बदलते समय में नागरिक विवेक की परीक्षा

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बाबूलाल नागा    

दुनिया आज मेरे आगे खड़ी है—तेज रफ्तार, चमकदार दावों और असहज सवालों के साथ। यह वह दुनिया है जो पहले से कहीं अधिक जुड़ी हुई है पर उतनी ही बिखरी भी। तकनीक ने सीमाएं मिटाई हैं लेकिन मानवीय संवेदनाओं के बीच कई नई दीवारें भी खड़ी कर दी हैं। सूचना की बाढ़ में सच तैर रहा है पर शोर इतना अधिक है कि उसकी आवाज अक्सर दब जाती है। ऐसे समय में नागरिक होना केवल अधिकारों की सूची तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि यह विवेक,जिम्मेदारी और नैतिकता की सतत परीक्षा बन चुका है।    

 तकनीक ने हमारी दुनिया को छोटा कर दिया है। एक क्लिक में महाद्वीप सिमट जाते हैं, सूचनाएं पल भर में पहुंच जाती हैं पर क्या इससे दिलों की दूरी भी कम हुई है? यह प्रश्न आज भी उत्तर की प्रतीक्षा में है। सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति का मंच दिया लेकिन दुर्भाग्य से हर मंच संवाद में नहीं बदल पाया। यहां त्वरित प्रतिक्रिया को बुद्धिमत्ता समझ लिया गया और असहमति को शत्रुता। परिणामस्वरूप, बहस का स्तर गिरा है और समाज में ध्रुवीकरण का ताप लगातार बढ़ा है। सवाल यह नहीं कि कौन सही है बल्कि यह है कि क्या हम एक-दूसरे को धैर्यपूर्वक सुनने के लिए तैयार हैं।    

लोकतंत्र को अक्सर केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित कर दिया जाता है, जबकि वास्तव में लोकतंत्र रोजमर्रा के व्यवहार में जीवित रहता है। कतार में खड़े होने से लेकर सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग तक, नियमों का पालन करना ही लोकतांत्रिक संस्कारों की पहचान है। जब हम नियम तोड़कर ‘छोटा सा फायदा’ उठा लेते हैं, तब उसी क्षण लोकतंत्र को भीतर से कमजोर कर देते हैं। नागरिक विवेक का अर्थ है—अपने निजी लाभ से पहले सार्वजनिक हित को देखना। यह मार्ग कठिन अवश्य है लेकिन लोकतंत्र की मजबूती के लिए अनिवार्य भी।    

आज आर्थिक प्रगति का शोर बहुत है। विकास के आंकड़े चमकते हैं, नई परियोजनाओं के दावे होते हैं लेकिन उनकी रोशनी में कई चेहरे छाया में चले जाते हैं। बेरोजगारी, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की असुरक्षा, ग्रामीण संकट और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दे केवल रिपोर्टों के शीर्षक नहीं बल्कि करोड़ों लोगों के रोज़मर्रा के अनुभव हैं। जब नीतियां बनती हैं, तो उनका मूल्यांकन इस कसौटी पर होना चाहिए कि वे समाज के सबसे कमजोर वर्ग तक कितनी प्रभावी रूप से पहुंचती हैं। विकास वही सार्थक है जो सम्मान और अवसर—दोनों प्रदान करे।   

शिक्षा का प्रश्न भी इसी संदर्भ में खड़ा है। शिक्षा केवल डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं बल्कि सोचने-समझने की दृष्टि विकसित करने की प्रक्रिया है। जब पाठ्यक्रम सवाल पूछने से डरने लगें, जब विश्वविद्यालय संवाद की जगह विवाद का मैदान बन जाएं, तब समाज का बौद्धिक स्वास्थ्य खतरे में पड़ जाता है। हमें ऐसी शिक्षा प्रणाली चाहिए जो रोजगार तो दे ही, उससे पहले विवेक दे—जो विज्ञान और आस्था को टकराव में न खड़ा करे बल्कि दोनों को मानवता की सेवा में जोड़े।   

 पर्यावरण आज हमारी पीढ़ी की सबसे बड़ी नैतिक चुनौती है। जलवायु परिवर्तन भविष्य का कोई अमूर्त खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की कठोर सच्चाई है। सूखते जलस्रोत, अनियमित मानसून, बढ़ता तापमान और बिगड़ता पारिस्थितिकी तंत्र—ये सभी संकेत हैं कि प्रकृति हमारे व्यवहार का हिसाब मांग रही है। विकास और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा करना एक झूठा द्वंद्व है। सच्चा विकास वही है जो आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों और संसाधनों की रक्षा करे।   

दुनिया मेरे आगे तब और कठिन हो जाती है जब असहिष्णुता सामान्य व्यवहार बन जाती है। भाषा, पहनावा और भोजन जैसे विषयों पर पहचान की राजनीति तेज हो जाती है जबकि सच यह है कि विविधता हमारी ताकत है, बोझ नहीं। भारत की आत्मा बहुलता में बसती है। इसे संकीर्णता और नफरत से बचाना हर नागरिक का नैतिक कर्तव्य है। सहमत होना आवश्यक नहीं, लेकिन सम्मान देना आवश्यक है—यही लोकतांत्रिक संस्कृति की पहचान है।    

मीडिया की भूमिका भी इस समय निर्णायक है। सनसनी तात्कालिक लाभ दे सकती है, लेकिन भरोसा नहीं। जब खबरें शोर में बदल जाती हैं, तब नागरिक को और अधिक सतर्क होना पड़ता है—तथ्यों की जांच करने, स्रोतों को समझने और राय बनाने में धैर्य रखने की आवश्यकता होती है। लोकतंत्र में जितना जरूरी स्वतंत्र मीडिया है, उतना ही जरूरी है एक जिम्मेदार और जागरूक पाठक।

अंततः, दुनिया मेरे आगे कोई अमूर्त दृश्य नहीं, बल्कि मेरे भीतर का प्रतिबिंब है। मैं जैसा सोचता हूं, वैसी ही दुनिया गढ़ी जाती है। छोटे-छोटे निर्णय—ईमानदारी से काम करना, कमजोर के साथ खड़ा होना, असहमति में भी शालीनता बनाए रखना—यही बड़े बदलाव की नींव रखते हैं। उम्मीद किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि नागरिक आचरण से जन्म लेती है।  

आज जब दुनिया मेरे आगे खड़ी है तो वह मुझसे नारे नहीं, निर्णय मांगती है। वह पूछती है—क्या तुम भीड़ का हिस्सा बनोगे या विवेक की आवाज़? जवाब आसान नहीं, लेकिन जरूरी है। क्योंकि भविष्य किसी और के हाथ में नहीं, हमारे रोजमर्रा के व्यवहार में गढ़ा जाता है। यही दुनिया मेरे आगे है—और यही मेरी जिम्मेदारी भी।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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