राजेश श्रीवास्तव

बीते दिनों संसद को ऐसा दिन भी देखना पड़ा जब विपक्ष की नारेबाजी और वॉकआउट के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यसभा में राष्ट्रपति अभिभाषण पर जवाब दिया और उससे पहले लोकसभा में भारी शोर-शराबे के बीच उनके भाषण के बगैर ही धन्यवाद प्रस्ताव पारित हो गया, यह शायद 2००4 के बाद पहला मौका था। सरकार और विपक्ष के बीच यह तनातनी संसदीय लोकतंत्र की परंपराओं और गरिमा के लिहाज से अत्यंत क्षोभजनक और चिताजनक भी है। संसद का मौजूदा बजट सत्र टकराव और नैरेटिव गढ़ने की जंग का मैदान बन गया है। राष्ट्रपति के धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्बारा पूर्व सेना अध्यक्ष एम.एम. नरवणे की एक अप्रकाशित पुस्तक का जिक्र करने से सदन में भारी हंगामा हुआ। गतिरोध पूरे हफ्ते चलता रहा। सत्ता पक्ष और विपक्ष ने अपने-अपने राजनीतिक फायदे के हिसाब से पूरे मुद्दे को भुनाने की कोशिश की। जब नाम के साथ गांधी सरनेम जुड़ जाता है तो उस नाम की एरोगेंस का लेवल डिफरेंट हो जाता है। हर संसद सत्र में वो एक मुद्दा दे देते हैं। वो पत्रकारों को विषय देते हैं और सरकार को भी व्यस्त रखते हैं। खबरों में बने रहने का जो इनकी नई कला है वह लेफ्ट से आई है। कांग्रेस अब ‘सेंटर’ की अपनी ताकत खो चुकी है और राहुल गांधी के नेतृत्व में केवल हेडलाइंस बनाने के लिए मानो लेफ्ट की वैचारिक जमीन पर खड़ी है।
संसद एक ऐसा प्लेटफार्म है जहां पर पूरे देश के अंदर संदेश दे सकते हैं और राजनीति चलती ही नैरेटिव पे है। अगर कोई मुद्दा राहुल गांधी उठाते हैं तो उसे सुना तो जाना चाहिए। राहुल के मुद्दे सत्ता पक्ष को एक डिफेंसिव ग्राउंड पर ले जाते हैं। राहुल जिस तरह की राजनीति करते हैं, वो जिस तरह के मुद्दे उठाते हैं, उस पर विवाद होते रहते हैं। जहां तक नियम का सवाल रहा तो ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जहां राहुल को नियमों के होते हुए भी रोक दिया जाता है। ये सही है कि राहुल को नियम के तहत ही मुद्दों को उठाना चाहिए। राहुल गांधी एक नरेटिव गढ़ने को कोशिश कर रहे हैं, राहुल पॉलिटिक्स के अंदर कमबैक करने की कोशिश कर रहे हैं… वो अपनी बात को सीधे-सीधे व्यक्त करने की कोशिश करते हैं जिसमें लाग-लपेट नहीं होती। संसदीय बहस में हमें यह तय करना होगा कि काउंटर करने का स्तर क्या हो। राहुल ने अपनी तरफ से कुछ नहीं गढ़ा। उन्होंने वही पढ़ा जो पब्लिकेशन में था। सत्ता ये सोचती है कि वो ऑल पावरफुल है… जब आप यह मानने लगते हैं कि आप ही सही हैं, वहां समस्या आती है।
निशिकांत दुबे काउंटर करने के लिए व्यक्तिगत जीवन को लेकर आए। व्यक्तिगत आक्षेप नहीं होने चाहिए। संसद एक ऐसा फोरम है जहां आप एग्जिक्यूटिव की आलोचना कर सकते हैं। संविधान में ये चीजें इसीलिए बनाई गई। संसद को भी आप नहीं चाहते कि संसद भी संसद की तरह रहे और अपोजिशन वहां सवाल करे। अगर इस बात को सत्ता पक्ष सुनता और उसका जवाब देता तो ये आया गया हो जाता। राहुल गांधी ने नरवड़े जी की किताब से वही सुविधाजनक तथ्य उठाए हैं जिससे उनका यह तर्क मजबूत हो सके कि भारत सरकार सुरक्षा के मामले में कमजोर है। जहां तक एलओपी की बात आती है तो 1962 के भारत चीन युद्ध को लेकर हेंडरसन ने भी किताब लिखी थी। भारत सरकार ने आज तक उस किताब को मंजूरी नहीं दी है। डिफेंस मिनिस्ट्री ने 35 में से 34 किताबों को मंजूरी दी लेकिन यदि एक को रोका गया तो उसके पीछे सुरक्षा का तर्क दिया जाता है। राहुल अपनी बात सीधे तौर पर रखते हैं पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अंदर यह समझ है कि कब दो कदम पीछे जाना है और कब दो कदम आगे चलना है, इसलिए वो जनता के साथ सीधे कनेक्ट करते हैं।
विपक्ष के सवाल उठाने से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, अगर वे अवसर, सांविधानिक मूल्यों और संसदीय प्रक्रिया के अनुरूप हों। बेवजह के हंगामे में मूल प्रश्न तो खो ही जाते हैं, सदन का कीमती समय भी नष्ट होता है। संसद भारतीय लोकतंत्र का मंदिर है, जहां राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा और धन्यवाद प्रस्ताव पारित करना दोनों सदनों की प्राथमिक जिम्मेदारी है। सही मायनों में सदनों का सुचारु संचालन सरकार और विपक्ष, दोनों से परिपक्वता की मांग करता है। शोर-शराबा और वॉकआउट संसद को कमजोर ही करते हैं। नहीं भूलना चाहिए कि संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है और ऐसी तस्वीरें देश-विदेश में लोकतंत्र की छवि को धूमिल तो करती ही हैं, संसदीय संस्कृति के क्षरण की ओर भी इशारा करती हैं। संसदीय लोकतंत्र तभी मजबूत होता है, जब सभी दल नियमों का पालन करें, एक-दूसरे का सम्मान करें और जनहित को सर्वोपरि रखें। अगर यह बाधित हो रहा है, तो यह सरकार और विपक्ष, सभी के लिए आत्मचितन का विषय होना चाहिए। मूल सवाल संसद की शुचिता का है, वरना एकतरफा बहिष्कार और संवादहीनता की स्थिति कहीं नहीं ले जाएगी। लेकिन इन दिनों संसद में संवाद की स्थिति बहुत गिरती हुई दिखायी दे रही है। अगर यही हाल रहा तो देश संकट के ऐसे मुहाने पर खड़ा होगा जहां लोकतंत्र केवल किताबी शब्द बनकर रह जायेगा और संसदीय परंपरा केवल रवायतें।







