फाइनेंशियल पावर खत्म, ठेकेदार और इंजीनियर परेशान

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फाइनेंशियल पावर छिनने, मेगा-टेंडर, और इंजीनियरों की तेज ट्रांसफर से बुरी तरह प्रभावित विकास कार्य

अधिकारियों की पावर ग्रैब, छोटे ठेकेदारों का नुकसान, और शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर पर गहराती संकट की मार

गुरुग्राम : नगर निगम गुरुग्राम की इंजीनियरिंग विंग, जो शहर के बुनियादी ढांचे की रीढ़ मानी जाती है, आज प्रशासनिक दखल, पावर स्ट्रक्चर के केंद्रीकरण और अनियोजित ट्रांसफर नीति की वजह से बुरी तरह प्रभावित है। शहर में सड़कों, सीवर, जलापूर्ति और मेंटेनेंस से जुड़ी समस्याएँ लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन इन्हें संभालने वाली विंग खुद पंगु कर दी गई है — ऐसा कहना है निगम के आंतरिक अधिकारियों, इंजीनियरों और स्थानीय ठेकेदारों का।

फाइनेंशियल पावर खत्म—इमरजेंसी काम भी ठप

इंजीनियरिंग विंग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट कहा: “आज स्थिति यह है कि इंजीनियरिंग विंग 100 रुपये तक का काम खुद नहीं कर सकती। पहले रातों-रात पैचवर्क, लीकेज, सीवर ब्लॉकेज जैसे काम निपट जाते थे, अब दिन लग जाते हैं।”

विकास गुप्ता के समय काम में तेजी थी

श्री विकास गुप्ता (IAS) के कार्यकाल को गोल्डन पीरियड बताया जाता है।
एक इंजीनियर याद करते हैं: “विकास गुप्ता जी ने विंग को पूरी फाइनेंशियल स्वतंत्रता दी थी, इसलिए हम तुरंत रिस्पॉन्स दे पाते थे। तब सिस्टम चल रहा था।”

टी.एल. सत्यप्रकाश और रोहित यादव के समय पावर ग्रैब का आरोप

अधिकारियों का आरोप है कि टी.एल. सत्यप्रकाश के कमिश्नर बनने और रोहित यादव (HCS) के ज्वाइंट कमिश्नर रहने के दौरान ही पावर स्ट्रक्चर उलट गया। एक अधिकारी कहते हैं: “ज्वाइंट कमिश्नर, एडिशनल कमिश्नर और कमिश्नर—तीनों ने वह पावर अपने पास रख ली जो इंजीनियरों को मिलनी चाहिए थी।”

सबसे विवादित फैसला उस समय लिया गया जब 100 से अधिक एक-एक करोड़ के टेंडरों को क्लब कर 100 करोड़ के मेगा-टेंडर में बदल दिया गया। इससे छोटे ठेकेदार बेरोजगार हो गए और काम वर्षों तक लटक गए।

इंजीनियरों की अंधाधुंध ट्रांसफर से काम और धीमा

यह एक और गंभीर समस्या है जिसे अब इंजीनियर और ठेकेदार खुलकर उठा रहे हैं।

जेई, एई और XEN के वार्ड बार-बार बदले जाते हैं

निगम के एक जूनियर इंजीनियर (JE) बताते हैं: “जब तक कोई इंजीनियर अपने वार्ड की समस्याओं को पूरी तरह समझता है, तब तक उसकी ट्रांसफर कर दी जाती है। इससे प्लानिंग और निगरानी दोनों टूट जाती हैं।”

सबसे ज़्यादा नुकसान किसे? — ठेकेदारों को

ठेकेदारों का आरोप है कि बार-बार होने वाली इंजीनियरों की ट्रांसफर नीति से बिलिंग का काम पूरी तरह गड़बड़ा जाता है।

एक ठेकेदार की शिकायत: “हमने काम पूरा कर दिया, लेकिन नए इंजीनियर कहते हैं—मेरे सामने काम नहीं हुआ, मैं बिल पास नहीं करूंगा।”

दूसरी ओर पुराने इंजीनियर का तर्क यह होता है: “अब यह मेरा एरिया नहीं रहा, मैं इस काम की बिलिंग नहीं करूंगा।”

इसका नतीजा यह है कि काम पूरा होने के बाद भी ठेकेदारों को महीनों—कई बार सालों तक भुगतान नहीं मिलता, जिससे स्थानीय स्तर पर आर्थिक संकट पैदा हो गया है।

सफाई व्यवस्था और रेवेन्यू कलेक्शन भी बिगड़ा

एक पूर्व अधिकारी का कहना है: “IAS और HCS अधिकारियों का फोकस होना चाहिए सफाई व्यवस्था और राजस्व वृद्धि पर, लेकिन दोनों ही सेक्टर चरमराए हुए हैं। ऐसे में इंजीनियरों के काम में दखल देना गलत है।”

तकनीकी नेतृत्व की जरूरत—दिल्ली मेट्रो का उदाहरण

कई विशेषज्ञों का मानना है कि नगर निगम जैसी तकनीकी संस्था का नेतृत्व किसी सिविल इंजीनियर को मिलना चाहिए।

एक रिटायर्ड चीफ इंजीनियर कहते हैं: “यदि निगम कमिश्नर के पद पर PWD के अनुभवी चीफ इंजीनियर को तैनात कर फ्री हैंड दे दिया जाए, तो एक साल में शहर में बदलाव दिख जाएगा।”

वे उदाहरण देते हैं: “दिल्ली मेट्रो के CMD श्री धरण जी अंतरराष्ट्रीय स्तर के इंजीनियर हैं। इसलिए दिल्ली मेट्रो सफल हुई। गुरुग्राम में भी ऐसा मॉडल अपनाने की जरूरत है।”

निष्कर्ष: सिस्टम में संरचनात्मक सुधार के बिना गुरुग्राम नहीं सुधरेगा

गुरुग्राम की बढ़ती जनसंख्या और IT हब के विस्तार के बीच नगर निगम का इंजीनियरिंग ढांचा पूरी तरह तनाव में है।
फाइनेंशियल पावर की वापसी, इंजीनियरों की स्थिर पोस्टिंग, मेगा-टेंडरों की समीक्षा, और तकनीकी नेतृत्व — यह चार बड़े कदम शहर को पटरी पर ला सकते हैं।

इस समय शहर के लगभग सभी तकनीकी विशेषज्ञ, ठेकेदार और इंजीनियर एक ही बात दोहरा रहे हैं—

“इंजीनियरों को शक्ति दो, तभी शहर सुधरेगा।”

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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