अंतर्शोधन का महापर्व है महाशिवरात्रि : चेतना, संस्कृति और प्रकृति के संतुलन का उत्सव

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— डॉ. घनश्याम बादल

भारतीय सभ्यता के सांस्कृतिक पंचांग में महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि एक गहन दार्शनिक उद्घोष है—एक ऐसी रात्रि जिसमें अंधकार भी प्रकाश का रूप ले लेता है और मौन साधना का स्वर बन जाता है। यह पर्व शिव को किसी मूर्ति या सीमित आस्था तक नहीं बाँधता, बल्कि उन्हें ‘तत्त्व’ के रूप में स्थापित करता है—चेतना, संतुलन, विनाश में सृजन और स्थिरता में गति के प्रतीक के रूप में।

महाशिवरात्रि का अर्थ केवल ‘शिव की रात्रि’ नहीं, बल्कि ‘महाशिवत्व की रात्रि’ है। यह वह अवसर है जहाँ शिव सबका हित साधते हुए कल्याण करते हैं और ‘महाशिव’ सृष्टि के तीनों लोकों के कल्याण हेतु सृजन के साथ-साथ विसर्जन का भी मार्ग अपनाते हैं। यह पर्व मनुष्य को अपने भीतर के अराजक, विक्षुब्ध और असंतुलित तत्वों को साधकर चेतना के उच्चतर स्तर की ओर अग्रसर होने का संदेश देता है।

शिव : देव नहीं, दर्शन

भारतीय दार्शनिक परंपरा में शिव केवल आराध्य नहीं, बल्कि एक व्यापक अवधारणा हैं। वे संहारक भी हैं और संरक्षक भी, वैरागी भी और गृहस्थ भी; अचल भी हैं और नटराज के रूप में सृष्टि के गतिशील केंद्र भी। यही द्वंद्वात्मक संतुलन शिव को विशिष्ट बनाता है। उनका तांडव विनाश का उन्माद नहीं, बल्कि जड़ता के विरुद्ध चेतना का विद्रोह है, जबकि उनका वैराग्य पलायन नहीं, बल्कि आसक्ति से मुक्ति का दर्शन है। महाशिवरात्रि इसी आत्मशोधन और आंतरिक साधना का उत्सव है।

आध्यात्मिक अर्थ : तमसो मा ज्योतिर्गमय

महाशिवरात्रि की रात्रि अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की यात्रा का प्रतीक है। शिव यहाँ केवल प्रकाश के स्रोत नहीं, बल्कि वह अवस्था हैं जहाँ प्रकाश और अंधकार का द्वैत समाप्त हो जाता है। रात्रि का चयन भी इसी कारण सार्थक है—जब बाहरी जगत शांत होता है और भीतर का संसार जागृत होने लगता है। योग परंपरा में यह चेतना के उत्कर्ष की रात्रि मानी जाती है, जहाँ ध्यान, मौन, उपवास और जागरण मन और आत्मा को साधने के माध्यम बनते हैं।

सांस्कृतिक संदर्भ : लोक से लोकातीत तक

महाशिवरात्रि भारतीय समाज में लोक और लोकातीत के संगम का पर्व है। एक ओर गाँवों के मेले, लोकगीत, भजन-कीर्तन, कांवड़ यात्राएँ और शिव बारात की परंपराएँ हैं, तो दूसरी ओर साधु-संतों और योगियों की गहन साधना। यह पर्व दर्शाता है कि भारतीय संस्कृति में धर्म केवल मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि लोकजीवन का स्वाभाविक अंग है।

शिव जनदेवता हैं—भोलेनाथ, औघड़दानी, भोले शंकर—जो राजाओं के नहीं, बल्कि आम जन के आराध्य हैं। वे निर्धनतम भक्त की भेंट भी स्वीकार करते हैं और केवल बेलपत्र व गंगाजल से प्रसन्न होकर लोककल्याण को तत्पर रहते हैं। स्वयं विषपान कर त्रिलोक को अमृत देने वाले शिव इसी लोकधर्मिता के कारण ‘महादेव’ कहलाते हैं।

धार्मिक प्रतीकों का जीवन-दर्शन

शिवलिंग कोई मात्र पत्थर नहीं, बल्कि निराकार और साकार के संगम का प्रतीक है—जीवन की उत्पत्ति और निरंतरता का संकेत। शिव की जटाओं से प्रवाहित गंगा ज्ञान की अनवरत धारा है, शरीर पर लगी भस्म अहंकार के क्षय का बोध कराती है, गले का नाग ऊर्जा के नियंत्रण का प्रतीक है। डमरू सृष्टि की लय और त्रिशूल त्रिगुणों पर नियंत्रण का द्योतक है। ये सभी प्रतीक शिव को देवता से आगे बढ़ाकर संपूर्ण जीवन-दर्शन के रूप में स्थापित करते हैं।

आज के समय में शिवत्व की प्रासंगिकता

आज का समाज तेज़ी, प्रतिस्पर्धा, उपभोक्तावाद और मानसिक तनाव से ग्रस्त है। मनुष्य तकनीकी रूप से समृद्ध, पर मानसिक रूप से असंतुलित होता जा रहा है। ऐसे समय में शिव का संदेश—सरलता, संतुलन और संयम—और अधिक प्रासंगिक हो उठता है। शिव सिखाते हैं कि सृजन बिना त्याग के अधूरा है और विकास बिना परिवर्तन के संभव नहीं।

प्रकृति के अंधाधुंध दोहन के इस दौर में शिव का प्रकृति-केन्द्रित जीवन-दर्शन पर्यावरणीय चेतना का भी संदेश देता है। कैलाश से हिमालय तक उनकी उपस्थिति मनुष्य और प्रकृति के सह-अस्तित्व का प्रतीक है। सृजन और विसर्जन के इस शाश्वत चक्र को समझना ही जीवन की सार्थकता है—क्योंकि एक सृजन के विसर्जन के बाद ही नया सृजन संभव होता है।

महाशिवरात्रि : हर क्रिया एक प्रतीक

इस पर्व की प्रत्येक क्रिया प्रतीकात्मक साधना है—

  • उपवास : इंद्रिय संयम और आत्मनियंत्रण का अभ्यास।
  • जागरण : चेतना की जागृति और आत्मनिरीक्षण।
  • रुद्राभिषेक : प्रकृति और मानव के समन्वय का प्रतीक।
  • मंत्र जप (ॐ नमः शिवाय) : ध्वनि के माध्यम से चेतना का संतुलन।
  • ध्यान और मौन : आंतरिक संवाद की साधना।
  • भजन-कीर्तन : सामूहिक चेतना का उत्सव।

ये सभी प्रक्रियाएँ व्यक्ति को बाहरी पूजा से भीतर की यात्रा की ओर ले जाती हैं।

अंततः महाशिवरात्रि का संदेश स्पष्ट है—सच्ची साधना मंदिरों में नहीं, मन के भीतर होती है; सच्चा शिव बाहर नहीं, बल्कि भीतर जागृत होता है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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