119वीं जयंती पर शहीद-ए-आजम को किया नमन, युवाओं से उनके विचारों और आदर्शों से प्रेरणा लेने का आह्वान

28 सितंबर 2026। अमर शहीद एवं महान क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह की 119वीं जयंती पर स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने अपने कार्यालय में उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि भगत सिंह का नाम भारतीय इतिहास में सदैव स्वर्णिम अक्षरों में अंकित रहेगा। राष्ट्र की सेवा और गरीबों के अधिकारों की रक्षा के लिए काम करने वाले युवाओं को उनका जीवन हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।
विद्रोही ने कहा कि भगत सिंह को सच्ची श्रद्धांजलि उनके चित्र पर पुष्प अर्पित करने के साथ-साथ उनके विचारों को जीवन में अपनाने से होगी। गैरबराबरी, जातिवाद, क्षेत्रवाद, आतंकवाद और भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करते हुए समतामूलक समाजवादी समाज के निर्माण के लिए काम करना ही उनके प्रति वास्तविक सम्मान है।
परिवार से मिली देशभक्ति की सीख
विद्रोही ने कहा कि 28 सितंबर 1907 को तत्कालीन पंजाब के लायलपुर जिले में जन्मे भगत सिंह को देशभक्ति और स्वतंत्रता संघर्ष के संस्कार अपने परिवार से मिले थे। पिता सरदार किशन सिंह और माता विद्यावती के घर जन्मे इस बालक को दादा अर्जुन सिंह और दादी जयकौर ने ‘भागों वाला’ कहकर भगत नाम दिया।
उन्होंने कहा कि बचपन से ही क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित भगत सिंह में लाहौर में कॉलेज की शिक्षा के दौरान समाजवादी चिंतन और देश को अंग्रेजी शासन से मुक्त कराने का संकल्प और मजबूत हुआ। इसी संकल्प ने उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन का ऐसा नायक बनाया, जिसका साहस, त्याग और वैचारिक प्रतिबद्धता आज भी देशवासियों को प्रेरित करती है।
अंग्रेजी शासन को दी खुली चुनौती
विद्रोही ने कहा कि भगत सिंह ने चंद्रशेखर आजाद और अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध संगठित संघर्ष को आगे बढ़ाया। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन संगठन के माध्यम से उन्होंने स्वतंत्रता के साथ शोषणमुक्त समाज की स्थापना का विचार भी सामने रखा।
उन्होंने कहा कि लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में निकाले गए जुलूस पर पुलिस के लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनका निधन हो गया। इस घटना ने भगत सिंह और उनके साथियों को झकझोर दिया। इसके बाद सांडर्स की हत्या कर क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी शासन को खुली चुनौती दी।
अदालत को बनाया विचारों की आवाज
विद्रोही ने कहा कि दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में बम धमाके और पर्चे फेंकने की कार्रवाई के माध्यम से भगत सिंह और उनके साथियों ने क्रांतिकारियों का संदेश दुनिया तक पहुंचाया। कार्रवाई के बाद भागने के बजाय गिरफ्तारी देना उनके उद्देश्य और वैचारिक दृढ़ता को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि क्रांतिकारी चाहते थे कि मुकदमे के दौरान अदालत के माध्यम से दुनिया यह जाने कि उनके लिए आजादी का अर्थ क्या है और वे अंग्रेजी साम्राज्य से मुक्ति क्यों चाहते हैं। उन्होंने अपने ऊपर चल रहे मुकदमे को स्वतंत्रता, समानता और शोषण के विरुद्ध अपने विचार सामने रखने का माध्यम बनाया तथा अपने संदेश को व्यापक जनमानस तक पहुंचाने में सफलता हासिल की।
बलिदान ने बनाया पीढ़ियों का प्रेरणास्रोत
विद्रोही ने कहा कि 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी देकर अंग्रेजी सरकार ने उनके जीवन का अंत कर दिया, लेकिन उनके विचारों और बलिदान की प्रेरणा को समाप्त नहीं कर सकी। उन्होंने फांसी की कार्रवाई को अंग्रेजी शासन का कायरतापूर्ण कृत्य बताते हुए कहा कि यह घटना इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है।
उन्होंने कहा कि देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले भगत सिंह पूरे देश के नायक और आने वाली पीढ़ियों के प्रेरणास्रोत बन गए। उनका जीवन बताता है कि राष्ट्र और समाज के प्रति प्रतिबद्धता के लिए साहस के साथ स्पष्ट विचार और त्याग की भावना भी आवश्यक है।
समानता के संकल्प को आगे बढ़ाने का आह्वान
विद्रोही ने कहा कि आज भी जो लोग आतंकवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद, गैरबराबरी और भ्रष्टाचार से लड़कर समानता पर आधारित समाज बनाना चाहते हैं, उनके लिए भगत सिंह के विचार मार्गदर्शक हैं।
उन्होंने आह्वान किया कि शहीद-ए-आजम की जयंती पर उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया जाए। गरीबों और वंचितों के अधिकारों की रक्षा तथा समतामूलक समाजवादी समाज की स्थापना के लिए निरंतर काम करना ही इस महान क्रांतिकारी को सही अर्थों में श्रद्धांजलि होगी।








