आखिर पश्चिम बंगाल में ‘चुनावी जंगलराज’ के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं?

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कमलेश पांडेय

पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान 7 न्यायिक अधिकारियों, जिनमें 3 महिलाएं भी शामिल थीं, के साथ हुई दुर्व्यवहार की घटना वहां के कानून-व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाती है। चूंकि राज्य में चुनावी प्रक्रिया चल रही है और राज्य प्रशासन चुनाव आयोग के अधीन है, इसलिए मौजूदा स्थिति के लिए ममता सरकार को दोषी ठहराना न्यायोचित नहीं है। बेहतर होगा पश्चिम बंगाल में ‘चुनावी जंगलराज’ के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए जो कि तमाम राजनीतिक अराजकता की जड़ बन चुके हैं! सवाल विधि के शासन का है जो विरोधाभासों  से भरे पड़े संविधान के समक्ष दम तोड़ता प्रतीत हो रहा है, इसलिए संविधान के संरक्षक सुप्रीम कोर्ट की इस कार्रवाई में भविष्य के लिए स्पष्ट नजीर दिखनी चाहिए अन्यथा भारत और भारतवासियों का भला नहीं होगा!

दरअसल, मालदा के कयाचक क्षेत्र में वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के विरोध में सैकड़ों लोगों ने 1 अप्रैल 2026 को दोपहर 3:30 बजे से 9 घंटे से अधिक समय तक अधिकारियों को घेर लिया। प्रदर्शनकारियों ने बीडीओ कार्यालय में अधिकारियों को बंधक बनाया जहां उन्हें भोजन-पानी के बिना रखा गया। सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पत्र पर स्वत: संज्ञान लिया। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी, मालदा डीएम व एसपी को कारण बताओ (शो-कॉज) नोटिस जारी किया और 6 अप्रैल को ऑनलाइन सुनवाई बुलाई। 

सुप्रीम कोर्ट ने इसे “नागरिक व पुलिस प्रशासन की पूर्ण विफलता” बताया तथा सीबीआई या एनआईए से जांच के निर्देश दिए जिसे चुनाव आयोग ने सीबीआई को सौंप दिया। यह घटना न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमले के रूप में देखी जा रही है जिसके राजनीतिक मायने खतरनाक हैं क्योंकि बीजेपी ने टीएमसी पर भीड़ भड़काने का आरोप लगाया, साथ ही इसे “लॉ एंड ऑर्डर की विफलता” और “नकली वोटरों के नाम डिलीट होने का डर” बताया। वहीं, टीएमसी ने बीजेपी व चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराया और एसआईआर को “गंदी साजिश” कहा। उल्लेखनीय है कि आगामी विधानसभा चुनावों (23-29 अप्रैल) से ठीक पहले इस विवाद के उभरने से राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज हुए हैं।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने मालदा घटना पर पश्चिम बंगाल सरकार को कड़ी फटकार लगाई और इसे न्यायिक अधिकारियों को डराने-धमकाने की सुनियोजित साजिश और अदालत के अधिकार को खुली चुनौती बताया। कोर्ट ने राज्य प्रशासन की निष्क्रियता पर सख्ती दिखाते हुए इसे कानून-व्यवस्था की पूर्ण विफलता करार दिया। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “यह कोई सामान्य विरोध नहीं बल्कि एसआईआर की प्रक्रिया को बाधित करने का पूर्वनियोजित प्रयास था।” इससे प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठते हैं। आखिर “रात 11 बजे तक डीएम-एसपी  क्यों नहीं पहुंचे? जब राजनीतिक नेता मौके पर थे तो प्रशासन क्यों सो रहा था?” इसे न्यायपालिका पर हमला बताते हुए “घिनौना प्रयास” कहा जो चुनावी प्रक्रिया को पटरी से उतारने का मकसद रखता था। 

ततपश्चात कोर्ट ने मुख्य सचिव, डीजीपी, मालदा डीएम-एसपी को कारण बताओ (शो-कॉज) नोटिस जारी किया और 6 अप्रैल को सुनवाई बुलाई। वहीं, चुनाव आयोग को एसआईआर से जुड़े अधिकारियों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय बल तैनात करने तथा भीड़ नियंत्रण (5 से अधिक लोगों पर रोक) के निर्देश दिए। साथ ही सीबीआई/एनआईए जांच का सुझाव भी दिया।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मालदा घटना पर चुनाव आयोग को दोषी ठहराते हुए कहा कि राज्य प्रशासन उनके नियंत्रण में नहीं रहा। उन्होंने दावा किया कि उन्हें घटना की जानकारी आधी रात को एक पत्रकार से मिली और एसआईआर प्रक्रिया से लोगों का गुस्सा जायज है। ममता ने कहा, “मुझे नहीं पता वे कौन थे जिन्होंने अधिकारियों का घेराव किया लेकिन एसआईआर से लोग नाराज हैं।” उन्होंने चुनाव आयोग पर आरोप लगाया कि चुनाव से पहले शीर्ष अधिकारियों के तबादले से “सुपर राष्ट्रपति शासन” चल रहा है। बीजेपी को जिम्मेदार बताते हुए जांच की मांग की और कहा, “मेरी सारी शक्तियां छीन ली गईं।” ममता का यह बयान सागरदिघी या धूमुरपहाड़ी रैली में आया जहां उन्होंने टीएमसी को निर्दोष बताया।  सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद यह चुनाव आयोग व बीजेपी पर हमला है, जो आगामी चुनावों में ध्रुवीकरण बढ़ा रहा है। 

बेहतर होगा कि इस मामले में केंद्रीय मुख्य चुनाव आयुक्त, राज्य के पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव के अलावा मालदा डीएम, एसपी को अविलंब नौकरी से बर्खास्त किया जाना चाहिए क्योंकि चुनावी दिनों में इन सबकी अविवेकी हरकतों से एक निर्वाचित सरकार की बदनामी बढ़ी है और इसके चुनावी दुष्प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे प्रशासनिक विफलता और आपराधिक अवमानना करार देते हुए कड़ी फटकार लगाई है। 

यह कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर राज्य में सक्रिय न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षा प्रदान करने में राज्य प्रशासन ने घोर कोताही बरती। यह महाजंगल राज नहीं तो क्या है? आखिर ऐसी नौबत क्यों आई, शोध का विषय है। उचित तो यह होगा कि इस उपद्रव में शामिल लोगों के व्यवहार को अराजक घोषित करते हुए इनके मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड, पैन कार्ड, राशनकार्ड आदि जब्त किया जाए और तमाम सरकारी सुविधाओं से ऐसे उग्र लोगों को वंचित किया जाए। साथ ही इन्हें उकसाने वाले राजनीतिक दलों की मान्यता रद्द की जाए और इसके प्रदेश अध्यक्ष को अविलंब गिरफ्तार किया जाए। यदि ऐसी सख्त कार्रवाई होगी, तभी भारत में स्वस्थ लोकतंत्र बहाल किया जा सकता है, अन्यथा नहीं!

देखा जाए तो पहले दिल्ली में आप पार्टी की केजरीवाल सरकार और अब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की ममता सरकार के खिलाफ केंद्रीय प्रशासनिक अधिकारियों का जिस तरह से दुरूपयोग किया जा रहा है और राज्य प्रशासन के अधिकारियों के साथ उनके नीतिगत काउंटर हो रहे हैं, उसे कतई निष्पक्ष करार नहीं दिया जा सकता है क्योंकि चुनी हुई सरकारों को ‘बर्बरतापूर्ण’ तरीक़े से हटाने की सियासी परिस्थिति पैदा करने में इनकी अहम भूमिका है। केंद्र और राज्य प्रशासन में सक्रिय पक्षपाती तत्वों की शिनाख्त होनी चाहिए क्योंकि जो हो रहा है, वह अस्वीकार्य है। यह संवैधानिक और न्यायिक विफलता है और इसके पीछे सम्बन्धित अधिकारियों की सियासी मिलीभगत की जांच होनी चाहिए। ताकि कानून का शासन बहाल हो और राजनीतिक नंगानाच पर लगाम लगे। यक्ष प्रश्न है कि आखिर पश्चिम बंगाल में ‘चुनावी जंगलराज’ के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं?

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Author: Bharat Sarathi

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