जयंती के आयोजनों से आगे बढ़कर अंतिम व्यक्ति के अधिकार, ग्राम स्वराज, स्वदेशी और सार्वजनिक जीवन की नैतिकता पर काम करने की आवश्यकता
डॉ. वेदप्रकाश

गांधी जयंती पर सार्वजनिक अवकाश होता है। देशभर में अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। उनकी प्रतिमाओं पर पुष्प अर्पित होते हैं, विचारों पर व्याख्यान दिए जाते हैं और उनके बताए रास्ते पर चलने के संकल्प दोहराए जाते हैं। लेकिन इन सबके बीच एक प्रश्न हमारे सामने बना रहता है—क्या हम गांधी जी के सपनों का भारत बना पाए हैं?
गांधी जी ने ये सपने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए नहीं देखे थे। उनके सपनों के केंद्र में सामान्य मनुष्य था। उनमें किसान, मजदूर, स्त्री, नौजवान और समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति की चिंता थी। उनमें ऐसा भारत रचा-बसा था, जहां स्वतंत्रता का अर्थ केवल सत्ता परिवर्तन न होकर सम्मान, समान अवसर और आत्मनिर्भर जीवन हो।
जीवन में उतरे थे सिद्धांत
गुजरात के पोरबंदर में जन्मे और राजकोट में बचपन का महत्वपूर्ण समय बिताने वाले गांधी जी ने इंग्लैंड से वकालत की पढ़ाई की। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध संघर्ष से लेकर भारत में स्वतंत्रता आंदोलन तक उन्होंने अन्याय, भेदभाव और पराधीनता के प्रतिरोध में अपना जीवन समर्पित किया।
उन्होंने भारत को केवल पुस्तकों से नहीं समझा। यात्राओं, जनसंवाद और सामान्य लोगों के बीच रहकर उन्होंने देश की वास्तविकताओं को जाना। गरीबी, अस्पृश्यता, अस्वच्छता और सामाजिक असमानता उनके लिए चर्चा के विषय भर नहीं थे। त्याग, सत्य, अहिंसा, परहित और सेवा उनके जीवन-दर्शन के अंग थे, जिन्हें उन्होंने अपने आचरण में उतारने का प्रयास किया।
आज वर्ष 2026 में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि गांधी जी के नाम पर होने वाले आयोजनों और उनके आदर्शों के वास्तविक पालन के बीच कितनी दूरी शेष है।
तस्वीरों से आगे बढ़े गांधी का विचार
‘हिंद स्वराज’ तथा गांधी जी के विचारों के संकलन ‘मेरे सपनों का भारत’ में देश के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक जीवन से जुड़े अनेक प्रश्न मिलते हैं। स्वराज, लोकतंत्र, सर्वोदय, बेकारी, आर्थिक समानता, किसान, ग्राम स्वराज, ग्रामोद्योग, स्वदेशी, स्वच्छता, आरोग्य, शिक्षा, भारतीय भाषाएं और विश्व शांति—उनकी चिंता का दायरा अत्यंत व्यापक था।
गंभीरता से विचार करें तो इनमें से अनेक क्षेत्रों में उपलब्धियों के बावजूद लक्ष्य अभी दूर दिखाई देता है। सरकारी कार्यालयों में गांधी जी की तस्वीरें लगी हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या निर्णयों में भी उनका विचार दिखाई देता है? कुर्सी के पीछे लगी तस्वीर तभी सार्थक होगी, जब उस कुर्सी पर बैठा व्यक्ति सामने खड़े नागरिक के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझे।
जब जनकल्याण की योजनाएं अनियमितताओं की भेंट चढ़ती हैं, जब जरूरतमंद को अपने अधिकार के लिए भटकना पड़ता है और जब पद जनसेवा के स्थान पर निजी लाभ का माध्यम बनने लगता है, तब गांधी जी का स्मरण आत्मचिंतन की मांग करता है।
अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे योजनाओं का लाभ
हालिया समाचार इस चिंता को और गहरा करते हैं। उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि से जुड़े सत्यापन में 4,297 अपात्र लाभार्थियों के सामने आने की खबर प्रकाशित हुई है। इनमें 147 नाबालिग बताए गए हैं। यह मामला लाभार्थियों के चयन और सत्यापन व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न उठाता है।
बिहार के शिवहर जिले में लगभग दस लाख रुपये के सामुदायिक भवन के कागजों में दर्ज होने, लेकिन संबंधित स्थल पर भवन नहीं मिलने का मामला सामने आया है। इसी प्रकार जमुई में पानी से भरे तालाबों में खुदाई और मजदूरों की ऑनलाइन उपस्थिति दिखाने संबंधी अनियमितताओं की खबरों के बाद जांच की कार्रवाई हुई है।
ऐसी घटनाएं केवल सरकारी धन के दुरुपयोग का प्रश्न नहीं हैं। इनका सीधा संबंध उस किसान, मजदूर और गरीब परिवार के अधिकार से है, जिसके लिए योजनाएं बनाई जाती हैं। यदि संसाधन पात्र व्यक्ति तक नहीं पहुंचेंगे, तो उसके जीवन में सुधार कैसे आएगा?
गांधी जी के अंतिम व्यक्ति की चिंता को व्यवहार में लाने के लिए योजनाओं की घोषणा के साथ पारदर्शी क्रियान्वयन, स्वतंत्र सत्यापन और जिम्मेदारी तय करना आवश्यक है। विकास का मूल्यांकन व्यय की गई राशि से ही नहीं, जरूरतमंद के जीवन में आए बदलाव से भी होना चाहिए।
सुरक्षित भोजन और सुलभ स्वास्थ्य
गांधी जी के आरोग्य संबंधी चिंतन में स्वच्छता, संतुलित आहार और स्वस्थ जीवन का महत्वपूर्ण स्थान था। आज खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता से जुड़े प्रश्न इसी चिंता को नए संदर्भ में सामने रखते हैं।
संसद में प्रस्तुत सरकारी आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2024-25 में प्रवर्तन के अंतर्गत जांचे गए 1,70,535 खाद्य नमूनों में से 34,388 निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाए गए। यहां यह अंतर समझना आवश्यक है कि मानकों पर खरा नहीं उतरने वाला प्रत्येक नमूना अनिवार्य रूप से मिलावटी या स्वास्थ्य के लिए समान रूप से खतरनाक नहीं होता। फिर भी यह स्थिति निगरानी और जवाबदेही मजबूत करने की आवश्यकता बताती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के वर्ष 2026 के अनुमान के अनुसार असुरक्षित भोजन से विश्वभर में हर वर्ष लगभग 86.6 करोड़ लोगों के बीमार पड़ने का अनुमान है। यह समस्या केवल जानबूझकर की गई मिलावट तक सीमित नहीं, बल्कि भोजन के दूषित और असुरक्षित होने के विभिन्न कारणों से जुड़ी है।
स्वस्थ भारत के लिए आवश्यक है कि खाद्य जांच प्रभावी हो, दोषियों के विरुद्ध समयबद्ध कार्रवाई हो और नागरिकों को सुरक्षित भोजन तथा भरोसेमंद उपचार मिले। स्वास्थ्य की रक्षा सामान्य व्यक्ति की क्रयशक्ति पर निर्भर नहीं रहनी चाहिए।
नशामुक्त समाज का अधूरा संकल्प
गांधी जी शराब और अन्य मादक पदार्थों को व्यक्ति, परिवार और समाज के लिए हानिकारक मानते थे। नशे का प्रश्न केवल सेवन करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। उसका प्रभाव परिवार की आर्थिक स्थिति, बच्चों के भविष्य और सामाजिक संबंधों पर भी पड़ता है।
आज नशामुक्त समाज बनाने के लिए केवल जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं हैं। अवैध कारोबार पर प्रभावी रोक, उपचार और पुनर्वास की सुविधाएं, युवाओं के लिए रोजगार तथा खेल और रचनात्मक गतिविधियों के अवसर भी जरूरी हैं।
शराब से मिलने वाले राजस्व और उसके सामाजिक प्रभाव के बीच नीति-निर्माताओं को गंभीरता से विचार करना चाहिए। गांधी जी का स्मरण तभी सार्थक होगा, जब नशामुक्ति भाषणों से आगे बढ़कर निरंतर सामाजिक और प्रशासनिक प्रयास बने।
भारतीय भाषाओं को व्यवहार में सम्मान
गांधी जी मातृभाषा में शिक्षा और भारतीय भाषाओं के सम्मान के पक्षधर थे। वे जनजीवन से जुड़ी ऐसी भाषा चाहते थे, जिसके माध्यम से सामान्य व्यक्ति शिक्षा, प्रशासन और राष्ट्रीय संवाद में भाग ले सके।
हिंदी को संघ की राजभाषा का संवैधानिक स्थान प्राप्त है, लेकिन वास्तविक प्रश्न उसके तथा अन्य भारतीय भाषाओं के प्रभावी उपयोग का है। क्या नागरिक अपनी भाषा में सरकारी प्रक्रियाएं समझ सकता है? क्या विद्यार्थी को अपनी मातृभाषा में गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री उपलब्ध है? क्या भाषा अवसर प्राप्त करने में बाधा बन रही है?
हाल में नवोदय विद्यालयों से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु में हिंदी पढ़ाने के प्रति दृष्टिकोण पर टिप्पणी की। इस प्रसंग को उसके शैक्षिक संदर्भ में समझना चाहिए।
भाषाओं का प्रश्न राजनीतिक टकराव से अधिक संवाद और पारस्परिक सम्मान की मांग करता है। हिंदी का विस्तार अन्य भारतीय भाषाओं के सम्मान के साथ होना चाहिए। संस्कृत सहित सभी भारतीय भाषाओं के संरक्षण, अध्ययन और आधुनिक उपयोग के लिए ठोस प्रयास जरूरी हैं। किसी विदेशी भाषा का ज्ञान उपयोगी हो सकता है, लेकिन अपनी भाषा के प्रति हीनता का भाव आत्मनिर्भर समाज का आधार नहीं बन सकता।
महिलाओं की गरिमा से तय होगी प्रगति
गांधी जी के स्त्री संबंधी चिंतन में शिक्षा, सामाजिक भागीदारी और कुरीतियों से मुक्ति के प्रश्न महत्वपूर्ण थे। आज महिलाओं ने शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, खेल और उद्यम सहित अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। इन उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए यह भी देखना होगा कि समानता और सुरक्षा की राह में कौन-सी बाधाएं शेष हैं।
यौन हिंसा, उत्पीड़न, दहेज, कार्यस्थल पर भेदभाव और शिक्षा तक असमान पहुंच जैसे प्रश्न अब भी गंभीर हैं। अनेक महिलाओं के लिए अपनी क्षमता के अनुरूप अवसर पाना कठिन बना हुआ है। विशेषकर वंचित परिवारों और सुविधाओं से दूर क्षेत्रों की बालिकाओं के सामने अतिरिक्त चुनौतियां हैं।
महिला सशक्तीकरण का अर्थ केवल कुछ सफल उदाहरणों पर गर्व करना नहीं है। उसकी कसौटी यह भी है कि सामान्य स्त्री कितनी सुरक्षित है, अपने जीवन के निर्णय कितनी स्वतंत्रता से ले सकती है और उसे कितना सम्मान मिलता है। गांधी जी के सपनों पर विचार करते समय इन प्रश्नों को केंद्र में रखना होगा।
गांवों की आत्मनिर्भरता और स्वदेशी
गांधी जी का ग्राम स्वराज गांवों को सक्षम, स्वावलंबी और सहभागी बनाने की कल्पना थी। खेती, कुटीर उद्योग, स्थानीय कौशल और सामुदायिक सहयोग उसके महत्वपूर्ण आधार थे।
आज गांवों के विकास का अर्थ सड़क और भवन निर्माण के साथ स्थानीय आजीविका, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, जल संरक्षण और ग्रामसभा की प्रभावी भागीदारी भी होना चाहिए। यदि ग्रामीण युवाओं को सम्मानजनक रोजगार के लिए विवश होकर पलायन करना पड़े, तो गांवों की आत्मनिर्भरता का लक्ष्य अधूरा रहेगा।
स्वदेशी का विचार भी केवल किसी वस्तु के देश में बने होने तक सीमित नहीं है। उसमें स्थानीय श्रम, कौशल और उत्पादन के प्रति जिम्मेदारी का भाव निहित है। किसान, बुनकर, कारीगर और छोटे उद्यमी को बाजार, तकनीक तथा उचित मूल्य मिले, तभी स्वदेशी सामान्य लोगों की आर्थिक शक्ति बन सकेगा।
आत्मनिर्भर भारत, ‘मेक इन इंडिया’ और स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहन देने के प्रयासों की सार्थकता उनके वास्तविक परिणामों से तय होगी। स्वभाषा, अपने भोजन, पहनावे और चिंतन के प्रति आत्मसम्मान जरूरी है। साथ ही उपयोगी वैश्विक ज्ञान और तकनीक को अपनाने का विवेक भी बना रहना चाहिए।
कर्मभूमि का भाव और सार्वजनिक नैतिकता
गांधी जी भारत को कर्मभूमि के रूप में देखते थे। उनके चिंतन में आत्मबल, सेवा और कर्तव्य का महत्व था। वे ऐसे भारत की आकांक्षा रखते थे, जिसमें गरीब से गरीब व्यक्ति भी देश को अपना समझे और उसके निर्माण में अपनी आवाज का महत्व अनुभव करे।
इस विचार की कसौटी पर शासन के साथ समाज और नागरिकों को भी स्वयं को परखना होगा। क्या हम अपने काम में ईमानदार हैं? क्या सार्वजनिक संपत्ति के प्रति जिम्मेदारी निभाते हैं? क्या असहमति रखने वाले व्यक्ति के सम्मान और अधिकार को स्वीकार करते हैं? क्या सुविधा के लिए उन गलत व्यवहारों में सहभागी बन जाते हैं, जिनकी सार्वजनिक रूप से आलोचना करते हैं?
गांधी जी के सपनों की जिम्मेदारी केवल सरकारों पर डालकर समाज अपने कर्तव्य से मुक्त नहीं हो सकता। फिर भी शासन और सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की जिम्मेदारी अधिक है, क्योंकि उनके निर्णय लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं।
संकल्पों का धरातल पर क्रियान्वयन हो
विकसित और सशक्त भारत का संकल्प तभी व्यापक अर्थ प्राप्त करेगा, जब उसके लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेंगे। आर्थिक प्रगति के साथ सार्वजनिक नैतिकता, सामाजिक सद्भाव, समान अवसर और मानवीय गरिमा को भी विकास की कसौटी बनाना होगा।
गांधी जी के विचारों को आज की परिस्थितियों में समझकर शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम विकास, रोजगार और प्रशासन में व्यावहारिक कदम उठाने की आवश्यकता है। योजनाओं के स्पष्ट लक्ष्य हों, प्रगति की सार्वजनिक समीक्षा हो और विफलताओं की जिम्मेदारी तय हो।
गांधी जयंती हमें यह पूछने का अवसर देती है कि उनके नाम पर हमने कितने कार्यक्रम किए, इसके साथ उनके सपनों की दिशा में कितना काम किया। उनकी तस्वीरों पर अर्पित श्रद्धा तभी जीवन में उतरेगी, जब किसान को सम्मान, मजदूर को न्याय, स्त्री को सुरक्षा, युवा को अवसर और गरीब को व्यवस्था में अपनी भागीदारी का भरोसा मिलेगा। यही गांधी जी के अधूरे सपनों को पूरा करने की दिशा में सार्थक कदम होगा।








