गुरुग्राम में कांग्रेस के प्रदर्शन के बाद संगठन की सक्रियता पर चर्चा; पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और जनता से दूरी की शिकायतें
ऋषिप्रकाश कौशिक
गुरुग्राम, 28 सितंबर। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर सोमवार को हुए कांग्रेस के प्रदर्शन ने स्थानीय संगठन के सामने भी कुछ सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदेश स्तर के प्रमुख नेताओं और कई बड़े चेहरों की मौजूदगी वाले इस कार्यक्रम में जुटी भीड़ को लेकर पार्टी के भीतर चर्चा है। सवाल उठ रहा है कि गुरुग्राम में कांग्रेस अपनी राजनीतिक जगह मजबूत करने के लिए जनता और अपने पुराने कार्यकर्ताओं से कितना संपर्क बना पा रही है।
जिला कांग्रेस की ग्रामीण और शहरी इकाइयों के संयुक्त आयोजन में कार्यकर्ता कमान सराय स्थित पार्टी कार्यालय से सदर बाजार तक मार्च करते हुए पहुंचे। पार्टी के प्रेस नोट में इसे विशाल विरोध प्रदर्शन बताया गया है। दूसरी ओर, कुछ कांग्रेस कार्यकर्ताओं का अनुमान है कि कार्यक्रम में करीब पांच सौ से छह सौ लोग ही जुटे। उपस्थिति की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कार्यकर्ताओं का यह आकलन संगठन की तैयारी और जनसंपर्क को लेकर उनके असंतोष को सामने लाता है।
नेताओं की मौजूदगी, कितनी हुई लामबंदी?
कार्यक्रम में प्रदेश प्रभारी, प्रदेश अध्यक्ष, पूर्व सांसद तथा अन्य प्रमुख नेता उपस्थित थे। प्रदेश महिला नेतृत्व और पूर्व मंत्री स्तर के चेहरे भी शामिल रहे। ऐसे में कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि दोनों जिला इकाइयों के संयुक्त प्रयास और प्रदेश नेतृत्व की मौजूदगी के अनुरूप अधिक भागीदारी की अपेक्षा थी।
चर्चा यह भी है कि जब कार्यक्रम केंद्रीय नेतृत्व के आह्वान पर हो और उसमें लोकप्रिय चेहरे भी पहुंचें, तब स्थानीय संगठन की जिम्मेदारी केवल मंच और मार्च की व्यवस्था तक सीमित नहीं रहती। पुराने साथियों को जोड़ना, मोहल्लों तक संदेश पहुंचाना और आम लोगों को मुद्दे से जोड़ना भी उसी जिम्मेदारी का हिस्सा है।
हालांकि किसी एक प्रदर्शन की भीड़ से किसी दल के पूरे जनाधार का अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। फिर भी अपने ही कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं और आयोजन के बीच दिखाई देने वाला अंतर आत्ममंथन का विषय जरूर है।
कार्यकर्ताओं की बात सुने कौन?
कुछ पुराने कांग्रेस कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि स्थानीय पदाधिकारियों से मिलना और अपनी बात पहुंचाना आसान नहीं रह गया है। उनका कहना है कि पार्टी कार्यालय में नियमित संवाद और सुनवाई की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जहां कार्यकर्ता के साथ सामान्य नागरिक भी अपनी समस्या रख सके।
कार्यकर्ताओं के एक वर्ग का आरोप है कि कार्यालय पहुंचने पर कई बार कोई जिम्मेदार पदाधिकारी नहीं मिलता। यदि ऐसी शिकायतें बनी रहती हैं तो पार्टी कार्यालय जनता और संगठन के बीच संपर्क का प्रभावी केंद्र कैसे बन पाएगा?
विपक्षी दल के लिए यह सवाल खास मायने रखता है। लोगों को उससे उम्मीद रहती है कि वह उनकी बात सुनेगा, संबंधित विभागों तक पहुंचाएगा और जरूरत पड़ने पर उनके साथ खड़ा होगा।
पुराने साथियों की उपेक्षा की शिकायत
स्थानीय संगठन में जिम्मेदारियों के बंटवारे को लेकर भी असंतोष की बातें सामने आ रही हैं। कुछ पुराने कार्यकर्ताओं का दावा है कि ऐसे लोगों को जगह मिली है जिनकी कांग्रेस में सक्रियता उन्हें नगर निगम चुनाव से पहले दिखाई नहीं देती थी, जबकि लंबे समय से जुड़े कई साथियों को पर्याप्त महत्व नहीं मिला।
नए लोगों को पार्टी से जोड़ना संगठन के विस्तार का हिस्सा है। सवाल यह है कि क्या इस प्रक्रिया में पुराने कार्यकर्ताओं के अनुभव और योगदान को भी उचित स्थान मिल रहा है? नए और पुराने साथियों के बीच संवाद के अभाव में संगठन का विस्तार कागजों पर तो दिख सकता है, लेकिन उसका असर जमीन पर सीमित रह सकता है।
कार्यक्रम में कुछ पुराने कार्यकर्ताओं और पिछले विधानसभा चुनाव के कुछ चेहरों की गैरमौजूदगी भी चर्चा में रही। अनुपस्थिति के कारण स्पष्ट नहीं हैं, इसलिए इसे सीधे गुटबाजी या नाराजगी का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। फिर भी संयुक्त जिला आयोजन में सभी प्रमुख साथियों की भागीदारी सुनिश्चित करना संगठन की जिम्मेदारी है।
ऊपर तक पहुंच, नीचे कितना संपर्क?
असंतुष्ट कार्यकर्ताओं की बातों में एक शिकायत बार-बार उभरती है—स्थानीय नेतृत्व की प्राथमिकता प्रदेश के बड़े नेताओं के सामने सक्रिय दिखना अधिक और आम कार्यकर्ता के बीच उपलब्ध रहना कम हो गई है। यह उनका आरोप है, जिसकी निष्पक्ष पड़ताल जरूरी है। लेकिन ऐसी धारणा का पार्टी के भीतर बनना भी नेतृत्व के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।
संगठन केवल नियुक्तियों, स्वागत समारोहों और मंच पर मौजूदगी से मजबूत नहीं होता। उसकी वास्तविक ताकत यह है कि कार्यकर्ता बिना संकोच अपनी बात कह सके और नागरिक को भरोसा हो कि उसकी समस्या पर कोई सुनवाई करेगा।
उपलब्ध प्रेस नोट में प्रदर्शन की मांगों और नेताओं के वक्तव्यों का विवरण है, लेकिन संगठन की उपलब्धता, पुराने कार्यकर्ताओं की भागीदारी तथा जिम्मेदारियों के बंटवारे से जुड़ी इन शिकायतों पर पक्ष शामिल नहीं है।
गुरुग्राम में कांग्रेस के सामने चुनौती केवल सरकार और चुनाव आयोग से सवाल पूछने की नहीं, अपने संगठन के भीतर उठ रहे सवालों को सुनने की भी है। सोमवार का प्रदर्शन राजनीतिक संदेश देने का प्रयास था। अब पार्टी को यह देखना होगा कि उस संदेश के साथ कितने कार्यकर्ता मन से जुड़े और कितने नागरिकों तक उसकी पहुंच बनी। गुरुग्राम में अपनी जगह मजबूत करने का रास्ता नियमित जनसंपर्क, सुलभ नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के सम्मान से होकर ही निकलेगा।








