गुरु तेग बहादुर सिंह जी का यह शहादत संदेश केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समय के साथ यह वैश्विक मानवाधिकार आंदोलन की आधारशिला बन गया
गुरु तेग बहादुर सिंह जी के 350वें शहीदी वर्ष 2025 का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाना ऐतिहासिक,सांस्कृतिक और राजनैतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है
– एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया-वैश्विक स्तर पर 25 नवंबर 2025 को गुरु तेग बहादुर सिंह जी के 350 वें शहीदी दिवस का आयोजन केवल एक धार्मिक श्रद्धांजलि भर नहीं है, बल्कि मानव सभ्यता के इतिहास में उन दुर्लभ उदाहरणों का स्मरण है, जहाँ किसी आध्यात्मिक नेता ने अपने धर्म के अनुयायियों के लिए नहीं, बल्कि दूसरे धर्म की धार्मिक स्वतंत्रता और मानव अधिकारों की रक्षा के लिए अपना जीवन बलिदान दिया। सिख धर्म के नौवें गुरु के रूप में गुरु तेग बहादुर सिंह जी का जीवन साहस, त्याग, मानवता और धार्मिक स्वतंत्रता का अद्वितीय प्रतीक है। उन्हें ‘हिंद की चादर’ के रूप में जिस सम्मान से संबोधित किया जाता है, वह इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षण देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
17वीं शताब्दी में मुगल शासन के दौरान जब धार्मिक दबाव, जबरन धर्मांतरण और सत्ता के भय ने समाज में असहिष्णुता का वातावरण पैदा कर दिया था, उस समय कश्मीर के पंडितों ने अपनी अस्तित्वगत पहचान और धार्मिक स्वाधीनता की रक्षा हेतु सहायता की गुहार लगाई। ऐसे कठिन समय में गुरु तेग बहादुर सिंह जी ने न केवल उन्हें संरक्षण देने का ऐतिहासिक निर्णय लिया, बल्कि मानवता के लिए अपने प्राणों का बलिदान देकर यह सिद्ध किया कि धर्म का वास्तविक स्वरूप स्वतंत्रता, करुणा और न्याय में निहित है। दिल्ली के चांदनी चौक में उनका सार्वजनिक रूप से शहीद होना केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि विचारों की निर्णायक जीत थी जिसने स्थापित किया कि सत्ता व्यक्ति की आस्था और विचारों को नियंत्रित नहीं कर सकती।
विश्व मानवाधिकार घोषणापत्र (यूडीएचआर 1948) में धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विचार की स्वायत्तता के जो सिद्धांत सम्मिलित किए गए, वे गुरु तेग बहादुर सिंह जी ने सदियों पूर्व अपने जीवन और बलिदान के माध्यम से व्यवहार रूप में स्थापित किए। यही कारण है कि अनेक अंतरराष्ट्रीय इतिहासकार उन्हें “द फर्स्ट ह्यूमन राइट्स डिफेंडर ऑफ द मॉडर्न वर्ल्ड” तथा “द सेंट ऑफ फ्रीडम ऑफ कंसाइंस” के रूप में स्वीकारते हैं। उनका शहादत संदेश सीमाओं से परे जाकर वैश्विक मानवाधिकार आंदोलन की आधारशिला बन गया, जो दर्शाता है कि धार्मिक स्वतंत्रता केवल व्यक्तिगत अधिकार नहीं, बल्कि मानव सभ्यता का मौलिक मूल्य है।
शांति, सहअस्तित्व और वैश्विक मानवता का संदेश
आधुनिक वैश्विक परिप्रेक्ष्य में जब दुनिया धार्मिक संघर्षों, नस्लीय विभाजन, सांस्कृतिक असहिष्णुता और अतिवाद की चुनौतियों से जूझ रही है, तब गुरु तेग बहादुर सिंह जी का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। उनका दर्शन इस विचार को मजबूत करता है कि धर्म का उद्देश्य विभाजन नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति और समाज में शांति की स्थापना है। उन्होंने उत्पीड़ितों, दलितों, किसानों और समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई। उनकी शिक्षाओं में मनुष्य की समानता, करुणा, निडरता और त्याग के मूल्य स्पष्ट रूप से प्रकट होते हैं।
विश्व मंचों पर आज “इंटरफेथ डायलॉग”, “पीसफुल कोएक्सिस्टेंस” और “रिलिजियस टॉलरेंस” जैसे विषयों पर बढ़ती चर्चा इस दिशा में महत्वपूर्ण है। संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न वैश्विक संस्थाएं मानवाधिकारों और शांति स्थापना के प्रयासों में सक्रिय हैं। ऐसे वैश्विक विमर्श में गुरु तेग बहादुर सिंह जी की विचारधारा एक महत्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करती है। उन्होंने सिख परंपरा में “सरबत दा भला” अर्थात् सभी के कल्याण के सिद्धांत को स्थापित किया, जो संयुक्त राष्ट्र के “ग्लोबल पीस एंड वेलफेयर” मिशन से गहराई से जुड़ता है।
350वें शहीदी वर्ष (2025) का वैश्विक महत्व
गुरु तेग बहादुर सिंह जी के 350वें शहीदी वर्ष 2025 का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाना ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह अवसर दुनिया को यह स्मरण कराता है कि धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के लिए संघर्ष केवल कानूनी या राजनीतिक प्रश्न नहीं, बल्कि मानवीय मूल्य हैं जिनके लिए इतिहास में अनेक महान व्यक्तित्वों ने अपने जीवन न्यौछावर किए। आज भी विश्व के विभिन्न क्षेत्रों—मध्य पूर्व, अफ्रीका, एशिया और यूरोप—में धार्मिक असहिष्णुता, अल्पसंख्यक उत्पीड़न, नस्लीय हिंसा और विचारों पर नियंत्रण की घटनाएँ बढ़ रही हैं। ऐसे समय में गुरु तेग बहादुर का बलिदान वैश्विक समुदाय के लिए प्रेरणा और चेतावनी दोनों है।
यदि 2025 में वैश्विक नेतृत्व उनकी विरासत को मानवाधिकार नीतियों, धार्मिक स्वतंत्रता संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के ढांचे में शामिल करता है, तो यह विश्व व्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। शैक्षणिक अनुसंधान, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की मान्यता और वैश्विक शांति अभियानों में उनके सिद्धांतों का समावेश महत्वपूर्ण उपलब्धि सिद्ध होगा।
अतःअगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि गुरु तेग बहादुर सिंह जी का 350वां शहीदी दिवस केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि वैश्विक मानवाधिकार इतिहास की महत्वपूर्ण धरोहर का उत्सव है। उनका जीवन और बलिदान यह प्रमाण है कि मानवता, स्वतंत्रता और शांति के सिद्धांत किसी भी सत्ता से बड़े होते हैं। आज संघर्षों और असहिष्णुता से भरी दुनिया में उनका संदेश एक प्रकाश स्तंभ की तरह मार्गदर्शन प्रदान करता है। उनका बलिदान मानवता को यह सिखाता है कि सच्ची शक्ति तलवार में नहीं, बल्कि सत्य और न्याय के समर्थन में खड़े होने के साहस में होती है। 25 नवंबर 2025 को जब विश्व उनकी स्मृति में श्रद्धांजलि अर्पित करेगा, तब यह अवसर होगा यह विचार करने का कि क्या हम उनके आदर्शों के अनुरूप एक ऐसी दुनिया बना पा रहे हैं जहाँ हर व्यक्ति सम्मान, स्वतंत्रता और शांति के साथ जीवन जी सके।
-संकलनकर्ता लेखक : कर विशेषज्ञ, स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि, संगीत माध्यमा, सीए (ATC), एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया महाराष्ट्र







