सुप्रीम कोर्ट की फटकार — संविधान नहीं मानते तो भारत छोड़कर जाइए; अगली सुनवाई 9 फरवरी

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डिजिटल संप्रभुता बनाम डेटा साम्राज्यवाद:- व्हाट्सऐप-मेटा, डीपीडीपी एक्ट 2023 और भारतीय संविधान की ऐतिहासिक टकराहट

डेटा पर नियंत्रण किसका—नागरिक का या कॉर्पोरेट का? सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने डिजिटल संप्रभुता की बहस को दिया नया आयाम

 -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं 

गोंदिया (महाराष्ट्र) – इक्कीसवीं सदी में भारत अब केवल एक विशाल उपभोक्ता बाजार नहीं रहा, बल्कि डिजिटल लोकतंत्र, डेटा संप्रभुता और नागरिक निजता के वैश्विक विमर्श का केंद्र बन चुका है। करोड़ों भारतीयों का डिजिटल जीवन—उनकी निजी बातचीत, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी, आर्थिक लेन-देन, सामाजिक व्यवहार और वैचारिक रुझान—तकनीकी प्लेटफॉर्मों के सर्वरों में संरक्षित है। ऐसे में यह प्रश्न केवल तकनीकी या व्यावसायिक नहीं रह जाता, बल्कि सीधे भारतीय संविधान, मानवाधिकारों और राज्य की संप्रभु जिम्मेदारी से जुड़ जाता है।

डिजिटल पर्सनल डेटा संरक्षण अधिनियम (डीपीडीपी एक्ट) 2023 इसी ऐतिहासिक आवश्यकता की उपज है। एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी (गोंदिया, महाराष्ट्र) का मानना है कि इस कानून का उद्देश्य केवल डेटा चोरी रोकना नहीं, बल्कि नागरिकों को यह अधिकार देना है कि उनका डिजिटल अस्तित्व भी उतना ही सुरक्षित रहे जितना उनका भौतिक अस्तित्व। यह अधिनियम स्पष्ट करता है कि डेटा किस उद्देश्य से, कितनी सीमा तक और कितनी अवधि के लिए प्रोसेस किया जा सकता है, तथा “सूचित सहमति” को इसकी केंद्रीय शर्त बनाता है।

इस कानून के माध्यम से भारत पहली बार डेटा को केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार के रूप में स्थापित करता दिखाई देता है। इसी पृष्ठभूमि में व्हाट्सऐप और उसकी पैरेंट कंपनी मेटा का मामला एक साधारण प्राइवेसी नीति का विवाद न रहकर यह प्रश्न बन जाता है कि क्या वैश्विक टेक कंपनियां भारतीय संविधान के दायरे में काम करने को तैयार हैं।

वर्ष 2021 में व्हाट्सऐप द्वारा लाई गई “टेक इट ऑर लीव इट” प्राइवेसी पॉलिसी ने यूज़र्स के सामने दो ही विकल्प छोड़े—नई शर्तें स्वीकार करें या सेवा छोड़ दें। इसे असमान शक्ति संतुलन का उदाहरण माना गया और इससे वास्तविक सहमति की अवधारणा पर भी सवाल उठे।

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग से जुड़े अपीलीय मंच ने नवंबर 2024 में इस नीति को प्रतिस्पर्धा कानून का उल्लंघन मानते हुए मेटा पर 213.14 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया। आयोग का मत था कि व्हाट्सऐप ने अपनी प्रमुख बाजार स्थिति का दुरुपयोग करते हुए यूज़र्स को ऐसी शर्तें स्वीकार करने के लिए मजबूर किया, जिनसे मेटा के विज्ञापन मॉडल को सीधा लाभ मिलता है। यह दंड केवल आर्थिक कार्रवाई नहीं, बल्कि एक नियामकीय संदेश भी था कि भारत का डिजिटल बाजार अब “फ्री-फॉर-ऑल” नहीं रहेगा।

हालांकि जनवरी 2025 में अपीलीय मंच ने एक जटिल रुख अपनाते हुए डॉमिनेंस के दुरुपयोग संबंधी निष्कर्ष को हटाया, लेकिन जुर्माना बरकरार रखा। इस कानूनी विरोधाभास को चुनौती देते हुए मेटा सुप्रीम कोर्ट पहुंची, जहां यह मामला प्रतिस्पर्धा कानून से आगे बढ़कर संवैधानिक विमर्श का विषय बन गया।

3 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने इस विवाद को ऐतिहासिक मोड़ दे दिया। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने जिस स्पष्टता और कठोरता से व्हाट्सऐप-मेटा की प्राइवेसी प्रथाओं पर सवाल उठाए, उसने संकेत दिया कि अदालत अब इस मुद्दे को केवल कॉर्पोरेट नीति के रूप में नहीं देख रही।

केंद्र सरकार की ओर से पेश दलीलों में कहा गया कि व्हाट्सऐप की प्राइवेसी नीति शोषणकारी है और यूज़र्स के डेटा का व्यावसायिक उपयोग करती है। इस पर मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी—“अगर हमारे संविधान का पालन नहीं कर सकते, तो भारत छोड़कर जाइए”—डिजिटल क्षेत्र में अब तक की सबसे तीखी न्यायिक चेतावनियों में से एक मानी जा रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारत में व्यापार करने वाली किसी भी कंपनी को संविधान, मौलिक अधिकारों और नागरिक गरिमा का सम्मान करना ही होगा।

अदालत ने यह भी कहा कि व्हाट्सऐप की प्राइवेसी नीति इतनी जटिल है कि एक आम नागरिक—चाहे वह बुजुर्ग महिला हो, सड़क किनारे विक्रेता हो या केवल क्षेत्रीय भाषा बोलने वाला ग्रामीण व्यक्ति—इसके निहितार्थ समझ ही नहीं सकता। यह टिप्पणी भारत की सामाजिक-आर्थिक विविधता को रेखांकित करती है और बताती है कि सूचित सहमति केवल लंबी अंग्रेज़ी शर्तों से नहीं, बल्कि वास्तविक समझ से बनती है।

सुनवाई के दौरान पीठ के अन्य न्यायाधीशों ने भी बहस को गहराई देते हुए कहा कि डीपीडीपी एक्ट भले प्राइवेसी पर केंद्रित हो, लेकिन असली चिंता यूज़र्स की व्यवहारिक प्रवृत्तियों के व्यावसायिक दोहन की है। डिजिटल फुटप्रिंट का उपयोग माइक्रो-टार्गेटिंग और ऑनलाइन विज्ञापन के लिए किया जाना केवल निजता का प्रश्न नहीं, बल्कि मानव व्यवहार के बाजारीकरण का संकेत है। यह चिंता वैश्विक स्तर पर सामने आए डेटा घोटालों की याद दिलाती है, जहां व्यक्तिगत जानकारी का उपयोग लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करने तक में हुआ।

मुख्य न्यायाधीश ने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे ही कोई डॉक्टर व्हाट्सऐप पर दवाइयों के नाम भेजता है, कुछ ही समय में उन्हीं दवाओं के विज्ञापन दिखने लगते हैं। इससे यह प्रश्न उठता है कि एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन के दावों के बावजूद मेटाडेटा और व्यवहारिक संकेतों का उपयोग किस हद तक व्यावसायिक प्रोफाइलिंग में हो रहा है। यह मुद्दा तकनीकी होने के साथ-साथ नैतिक और कानूनी भी है।

मेटा की ओर से तर्क दिया गया कि सीमित डेटा शेयरिंग अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है और व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए आवश्यक भी। लेकिन अदालत ने इस दलील पर सख्त रुख अपनाते हुए पूछा, “अगर आपको डेटा का कोई भी हिस्सा बेचने लायक लगेगा, तो क्या आप उसे बेच देंगे?” अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय उपभोक्ताओं की चुप्पी को सहमति नहीं माना जा सकता।

यह पूरा विवाद एक बड़े वैचारिक संघर्ष की ओर संकेत करता है—डिजिटल संप्रभुता बनाम डेटा साम्राज्यवाद। एक ओर भारत अपने नागरिकों के डेटा को संवैधानिक संरक्षण देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक टेक कंपनियां डेटा को आर्थिक संपत्ति के रूप में देखती हैं।

संभव है कि आने वाले वर्षों में यह मामला केवल एक कंपनी की नीति का फैसला न होकर डिजिटल युग के संवैधानिक ढांचे को परिभाषित करने वाला ऐतिहासिक निर्णय साबित हो। सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई अब बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि यह तय कर सकती है कि भारत में डेटा का वास्तविक स्वामी कौन होगा—नागरिक या कॉर्पोरेट तंत्र।

-संकलनकर्ता लेखक-कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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