संविधान, समाज और राज्य के टकराव का समकालीन विमर्श – एक समग्र विश्लेषण
व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम सामाजिक नियंत्रण की नई बहस
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

भारत में लव मैरिज के लिए माता-पिता की अनुमति को अनिवार्य करने की मांग ने एक निजी निर्णय को व्यापक संवैधानिक, सामाजिक और राजनीतिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। यह मुद्दा अब केवल सामाजिक चिंता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता, राज्य की भूमिका और संविधान की सर्वोच्चता से सीधे टकराता दिखाई दे रहा है।
मैं, एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, यह मानता हूँ कि यह बहस आधुनिक भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की कसौटी है—जहाँ यह तय होना है कि राज्य नागरिक की स्वतंत्रता का रक्षक होगा या सामाजिक दबावों का उपकरण।
भारतीय समाज में विवाह: परंपरा से आधुनिकता की ओर
भारत में विवाह को ऐतिहासिक रूप से केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि परिवार, जाति और समुदाय की सामाजिक संस्था माना गया है।
परंतु शिक्षा, शहरीकरण, महिला सशक्तिकरण और डिजिटल युग ने युवाओं को अपने जीवनसाथी के चयन का अधिकार स्वयं लेने की चेतना दी। यही परिवर्तन लव मैरिज के रूप में सामने आया, जो आज व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रतीक बन चुका है।
इसके विपरीत, परंपरागत सोच में इसे सामाजिक व्यवस्था के लिए चुनौती माना गया, जिसका परिणाम कई बार सामाजिक बहिष्कार, हिंसा और ऑनर किलिंग जैसी अमानवीय घटनाओं में देखने को मिला।
गुजरात, हरियाणा और मध्य प्रदेश: एक मांग, अनेक संदर्भ

हाल के वर्षों में गुजरात, हरियाणा और अब मध्य प्रदेश में लव मैरिज के लिए माता-पिता की अनुमति को कानूनन अनिवार्य करने की मांग उठी है।
गुजरात: सामाजिक दबाव और संवैधानिक अध्ययन
मेहसाणा में आयोजित एक सामुदायिक सम्मेलन में यह मांग उठी। तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने कहा कि सरकार इसकी संवैधानिक वैधता का अध्ययन करेगी। यद्यपि कोई कानून नहीं बना, लेकिन यह संकेत मिला कि सामाजिक दबाव को गंभीरता से लिया जा रहा है।
हरियाणा: अपराध और पारिवारिक विघटन का तर्क
हरियाणा विधानसभा में एक विधायक ने तर्क दिया कि पारिवारिक सहमति के बिना विवाह से आत्महत्या, हत्या और अपराध बढ़ते हैं। इसी आधार पर कानून की मांग रखी गई।
मध्य प्रदेश: आंदोलन और राजनीतिक संकेत
अब मध्य प्रदेश में 21 तारीख से आंदोलन की घोषणा की गई है। इसे “परिवार की भूमिका मजबूत करने” के नाम पर आगे बढ़ाया जा रहा है, जो इस विषय के राजनीतिक एजेंडा बनने की ओर संकेत करता है।
क्या राज्य सरकारें ऐसा कानून ला सकती हैं?

संवैधानिक रूप से विवाह समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए राज्यों को कानून बनाने का अधिकार है।
परंतु सवाल यह है कि—
क्या ऐसा कानून न्यायिक समीक्षा में टिक पाएगा?
कानूनी विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि माता-पिता की अनुमति को अनिवार्य करने वाला कोई भी कानून सुप्रीम कोर्ट में टिकना अत्यंत कठिन होगा।
भारतीय कानून में विवाह की वैधता
भारतीय कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि—
- लड़की की न्यूनतम आयु: 18 वर्ष
- लड़के की न्यूनतम आयु: 21 वर्ष
इन शर्तों को पूरा करने पर दो वयस्क व्यक्ति धर्म, जाति या समुदाय से परे विवाह करने के लिए स्वतंत्र हैं।
धर्म अलग होने की स्थिति में स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 लागू होता है।
स्पेशल मैरिज एक्ट और 30 दिन का नोटिस
यह अधिनियम विवाह से पहले 30 दिन का सार्वजनिक नोटिस अनिवार्य करता है, जो पहले से ही निजता और सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता रहा है।
फिर भी, यह कानून माता-पिता की अनुमति को अनिवार्य नहीं बनाता, केवल आपत्ति का अवसर देता है।
संविधान और मूल अधिकारों का प्रश्न
माता-पिता की अनुमति को अनिवार्य करना सीधे-सीधे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।
अनुच्छेद 19(1)(a): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
जीवनसाथी का चयन व्यक्ति की अभिव्यक्ति का एक मौलिक स्वरूप है।
अनुच्छेद 21: गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जीवनसाथी चुनने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का अभिन्न हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय
- लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
- शफीन जहाँ बनाम अशोक कुमार (हादिया केस)
इन फैसलों में दो टूक कहा गया कि दो वयस्कों की सहमति से किया गया विवाह पूरी तरह वैध है, और इसमें परिवार या राज्य का हस्तक्षेप असंवैधानिक है।
माता-पिता की भूमिका: नैतिक या कानूनी?
संविधान माता-पिता को नैतिक मार्गदर्शन की भूमिका देता है, न कि कानूनी नियंत्रण की।
विवाह जैसे निजी निर्णय में कानूनी बाध्यता लगाना परिवार को राज्य की शक्ति से लैस करने जैसा होगा, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
सामाजिक तर्क बनाम संवैधानिक सत्य
लव मैरिज से जुड़े अपराधों का कारण विवाह नहीं, बल्कि सामाजिक असहिष्णुता है।
समाधान नए प्रतिबंधात्मक कानूनों में नहीं, बल्कि—
- सामाजिक सुधार
- संवेदनशीलता
- वयस्क जोड़ों की सुरक्षा
- में निहित है।
राज्य का कर्तव्य और लोकप्रिय राजनीति
राज्य का दायित्व नागरिकों की स्वतंत्रता और सुरक्षा सुनिश्चित करना है, न कि सामाजिक दबावों के आगे झुकना।
लव मैरिज पर कानून की मांग कई बार लोकप्रिय राजनीति और वोट बैंक का साधन बन जाती है, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य
संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार घोषणा और ICCPR व्यक्ति को विवाह में स्वतंत्र चयन का अधिकार देती हैं।
भारत इन समझौतों का हस्ताक्षरकर्ता है, अतः इन मूल्यों से पीछे हटना अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का उल्लंघन होगा।
निष्कर्ष: संविधान सर्वोपरि
लव मैरिज के लिए माता-पिता की अनुमति को अनिवार्य करने की मांग भले ही सामाजिक चिंता से उपजी हो, लेकिन इसका समाधान संवैधानिक मूल्यों की बलि देकर नहीं निकाला जा सकता।
भारत का संविधान व्यक्ति को परिवार और समाज से पहले नागरिक मानता है।
इसीलिए किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर ऐसा हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं हो सकता।
– संकलनकर्ता / लेखक – एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी…… वरिष्ठ विधि विशेषज्ञ, स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक गोंदिया, महाराष्ट्र







