जलभराव, भूजल रिचार्ज और वर्षा जल प्रबंधन के लिए सरकारी एजेंसियों, विशेषज्ञों, समुदायों और उद्योग जगत के बीच समन्वित प्रयास जरूरी : विपुल गोयल
गुरुग्राम में 159 जलभराव संभावित स्थान चिह्नित, जल सुरक्षा के लिए समग्र योजना पर दिया जोर
हिपा और संकला फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में ‘क्लाइमेट रेजिलिएंट रेनवॉटर मैनेजमेंट फॉर वाटर सिक्योरिटी’ विषय पर राष्ट्रीय सेमिनार
गुरुग्राम, 28 सितंबर। गुरुग्राम में वर्षा जल प्रबंधन और जल सुरक्षा की चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार, संबंधित विभागों, इंजीनियरों, विशेषज्ञों, स्थानीय समुदायों और उद्योग जगत के बीच समन्वित प्रयास आवश्यक हैं। यह बात हरियाणा के राजस्व एवं आपदा प्रबंधन, शहरी स्थानीय निकाय तथा नागरिक उड्डयन मंत्री विपुल गोयल ने सोमवार को गुरुग्राम में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार ‘क्लाइमेट रेजिलिएंट रेनवॉटर मैनेजमेंट फॉर वाटर सिक्योरिटी’ के उद्घाटन अवसर पर कही। यह सेमिनार हरियाणा लोक प्रशासन संस्थान (हिपा) और संकला फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में गुरुग्राम की जल प्रबंधन संबंधी चुनौतियों पर विचार-विमर्श के लिए आयोजित किया गया।
श्री विपुल गोयल ने बताया कि गुरुग्राम में 159 जलभराव संभावित स्थानों की पहचान की गई है। उन्होंने जलभराव की समस्या के स्थायी समाधान, बेहतर ड्रेनेज व्यवस्था और भूजल रिचार्ज के लिए संबंधित एजेंसियों एवं विभागों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि गुरुग्राम की जल संबंधी चुनौतियों का समाधान केवल किसी एक व्यवस्था तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि इसके लिए शहरी विकास, जलवायु परिवर्तन, ड्रेनेज व्यवस्था और प्राकृतिक जल प्रणालियों को ध्यान में रखते हुए समग्र योजना तैयार करनी होगी।
हरियाणा लोक प्रशासन संस्थान (हिपा) प्रदेश में लोक प्रशासन, सुशासन, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में प्रमुख संस्थान के रूप में कार्य कर रहा है। गुरुग्राम की जल सुरक्षा से जुड़ी स्थानीय चुनौतियों के समाधान के लिए व्यावहारिक उपाय विकसित करने के उद्देश्य से हिपा और गैर-लाभकारी संस्था संकला फाउंडेशन द्वारा संयुक्त रूप से यह पहल की गई है। इस अध्ययन को भारत-डेनमार्क ग्रीन स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप के तहत भारत में डेनमार्क के दूतावास का सहयोग प्राप्त है।
जल सुरक्षा के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप समाधान जरूरी : भरत लाल
नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन, इंडिया के पूर्व महासचिव एवं सीईओ तथा जल जीवन मिशन के संस्थापक मिशन निदेशक भरत लाल ने भारत-डेनमार्क ग्रीन स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप जैसे सहयोग की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जल प्रबंधन, पर्यावरणीय स्थिरता और जलवायु अनुकूलन के क्षेत्रों में दोनों देश एक-दूसरे के अनुभवों से सीख सकते हैं। गुजरात में अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने जल भंडारण, भूजल रिचार्ज, नहरों और जल संरक्षण कार्यक्रमों से जुड़े विभिन्न प्रयासों का उल्लेख किया, जिनमें सुजलाम सुफलाम जैसी पहल भी शामिल है।
भरत लाल ने कहा कि जल प्रबंधन से जुड़े समाधान किसी एक स्थान से सीधे दूसरे स्थान पर लागू नहीं किए जा सकते, बल्कि उन्हें भौगोलिक एवं स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तैयार करना आवश्यक है। उन्होंने जल, स्वच्छता, साफ-सफाई और जन स्वास्थ्य को एक साथ देखने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि सार्थक बदलाव स्थानीय स्तर से शुरू होता है और जब समुदाय स्थानीय चुनौतियों के समाधान में सक्रिय भागीदारी करते हैं, तब स्थायी परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।
बारिश के पानी को बहाने के बजाय संग्रहण और पुनर्भरण पर जोर : डेनमार्क के राजदूत
भारत में डेनमार्क के राजदूत महामहिम श्री रासमस एबिल्डगार्ड क्रिस्टेंसन ने कहा कि शहरी जल सुरक्षा के लिए केवल अतिरिक्त वर्षा जल को निकालने के बजाय उसे धीमा करने, संग्रहित करने, संचित करने, भूजल में पुनर्भरण करने और पुनः उपयोग करने की व्यापक रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। उन्होंने बाढ़, भूजल, अपशिष्ट जल और जल आपूर्ति को अलग-अलग चुनौतियों के रूप में देखने के बजाय संपूर्ण शहरी जल चक्र को एक साथ समझने पर जोर दिया।
उन्होंने गुरुग्राम को एक महत्वपूर्ण उदाहरण बताते हुए पारंपरिक बुनियादी ढांचे के साथ नेचर-बेस्ड अप्रोच अपनाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने शहरी नियोजन, संस्थाओं, समुदायों और व्यवसायों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। डेनमार्क के 2011 के कोपेनहेगन क्लाउडबर्स्ट के अनुभव का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर और शहरी स्थानों के पुनर्रचना के माध्यम से अत्यधिक वर्षा की स्थिति से निपटने में मदद मिल सकती है।
जल संरक्षण को स्थानीय स्तर पर जनभागीदारी से जोड़ने की जरूरत : मनोज यादव
सेमिनार को संबोधित करते हुए मनोज यादव ने कहा कि यह आयोजन ऐसे समय में हो रहा है, जब मानसून के दौरान देश के कुछ हिस्सों में गंभीर सूखे, जबकि अन्य क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति देखने को मिली है। उन्होंने कहा कि वर्षा के दौरान पानी को संरक्षित नहीं कर पाने के कारण बड़ी मात्रा में पानी बहकर नदियों में चला जाता है, जिससे कई स्थानों पर नुकसान भी होता है। उन्होंने कहा कि गुरुग्राम जैसे आईटी, सॉफ्टवेयर, लॉजिस्टिक्स और ऑटोमोबाइल उद्योग के प्रमुख केंद्र के लिए जल प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियों का अपना अलग महत्व है।
संकला फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक देवेंद्र कुमार निम ने कहा कि जलवायु अनुकूल वर्षा जल प्रबंधन और जल सुरक्षा को लेकर संवाद एवं विचार-विमर्श निरंतर जारी रहना चाहिए।
सेमिनार में गुरुग्राम नगर निगम के अतिरिक्त आयुक्त रविंदर यादव, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर एवं आईएनआरएम कंसल्टेंट्स के संस्थापक एवं निदेशक डॉ. ए.के. गोसाईं, हरियाणा जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (पीएचईडी) के अधीक्षण अभियंता संजीव दूहन, संयुक्त राष्ट्र परियोजना सेवा कार्यालय (यूएनओपीएस) के कंट्री मैनेजर विनोद मिश्रा, फरीदाबाद महानगर विकास प्राधिकरण के सलाहकार ललित कुमार, राष्ट्रीय शहरी कार्य संस्थान (एनआईयूए) के परियोजना अधिकारी अनिरुद्ध सोनी, जल संसाधन एवं पर्यावरण विशेषज्ञ तथा संकला फाउंडेशन के विशिष्ट फेलो डॉ. शिव सिंह रावत, गुरुजल की सह-संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी शुभी केसरवानी, राहगिरी फाउंडेशन की निदेशक निधि मदान, नवज्योति इंडिया फाउंडेशन की समन्वय निदेशक एवं डब्ल्यूआईसीसीआई की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. चांदनी बेदी, राइजिंग होम सोसाइटी के पूर्व अध्यक्ष एवं नगर निगम मानेसर के स्वच्छ भारत मिशन के ब्रांड एंबेसडर प्रवीण मलिक तथा ग्लोबल वाटर एंड सैनिटेशन सेंटर के सलाहकार डॉ. आलोक सुमन सहित अनेक विशेषज्ञों ने भाग लिया।








