चर्चा है: निकाय चुनाव में जनप्रतिनिधि जीतेंगे या नेताओं के दरबारी?

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भारत सारथी/ऋषि प्रकाश कौशिक

गुरुग्राम। हरियाणा में निकाय चुनाव की अधिसूचना जारी हो चुकी है और आज से नामांकन प्रक्रिया भी आरंभ हो गई है। आम जनता के बीच इस चुनाव को लेकर बहुत अधिक चर्चा नहीं है, लेकिन राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों के बीच हलचल जरूर देखी जा रही है। फिलहाल, परिस्थितियां ऐसी नजर आ रही हैं कि भाजपा ही मुख्य रूप से सक्रिय है। कांग्रेस ने अपने सिंबल पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है, लेकिन पार्टी के भीतर संगठनात्मक ढांचे की कमजोरी और हालिया घटनाओं के चलते वह बिखरी हुई नजर आ रही है। अन्य दलों—इनेलो, जजपा, आम आदमी पार्टी और बसपा की उपस्थिति भी नगण्य दिखाई दे रही है।

भाजपा की स्थिति भी बहुत सुदृढ़ नहीं है। विधानसभा चुनावों में भी पार्टी की एकता पर प्रश्नचिन्ह लगा था, जहां कुछ नेता अलग हो गए थे और कुछ ने पार्टी उम्मीदवारों का साथ देने के बजाय विपक्षी उम्मीदवारों का समर्थन किया था। गुरुग्राम में भी ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है। भाजपा अब तक इन असंतुष्ट नेताओं की पहचान कर सार्वजनिक रूप से कार्रवाई करने में असमर्थ रही है।

इस समय चुनाव लड़ने के इच्छुक नेता अपने-अपने आकाओं के दरबार में हाजिरी लगा रहे हैं, जबकि असल में उन्हें जनता से समर्थन लेना है। उनकी मानसिकता यह है कि टिकट मिल गई तो जीत सुनिश्चित है, लेकिन कुछ उम्मीदवार ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि यदि पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो वे जनता के समर्थन से निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे। यह चुनाव भाजपा के लिए विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण रहेगा, क्योंकि अनुशासन के लिए पहचानी जाने वाली पार्टी में अनुशासनहीनता की झलक साफ दिख रही है।

कुछ भाजपा कार्यकर्ताओं का मानना है कि मंडल अध्यक्षों की नियुक्ति में भी केवल चाटुकारों को तवज्जो दी गई है। ऐसे में संभावना है कि टिकटों का वितरण भी इसी आधार पर होगा। यही कारण है कि यह देखना दिलचस्प होगा कि 36 वार्डों में से कितने भाजपा कार्यकर्ता बगावत कर निर्दलीय मैदान में उतरेंगे।

भाजपा के लिए एक और चुनौती यह भी है कि चुनाव से पहले जिला अध्यक्ष बदले जाने थे, लेकिन चुनाव को देखते हुए यह निर्णय टाल दिया गया। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं में असमंजस की स्थिति बनी हुई है और निष्ठा में कमी आ सकती है।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मोहनलाल बडौली ने हाल ही में पार्टी के वरिष्ठ नेता और मंत्री अनिल विज को कारण बताओ नोटिस जारी किया। यह नोटिस तब जारी किया गया, जब नामांकन प्रक्रिया शुरू होने वाली थी, जबकि अनिल विज के बयान बहुत पहले आ चुके थे। इससे यह संकेत मिलता है कि भाजपा अपनी पार्टी में अनुशासन बनाए रखने के लिए संदेश देना चाहती है।

गुरुग्राम नगर निगम की बात करें तो यह हमेशा से ही राव इंद्रजीत सिंह के प्रभाव में रहा है। नगर निगम में भ्रष्टाचार के आरोप भी लगते रहे हैं, जहां बिना काम के भुगतान किया गया और कार्यों की गुणवत्ता पर भी सवाल उठे। गुरुग्राम में सफाई की स्थिति भी चिंताजनक रही है, जिसके लिए निगम की कार्यशैली ही जिम्मेदार रही। अब देखने वाली बात यह होगी कि जनता इस बार इन मुद्दों को ध्यान में रखेगी या फिर से उन्हें नजरअंदाज कर देगी।

एक चुनावी प्रत्याशी, जिसने नाम न छापने की शर्त पर बातचीत की, ने कहा कि वे वर्तमान जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछेंगे कि उन्होंने जो कार्य कराए, उनमें भ्रष्टाचार की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या इसमें केवल निगम अधिकारी और ठेकेदार ही शामिल थे, या जनप्रतिनिधियों की भी भागीदारी थी? आखिर जनता ने उन्हें इसी विश्वास के साथ चुना था कि वे जनता के पैसों का दुरुपयोग रोकेंगे और विकास कार्यों की निगरानी करेंगे।

वर्तमान में चर्चा यह भी जोरों पर है कि राव इंद्रजीत सिंह इस बार भी अपनी मेयर टीम तैयार करने में जुटे हुए हैं। कुल मिलाकर, इस चुनाव में सबसे दिलचस्प बात यह होगी कि भाजपा से कितने असंतुष्ट नेता पार्टी छोड़कर निर्दलीय चुनाव लड़ते हैं और पार्टी इस स्थिति से कैसे निपटती है।

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Author: Bharat Sarathi

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