भारत-अमेरिका व्यापार समझौता 2026: टैरिफ कटौती से संसद हंगामे तक — असल खेल क्या है?

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बॉन्ड मार्केट, सर्विस इकोनॉमी, डॉलर की ताकत और बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन के बीच उभरती भारत की रणनीतिक भूमिका; दस्तावेज़ सार्वजनिक होने के बाद ही तय होगा समझौते का वास्तविक असर।

-एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया – 2 फरवरी 2026 को भारत और अमेरिका के बीच हुई व्यापारिक सहमति ने वैश्विक आर्थिक और कूटनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी।अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ को घटाकर सीधे 18 प्रतिशत करना केवल एक व्यापारिक रियायत नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति-संतुलन, भू-राजनीति, वित्तीय अस्थिरता और घरेलू राजनीति के कई स्तरों को एक साथ उजागर करता है।

यह डील जितनी अंतरराष्ट्रीय मंच पर सराही जा रही है, उतनी ही भारत के भीतर यह विवादों और सवालों के घेरे में है। बजट सत्र के दौरान 4 फरवरी 2026 को संसद में हुए तीव्र हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही शाम 5 बजे तक स्थगित करनी पड़ी। प्रधानमंत्री को उसी दिन धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब देना था, लेकिन सदन की कार्यवाही हंगामे की भेंट चढ़ गई। प्रधानमंत्री का संबोधन 5 फरवरी तक टलना इस बात का संकेत है कि मामला केवल व्यापारिक नहीं रहा, बल्कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया, संप्रभुता और राजनीतिक रणनीति से भी जुड़ चुका है।

पारदर्शिता और संसदीय प्रक्रिया पर उठते सवाल

इस समझौते को लेकर सबसे पहला और तीखा सवाल प्रक्रिया और पारदर्शिता का है। विपक्षी दलों का आरोप है कि इस डील की घोषणा भारत की संसद से पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा की गई। संसदीय लोकतंत्र में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब कोई अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौता देश की अर्थव्यवस्था, किसानों, उद्योगों और उपभोक्ताओं को प्रभावित करता है, तो उसकी पूरी जानकारी पहले संसद के पटल पर क्यों नहीं रखी गई।विपक्ष का कहना है कि सरकार ने केवल एक संक्षिप्त बयान देकर औपचारिकता पूरी की, जबकि समझौते के मूल दस्तावेज़, शर्तें, अपवाद और सुरक्षा उपाय संसद के साथ साझा नहीं किए गए। यह आपत्ति केवल राजनीतिक शोर नहीं, बल्कि भारत की संसदीय परंपरा से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न है। अतीत में डब्ल्यूटीओ समझौते, परमाणु करार और यूरोपीय संघ के साथ एफटीए जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर संसद में विस्तृत चर्चा हुई है। ऐसे में डील का टेक्स्ट-आधारित विवरण न देना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी के दायरे में सवाल खड़ा करता है।

कृषि, डेयरी और ऊर्जा सुरक्षा की चिंता

दूसरा बड़ा विवाद कृषि और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर है। विपक्षी दलों का तर्क है कि टैरिफ कटौती का सीधा लाभ अमेरिकी कृषि उत्पादों, डेयरी और अन्य संवेदनशील वस्तुओं को मिलेगा, जिससे भारतीय बाजार में उनकी आसान एंट्री संभव हो सकती है।भारत में कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संरचना की रीढ़ है।छोटे और सीमांत किसान पहले ही महंगाई, जलवायु परिवर्तन और बाजार की अस्थिरता से जूझ रहे हैं। ऐसे में अमेरिकी उत्पादों की प्रतिस्पर्धा से उनकी स्थिति और कमजोर होने की आशंका जताई जा रही है। इसी क्रम में विपक्ष ने ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया है। आरोप है कि भारत पर अमेरिकी तेल खरीदने का दबाव डाला गया, जिससे रूस से सस्ते तेल पर निर्भरता कम करनी पड़े।

रूस–यूक्रेन युद्ध के बाद भारत द्वारा डिस्काउंटेड 

रूसी तेल खरीदना महंगाई और चालू खाते के घाटे को नियंत्रित करने की एक व्यावहारिक रणनीति रही है। विपक्ष पूछ रहा है कि क्या इस डील के तहत भारत ने अपनी ऊर्जा नीति से कोई समझौता किया है और क्या यह निर्णय आर्थिक विवेक से अधिक भू-राजनीतिक दबाव का परिणाम है।

सरकार का पक्ष और रणनीतिक तर्क

विपक्ष के आरोपों के जवाब में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने संसद और मीडिया दोनों में आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह डील भारत के राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर की गई है और कृषि व दुग्ध क्षेत्रों की पूरी तरह सुरक्षा की गई है।

उनके अनुसार यह कोई एकतरफा फैसला नहीं, बल्कि लगभग एक वर्ष तक चले गहन विचार-विमर्श और वार्ताओं का परिणाम है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह केवल टैक्स घटाने का मामला नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की रणनीति है, जिससे भारतीय एमएसएमई, टेक्सटाइल, लेदर और समुद्री उत्पादों को अमेरिकी बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी।

सरकार का यह तर्क भी महत्वपूर्ण है कि 18 प्रतिशत का टैरिफ अमेरिका द्वारा कई अन्य प्रतिस्पर्धी देशों पर लगाए गए टैरिफ से कम है। इसका अर्थ यह है कि भारतीय निर्यातकों को वैश्विक बाजार में तुलनात्मक लाभ मिलेगा। सरकार इसे भारत की मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट-लेड ग्रोथ रणनीति के अनुरूप बता रही है।

राजनीतिक पृष्ठभूमि और सर्विस इकोनॉमी की ताकत

इस पूरे विवाद के पीछे की अंदरूनी राजनीति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 2026 राजनीतिक रूप से संवेदनशील वर्ष है और कई राज्यों में चुनावी माहौल बन रहा है। विपक्ष इस डील को कृषि, रोजगार और राष्ट्रीय हित से जोड़कर एक बड़े चुनावी मुद्दे के रूप में पेश करना चाहता है।

दूसरी ओर सरकार इस समझौते को वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती ताकत के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत कर रही है। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसका सर्विस सेक्टर और प्रशिक्षित युवा आबादी है। देश की लगभग 60–70 प्रतिशत युवा जनसंख्या तकनीकी रूप से प्रशिक्षित है और आईटी, फिनटेक, एआई तथा डिजिटल सेवाओं में भारत की पकड़ विश्व स्तर पर मजबूत है। यही कारण है कि सेवा क्षेत्र भारत की सौदेबाजी की सबसे मजबूत पूंजी बन चुका है।

बॉन्ड मार्केट, डॉलर और वैश्विक वित्तीय दबाव

आर्थिक आंकड़ों के स्तर पर भारत की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत है। भारत पर कुल कर्ज उसकी जीडीपी का लगभग 82 प्रतिशत है, जबकि अमेरिका का कर्ज-जीडीपी अनुपात लगभग 126 प्रतिशत के आसपास है। भारत के पास लगभग 700 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, जिसमें बड़ी मात्रा में अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड भी शामिल हैं।अमेरिकी बॉन्ड की सबसे बड़ी विशेषता उनकी अत्यधिक लिक्विडिटी है, लेकिन यही बिंदु वैश्विक वित्तीय राजनीति को उजागर करता है। अमेरिका पर लगभग 40 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज है। यदि बड़े पैमाने पर अमेरिकी बॉन्ड की बिक्री होती है, तो उनकी वैल्यू गिरती है और ब्याज दरें बढ़ जाती हैं।पिछले एक वर्ष में भारत ने लगभग 50–60 बिलियन डॉलर के अमेरिकी बॉन्ड बेचकर सोने में निवेश बढ़ाया है। इसके परिणामस्वरूप भारत का स्वर्ण भंडार लगभग 800 टन तक पहुंच गया है। चीन भी इसी दिशा में कदम बढ़ा चुका है। यह प्रवृत्ति डॉलर और बॉन्ड बाजार के लिए चेतावनी संकेत मानी जा रही है।

टैरिफ नरमी के पीछे अमेरिका की मजबूरी

अमेरिका द्वारा टैरिफ में नरमी को केवल भारत के साथ संबंध सुधारने के प्रयास के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह अमेरिकी वित्तीय स्थिरता को बचाने की रणनीति भी हो सकती है। माना जा रहा है कि ट्रंप और मोदी के बीच बातचीत में यूक्रेन युद्ध के संभावित अंत पर भी चर्चा हुई। यदि युद्ध समाप्त होता है, तो पहले लगाए गए उच्च टैरिफ का औचित्य कमजोर पड़ जाता है।

यूरोपीय संघ बनाम अमेरिका: कौन-सी डील बेहतर?

यह प्रश्न भी उठता है कि क्या यह डील यूरोपीय संघ के साथ हुई “मदर ऑफ ऑल डील्स” से बेहतर है। इसका उत्तर सरल नहीं है। यूरोपीय संघ के साथ समझौता अधिक व्यापक और संरचनात्मक है, जबकि अमेरिका के साथ यह डील अधिक रणनीतिक और समय-सापेक्ष है। दोनों की प्रकृति अलग है, लेकिन भारत के लिए दोनों ही आवश्यक हैं—एक बाजार विविधीकरण के लिए और दूसरा वैश्विक शक्ति-संतुलन के लिए।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि सफलता  या चुनौती,फैसला भविष्य करेगा,भारत-अमेरिका व्यापार समझौता 2026 केवल टैरिफ कटौती का मामला नहीं है। यह लोकतांत्रिक पारदर्शिता, घरेलू राजनीति, वैश्विक वित्तीय अस्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीतिक समीकरणों का जटिल संगम है।

विपक्ष के सवाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए आवश्यक हैं, जबकि सरकार के तर्क आर्थिक अवसरों और रणनीतिक लाभों पर आधारित हैं। सच्चाई संभवतः इन दोनों के बीच कहीं स्थित है। आने वाले समय में जब समझौते के पूरे दस्तावेज़ सार्वजनिक होंगे और उसके प्रभाव ज़मीन पर दिखेंगे, तब ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह डील भारत के लिए कितनी दूरगामी सफलता या चुनौती सिद्ध होती है।

 संकलनकर्ता लेखक-कर विशेषज्ञ | स्तंभकार | साहित्यकार | अंतरराष्ट्रीय लेखक | चिंतक | कवि | संगीत माध्यमा | सीए (एटीसी) |एडवोकेट  किशन सनमुखदास भावनानीगोंदिया, महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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