पूर्ण स्वराज का सपना अभी भी अधूरा: सत्ता और संसाधनों के असमान वितरण पर गुरिंदरजीत सिंह का तीखा सवाल
गुरुग्राम। गुरुग्राम के समाजसेवी इंजीनियर गुरिंदरजीत सिंह (अर्जुन नगर) ने ‘पूर्ण स्वराज’ और आर्थिक समानता के मुद्दे पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि आज़ादी के 75 वर्षों बाद भी भारत में वास्तविक जन-स्वराज का सपना अधूरा है। उनके अनुसार राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन सत्ता और संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण अब भी कुछ चुनिंदा हाथों तक सीमित है, जिससे अमीरी-गरीबी की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है।
गुरिंदरजीत सिंह ने कहा कि ‘पूर्ण स्वराज’ का अर्थ केवल अंग्रेज़ों से मुक्ति नहीं था, बल्कि जनता का शासन—जहां निर्णय आम नागरिक के हित में हों। उन्होंने सवाल उठाया, “क्या आज हम सच में जनता के शासन की ओर बढ़ रहे हैं, या फिर सत्ता कुछ बड़े पूंजीपतियों और प्रभावशाली वर्गों के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गई है?”
बढ़ती आर्थिक असमानता पर गंभीर चिंता
उन्होंने कहा कि भारत में आर्थिक विषमता चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुकी है। उनके अनुसार देश के 1 प्रतिशत सबसे अमीर लोगों के पास कुल संपत्ति का बड़ा हिस्सा केंद्रित होता जा रहा है, जबकि आधी आबादी के हिस्से संसाधनों का बेहद सीमित भाग ही आता है। यह स्थिति न केवल सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को भी कमजोर करती है।
सत्ता का केंद्रीकरण और लोकतंत्र पर सवाल
समाजसेवी ने चुनावी राजनीति में पूंजी के बढ़ते प्रभाव पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब चुनावों में धनबल हावी हो, टिकट वितरण में आम नागरिक की जगह प्रभावशाली और पूंजीपति वर्ग को प्राथमिकता मिले, तब वोट की वास्तविक ताकत पर सवाल उठना स्वाभाविक है। “ऐसे में आम आदमी की आवाज़ दबकर रह जाती है,” उन्होंने कहा।
भ्रष्टाचार: लोकतांत्रिक आदर्शों के लिए खतरा
गुरिंदरजीत सिंह ने भ्रष्टाचार को लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती बताते हुए कहा कि दशकों बाद भी यह समस्या जड़ से खत्म नहीं हो सकी है। उन्होंने पूछा, “जब भ्रष्टाचार समाज और व्यवस्था में गहराई तक पैठ बना चुका हो, तब लोकतांत्रिक आदर्शों की रक्षा कैसे संभव है?”
कॉर्पोरेट हित बनाम आम आदमी
उन्होंने कहा कि जहां एक ओर बड़े कॉर्पोरेट घरानों के कर और ऋण माफ किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर किसानों और छोटे कर्जदारों पर सख्ती दिखाई जाती है। “यह दोहरा मापदंड बताता है कि नीतियां किसके हित में बन रही हैं,” उन्होंने कहा।
निजीकरण और सामाजिक सेवाओं की बदहाली
सरकारी सेवाओं के निजीकरण पर चिंता जताते हुए गुरिंदरजीत सिंह ने कहा कि आज़ादी के बाद शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए मजबूत सरकारी ढांचा खड़ा किया गया था, लेकिन अब निजीकरण को बढ़ावा देकर आम आदमी पर बोझ डाला जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकारी स्कूल और अस्पताल उपेक्षा के शिकार हैं, जबकि बिना मानकों और आवश्यक एनओसी के निजी संस्थान फल-फूल रहे हैं।
निष्कर्ष
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन वास्तविक ‘पूर्ण स्वराज’—जहां हर नागरिक को समान अवसर, सम्मान और संसाधनों तक पहुंच हो—अब भी दूर है। उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने, सत्ता के विकेंद्रीकरण और आम आदमी की आवाज़ को केंद्र में रखने की अपील करते हुए कहा कि यही सच्चे अर्थों में पूर्ण स्वराज की राह है।







