महिला आरक्षण बिल पर नाकामी: सरकार की चूक, विपक्ष पर प्रहार

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कमलेश पांडेय ……… वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक के गिरने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का “राष्ट्र के नाम” संबोधन राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। जहां एक ओर सरकार ने इस विफलता का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ा, वहीं कई सवाल खुद सरकार की रणनीति और नीयत पर खड़े हो रहे हैं।

सरकार की रणनीति या जिम्मेदारी से बचाव?

प्रधानमंत्री का संबोधन विपक्ष पर तीखा हमला था, लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सरकार यह स्पष्ट करे कि जब ओबीसी और ईडब्ल्यूएस को अन्य क्षेत्रों में आरक्षण मिल चुका है, तो संसद और विधानसभाओं में इसे लागू करने के लिए परिसीमन की शर्त क्यों जोड़ी गई।

क्या सरकार चाहती तो तदर्थ व्यवस्था के तहत राजनीतिक दलों को टिकट वितरण में आरक्षण लागू करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती थी? यह सवाल राजनीतिक गलियारों में लगातार उठ रहा है।

संख्याओं में हार, राजनीति में वार

वोटिंग में विधेयक को 298 समर्थन और 230 विरोध वोट मिले, लेकिन दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा पार नहीं हो सका। यह तथ्य अपने आप में बताता है कि सरकार सदन में आवश्यक समर्थन जुटाने में विफल रही।

इसके बावजूद विपक्ष को “महिला विरोधी” करार देना एक राजनीतिक नैरेटिव तो हो सकता है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।

विपक्ष का पलटवार और नई एकजुटता

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री के संबोधन को “डिस्ट्रेस एड्रेस” बताया। वहीं राहुल गांधी ने सरल महिला आरक्षण बिल लाने की बात कहकर विपक्ष को नैतिक बढ़त दिलाने की कोशिश की।

इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्षी दलों को एकजुट होने का नया आधार दे दिया है।

परिसीमन: असली विवाद की जड़

विवाद का सबसे बड़ा कारण परिसीमन है। दक्षिण भारत के कई दलों को आशंका है कि जनसंख्या आधारित परिसीमन से उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी कम हो सकती है।

ऐसे में सवाल उठता है—क्या सरकार को क्षेत्रफल या अन्य मानकों पर आधारित वैकल्पिक मॉडल पर विचार नहीं करना चाहिए था?

ओबीसी और ईडब्ल्यूएस: अधूरा एजेंडा

लोकसभा और विधानसभाओं में ओबीसी और ईडब्ल्यूएस आरक्षण अभी भी अधूरा है।

  • ओबीसी आरक्षण का पूरा क्रियान्वयन परिसीमन और जातिगत जनगणना पर निर्भर है
  • ईडब्ल्यूएस कोटा (103वां संशोधन) अभी केवल शिक्षा और नौकरियों तक सीमित है

विधेयक गिरने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि ये सभी प्रावधान अब 2029 के बाद ही लागू हो पाएंगे।

राजनीतिक असर: 2029 की तैयारी

इस पूरे घटनाक्रम को 2029 लोकसभा चुनाव की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।

  • भाजपा इसे “महिला अधिकार बनाम विपक्ष” के नैरेटिव में बदल रही है
  • विपक्ष इसे “संविधान और संतुलन बचाने” की लड़ाई बता रहा है

यानी, एक विधेयक की विफलता अब बड़े चुनावी मुद्दे में तब्दील हो चुकी है।

निष्कर्ष

महिला आरक्षण का मुद्दा अब केवल एक विधेयक तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सत्ता, सामाजिक संतुलन और राजनीतिक रणनीति का केंद्र बन चुका है।

सरकार के लिए चुनौती है—क्या वह इसे ठोस नीति में बदल पाएगी या यह मुद्दा भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में ही उलझकर रह जाएगा?

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Author: Bharat Sarathi

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