सांपला नगरपालिका चुनाव में “सिद्धांत बनाम जीत” की बहस तेज, पुराने कार्यकर्ताओं में बढ़ा असंतोष
रोहतक। करीब 12 साल से सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अब अपने ही कार्यकर्ताओं के भरोसे को लेकर सवालों के घेरे में नजर आ रही है। सांपला नगरपालिका चुनाव में पूर्व चेयरमैन परवीन कोच पर दांव लगाए जाने की चर्चा ने संगठन के भीतर उठ रही नाराजगी को खुलकर सामने ला दिया है।
स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद पार्टी जमीनी स्तर पर ऐसा नेतृत्व तैयार नहीं कर पाई, जिस पर टिकट के समय भरोसा किया जा सके। परवीन कोच का कांग्रेस पृष्ठभूमि से आकर भाजपा में शामिल होना और संभावित प्रत्याशी के रूप में उभरना इसी रणनीति का संकेत माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भाजपा की यह रणनीति चुनावी दृष्टि से भले ही लाभकारी साबित हो, लेकिन इससे संगठनात्मक असंतोष बढ़ना तय है। वर्षों से पार्टी के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं में यह भावना मजबूत हो रही है कि टिकट वितरण के समय उनकी लगातार अनदेखी की जा रही है।
कार्यकर्ता हरियाणा की चर्चित कहावत—“12 साल में कुड़ड़ी की भावहड़ जाती है”—का हवाला देते हुए सवाल उठा रहे हैं कि जब इतने समय में आम व्यक्ति भी विकसित हो जाता है, तो पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को नेतृत्व के योग्य क्यों नहीं बना सकी।
सांपला के राजनीतिक परिदृश्य में परवीन कोच का नाम सामने आने के बाद “सिद्धांत बनाम जीत” की बहस और तेज हो गई है। एक ओर पार्टी इसे जीत सुनिश्चित करने की रणनीति बता रही है, वहीं दूसरी ओर कार्यकर्ता इसे अपने आत्मसम्मान और पहचान से जोड़कर देख रहे हैं।
लोकसभा से लेकर नगरपालिका स्तर तक कांग्रेस पृष्ठभूमि के नेताओं को मौका देने की प्रवृत्ति ने पुराने कार्यकर्ताओं में असंतोष को और गहरा किया है। उनका कहना है कि 12 साल सत्ता में रहने के बावजूद उनकी आवाज को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा।
अब बड़ा सवाल यही है—क्या पार्टी अपने ही कार्यकर्ताओं की क्षमता पर भरोसा खो रही है, या फिर जीत की राजनीति ने सिद्धांतों को पीछे छोड़ दिया है?








