अक्षय तृतीया – 19 अप्रैल 2026 (प्रदोष काल)विशेष प्रस्तुति : जब धर्म की रक्षा के लिए क्रोध बना अवतार

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परशुराम जयंती विशेष: क्या वास्तव में ‘DNA’ में स्थापित था दैवी क्रोध?

आचार्य डॉ महेन्द्र शर्मा ‘महेश’
धर्म की स्थापना के लिए अवतरित भगवान परशुराम

सनातन धर्म केवल आस्था नहीं, बल्कि एक गहन विज्ञान भी है। जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है, तब ईश्वर विशेष उद्देश्य के साथ अवतार लेते हैं। त्रेतायुग में भगवान परशुराम का अवतरण भी एक ऐसी ही दिव्य योजना का परिणाम था, जिसमें “क्रोध” को धर्म की रक्षा का माध्यम बनाया गया।

जब अत्याचार ने सीमा लांघी

त्रेतायुग में पृथ्वी पर अन्याय और अत्याचार अपने चरम पर था। सहस्रबाहु अपने भुजबल के अहंकार में डूबा हुआ था, वहीं रावण अपने ज्ञान के अभिमान में अंधा हो चुका था। धर्म, मर्यादा और संतुलन समाप्त होते जा रहे थे।

ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट हो गया कि अब केवल शांति से काम नहीं चलेगा।
कांटे को कांटे से निकालना आवश्यक था — अर्थात अत्याचार का अंत उसी के अनुरूप शक्ति से करना ही होगा।

‘DNA’ में क्रोध – एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण

आधुनिक विज्ञान के अनुसार DNA और जीन के माध्यम से गुण पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होते हैं। सनातन दृष्टिकोण में भी यह माना गया है कि विशेष गुण और संस्कार वंश परंपरा में प्रवाहित होते हैं।

महर्षि भृगु की लीला के माध्यम से एक विशेष “क्रोध-ऊर्जा” को भृगुवंश में स्थापित किया गया, जो आगे चलकर भगवान परशुराम के रूप में प्रकट हुई। यह क्रोध सामान्य नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए नियोजित और नियंत्रित शक्ति था।

कैसा था परशुराम का क्रोध

अहंकार रहित
नियंत्रित और संयमित
केवल अधर्म के विरुद्ध प्रयुक्त
धर्म की स्थापना के लिए समर्पित

मुख्य विचार

“जब शांति पर्याप्त न हो, तब नियंत्रित क्रोध भी धर्म का स्वरूप बन जाता है।”

संपादकीय दृष्टिकोण

आज के समय में समाज दो अतियों में बंटा दिखाई देता है—एक ओर अन्याय को सहने की प्रवृत्ति, और दूसरी ओर अनियंत्रित क्रोध। भगवान परशुराम का चरित्र हमें संतुलन का मार्ग दिखाता है।

संतुलन का दर्शन

भगवान परशुराम के व्यक्तित्व में उग्रता और करुणा दोनों का अद्भुत संगम है। वे अन्याय का कठोरता से प्रतिकार करते हैं, लेकिन पश्चाताप करने वालों को क्षमा भी प्रदान करते हैं। यही संतुलन उन्हें विशिष्ट बनाता है।

उपसंहार

भगवान परशुराम का जीवन यह संदेश देता है कि धर्म की रक्षा के लिए केवल सहनशीलता ही नहीं, बल्कि समय आने पर साहस और दृढ़ प्रतिकार भी आवश्यक है। नियंत्रित शक्ति ही सच्चे धर्म की पहचान है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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