20 साल बाद एससी एसटी के झूठे मामले में चार मार्च को इलाहाबाद हाइकोर्ट ने विष्णु तिवारी को बरी कर दिया
-आसिफ शेख नाम के युवक ने 2001 में गुजरात यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता में टॉप किया। आसिफ के सपनों पर ऐसा पानी फेरा कि उनकी ज़िंदगी के सारे रास्ते बंद हो गए। 
– 20 साल के मुकदमे के बाद शनिवार को इन सभी 127 लोगों को सूरत की एक अदालत ने बाइज्जत बरी किया
– क्या जिसे हम बाइज्जत बरी होना कहते हैं, वह सच में बाइज्जत बरी होना है?

अशोक कुमार कौशिक

  इस लेख में हम बेगुनाह लोगों की तस्वीर सामने रखने की कोशिश कर रहे हैं जिसे सिस्टम और भ्रष्टाचार के चलते बिना किसी अपराध के जेलों में अपना जीवन बिताना पड़ा। सभी मामलों को देखने के बाद एक सवाल खड़ा होता है कि आखिर इसके लिए कौन जवाबदेह है। क्या जिसे हम बाइज्जत बरी होना कहते हैं, वह सच में बाइज्जत बरी होना है? 20 साल लंबे मुकदमे में इन सभी लोगों को बेशुमार पैसा खर्च करना पड़ा। उनकी जिंदगी बेकार हो गई। इसकी भरपाई कैसे होगी? ये रिहाई तब हुई है जब इनमें से कई लोग मर गए जिन्हें कभी न्याय नहीं मिलेगा। 

ललितपुर ऊत्तरप्रदेश के विष्णु तिवारी नाम के एक शख्स को हरिजन लड़की के साथ बलात्कार व एससी एसटी एक्ट के आरोप में निचली अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी। चार मार्च को इलाहाबाद हाइकोर्ट ने उनको बरी कर दिया। जब गिरफ्तार किया गया था तब भी कठुआ या हाथरस की तरह वर्ग विशेष समर्थन में जरूर उतरा होगा । इंसाफ के लिए पूरी पैरवी की गई होगी!फिर भी प्रक्रिया में खामी रही जिसकी कीमत विष्णु तिवारी ने भुगती है।

अब “विष्णु तिवारी 20साल बाद बरी”लिखकर गूगल सर्च करिये। तमाम अखबारों व न्यूज़ चैनल्स की साइट पर विस्तार से खबर नजर आएगी। सोशल मीडिया में बड़े-बड़े लेख एट्रोसिटी एक्ट के खिलाफ लिखे जा रहे है।किसी के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए लेकिन मीडिया व समाज की यह विभाजनकारी सोच ही अलगाव पैदा करती है। इसी सोच के खिलाफ हम लड़ रहे है व रोज जातिवादी होने का लेबल हासिल करते है। क्या एक के मुकाबले 127 लोगों की जिंदगी कमतर है?
दिसंबर 2001 में सूरत के राजश्री हॉल से 127 लोगों को गिरफ्तार किया गया था,जहां ये लोग ऑल इंडिया माइनॉरिटी एज्युकेशन बोर्ड के बैनर तले,अल्पसंख्यकों के शिक्षा के अधिकार पर चर्चा के लिए आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेने आये हुए थे। 

इन सभी को Unlawful activity prevention act अर्थात UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया था। इन पर आरोप था कि इनका संबंध प्रतिबंधित संगठन सिमी(Student islamic movement of india)से है।

उस समय मीडिया ने इसको सुरक्षा एजेंसियों की बड़ी सफलता बताई थी व वर्ग विशेष को आतंकवाद के कठघरे में खड़ा करने के लिए महीने भर प्राइम टाइम किया था।अखबारों में मुख्य खबरों के रूप में प्रसारित किया था।

5 मार्च 2021 को सीजेएम कोर्ट ने कहा कि सिमी से संबंध होने का कोई प्रमाण नहीं है। 20 साल बाद 127 लोगों को बरी कर दिया गया। इनके परिवारों व रिश्तेदारों को 20 साल तक भारतीय समाज शक की नजरों से देखता रहा। कितनी बड़ी जलालत झेली है। इन 127 लोगों की जिंदगी के 20 वर्ष जेल में कट गए।

– एक टॉपर का ‘आतंकवादी’ होना 

आसिफ शेख नाम के युवक ने 2001 में गुजरात यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता में टॉप किया। उनके साथ के लोग बड़े-बड़े पत्रकार बन गए। आसिफ आतंकवाद के झूठे केस में फंसा दिए गए। इस केस ने आसिफ के सपनों पर ऐसा पानी फेरा कि उनकी ज़िंदगी के सारे रास्ते बंद हो गए। 

 2001 में मुसलमानों की शिक्षा के मसले पर गुजरात के सूरत में एक सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन की बुकिंग के लिए आरिफ मंसूरी नाम के शख्स के नाम हाल बुक किया गया था। उनके भाई साजिद मंसूरी सिमी नाम के संगठन से जुड़े थे, जिस पर आतंकवाद में लिप्त होने का आरोप था। इस सम्मेलन में शामिल 127 लोगों को गिरफ्तार किया गया। उनपर सिमी से जुड़े होने और आतंकवाद फैलाने का आरोप लगाया गया। 

इन लोगों में दो वाइस चांसलर थे, एक सेवानिवृत्त जज, प्रोफेसर और डॉक्टर थे। सभी को जेल में डाल दिया गया। वे सभी लोग 11 महीने तक जेल में रहे, फिर गुजरात हाईकोर्ट से जमानत मिल गई। 

लेकिन इनके छूटने तक मीडिया और पुलिस इन सबको आतंकी घोषित कर चुके थे। इनमें से बहुतों की नौकरी चली गई। व्यापार बंद हो गया। उनके सामने रोजी रोटी की मुसीबत खड़ी हो गई। 
इस केस के सरकारी वकील जगपुरुष सिंह राजपूत 2012 में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़कर विधायक बन गए। 127 लोगों की जिंदगी बर्बाद होने की कीमत पर कई लोगों को राजनीतिक लाभ हुआ। जब कहा जाता है कि आतंकवाद एक ग्लोबल पॉलिटिकल बिजनेस है तो भावुक लोग बुरा मान जाते हैं। 

इन्हीं 127 लोगों में टॉपर स्टुडेन्ट आसिफ शेख भी थे। इस केस के कारण आसिफ को कभी मीडिया में नौकरी नहीं मिल सकी। आसिफ ने कभी कॉल सेंटर में काम किया, कभी लाउड स्पीकर बेचा, कभी कपड़े की दुकान खोली। ये सभी काम सफल नहीं हुए। आसिफ अब 13 सालों से मिर्ची बेच रहे हैं। 

आसिफ कहते हैं कि मेरे ऊपर टैग लग गया था, इसलिए किसी मीडिया हाउस ने मुझे नौकरी दी। मेरे दोस्त आज मशहूर पत्रकार हैं। मैं आज मिर्ची बेच रहा हूं। मेरी शादी भी 38 साल की उम्र में हुई, क्योंकि मुझे कोई अपनी लड़की व्याहने को तैयार नहीं था। 

इस केस में आसिफ जैसे कई लोगों की जिंदगी 2001 में ही ठहर गई। ठीक वैसे ही, जैसे यूपी के विष्णु तिवारी को 20 साल झूठे केस में फंसाया गया और उनका पूरा परिवार बर्बाद हो गया। 
20 साल के मुकदमे के बाद शनिवार को इन सभी 127 लोगों को सूरत की एक अदालत ने बाइज्जत बरी किया है। अदालत ने कहा कि इनमें से कोई भी सिमी का सदस्य नहीं था। किसी के भी खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला है। इन पर मुकदमा चलाने की जो इजाजत दी गई थी वो भी वैध नहीं थी। 

उत्तर प्रदेश में रिहाई मंच ने पिछले सालों में ऐसे कई दर्जन युवकों को बरी कराया है जो आतंकवाद के झूठे मुकदमों में फंसाये गए थे। 

अब देखिए कि मेनस्ट्रीम मीडिया में कहीं भी इस खबर का जिक्र नहीं है। गूगल सर्च करोगे तो एकाध न्यूज़ साइट  लिंक या सोशल मीडिया लिंक मिलेंगे जिसमे सिर्फ इन्हीं वर्ग के लोग अफसोस जाहिर कर रहे है।

एक जगह पढ़ रहा था कि विष्णु तिवारी को सामने वाले की सारी संपत्ति जब्त करके दी जानी चाहिए। उपरोक्त 127 लोगों को किसकी संपति जब्त करके देते हुए इंसाफ किया जाएगा? इस सिस्टम में किसी को झूठे केस में फंसाकर उसकी जिंदगी खराब कर देना इतना आसान क्यों है?

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