टैरिफ बम, इस्लामी गठजोड़ और ईयू समझौते के बीच 10 वर्षों बाद भारत–अरब संवाद का ऐतिहासिक पुनरागमन
-एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

गोंदिया। वर्ष 2026 की शुरुआत वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए असाधारण परिस्थितियों में हो रही है। एक ओर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ बम ने वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता और मंदी की आशंकाएँ बढ़ा दी हैं, वहीं दूसरी ओर इस्लामी देशों के बीच उभरते रणनीतिक गठजोड़—जिसे कई विश्लेषक “इस्लामी नाटो” की दिशा में बढ़ता कदम मान रहे हैं—ने अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन को नई दिशा दी है।
ऐसे चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिदृश्य में भारत का उभरना केवल एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद और संतुलनकारी कूटनीतिक धुरी के रूप में हो रहा है। लगातार फ्री ट्रेड एग्रीमेंट, बहुपक्षीय सम्मेलनों और रणनीतिक संवादों की मेज़बानी कर भारत यह स्पष्ट संदेश दे रहा है कि 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति में वह केवल दर्शक नहीं, बल्कि निर्णायक भूमिका निभाने को तैयार है।
यूरोपीय यूनियन के 27 देशों के साथ ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के बाद, 30–31 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में 22 अरब देशों के विदेश मंत्रियों का विशेष सम्मेलन आयोजित होना भारत की बढ़ती कूटनीतिक विश्वसनीयता और वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। यह सम्मेलन केवल एक औपचारिक बैठक नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करने वाला एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।
अमेरिका की अमेरिका फर्स्ट नीति और संरक्षणवादी दृष्टिकोण के बावजूद राष्ट्रपति ट्रंप का भारत के प्रति यथार्थवादी और सम्मानजनक रवैया यह संकेत देता है कि वैश्विक राजनीति में भारत को अब नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं है। एशिया और वैश्विक दक्षिण में स्थिरता, व्यापार और रणनीतिक संतुलन के लिए भारत की भूमिका को अमेरिका भी अपरिहार्य मानने लगा है।
नई दिल्ली बनेगी वैश्विक कूटनीति का केंद्र

30–31 जनवरी को नई दिल्ली केवल भारत की राजधानी नहीं रहेगी, बल्कि वैश्विक कूटनीति का केंद्र बनेगी। 22 अरब देशों के विदेश मंत्रियों की मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि भारत पर अंतरराष्ट्रीय भरोसा निरंतर बढ़ रहा है। यह सम्मेलन भविष्य में होने वाले कई बहुपक्षीय संवादों के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा, जिनकी मेज़बानी भारत करेगा।
भारत–अरब विदेश मंत्रियों का यह सम्मेलन न केवल अतीत की उपलब्धियों की समीक्षा है, बल्कि भविष्य की साझा रणनीति तय करने का अवसर भी है। वैश्विक मंदी, क्षेत्रीय संघर्ष, ऊर्जा सुरक्षा और ऊर्जा संक्रमण जैसे अहम मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण विकसित करना समय की आवश्यकता है। यदि भारत और अरब देशों की साझेदारी सही दिशा में आगे बढ़ती है, तो यह सहयोग केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता और शांति का आधार बन सकता है।
दस वर्षों बाद ऐतिहासिक पुनरागमन

यह सम्मेलन लगभग दस वर्षों के अंतराल के बाद आयोजित हो रहा है। इससे पहले वर्ष 2016 में बहरीन में पहला भारत–अरब विदेश मंत्रियों का सम्मेलन हुआ था, जिसमें अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, शिक्षा, मीडिया और संस्कृति—इन पाँच प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी थी। 2026 का सम्मेलन उसी अधूरे एजेंडे को नई गति देने का अवसर प्रदान कर रहा है।
भारत और अरब देशों के संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक रूप से गहरे रहे हैं। वर्ष 2002 में भारत–अरब लीग के बीच हुए समझौता ज्ञापन और 2008 में स्थापित अरब–भारत सहयोग मंच ने इन संबंधों को संस्थागत स्वरूप दिया। भारत का अरब लीग का पर्यवेक्षक देश होना आपसी विश्वास और सम्मान का प्रतीक है।
नई साझेदारियों की उम्मीद
दूसरे भारत–अरब विदेश मंत्रियों के सम्मेलन से यह अपेक्षा की जा रही है कि व्यापार, निवेश और ऊर्जा सहयोग को नई मजबूती मिलेगी। अरब देशों के पास पूंजी और ऊर्जा संसाधन हैं, जबकि भारत के पास विशाल बाजार, कुशल मानव संसाधन और तकनीकी क्षमता। संयुक्त निवेश परियोजनाएँ, स्टार्ट-अप सहयोग और व्यापार सुगमता पर ठोस निर्णय दोनों पक्षों के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं।
यह सम्मेलन स्पष्ट करता है कि भारत अब वैश्विक घटनाक्रमों का अनुसरण करने वाला नहीं, बल्कि उन्हें दिशा देने वाला देश बन चुका है।
-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र







