, पक्ष, योग और करण का पाठ किया जाता है।
इसका उद्देश्य यह होता है कि आपका अनुष्ठान ईश्वरीय दृष्टि में विधिवत पंजीकृत हो सके, और देवता प्रसन्न होकर आपका, हमारा और सबका संकल्पित अभीष्ट सिद्ध करें।
यही पंचांग में संकल्प का विज्ञान है—पूर्ण और समग्र विज्ञान।
यदि संकल्प ही अधूरा या त्रुटिपूर्ण होगा, तो अभीष्ट सिद्धि की प्राप्ति भी संदिग्ध हो जाएगी।
निष्कर्ष
पंचांग केवल तिथि देखने का साधन नहीं, बल्कि समय, ऋतु, सूर्य-चंद्र की गति और ईश्वरीय व्यवस्था से जुड़ा एक वैज्ञानिक-आध्यात्मिक विधान है। इसे समझना और समझाना—आज के समय में धर्म की सबसे बड़ी आवश्यकता है।







