गांधी पुण्यतिथि पर विशेष: भुलाए नहीं भूलता अहिंसा का दूत- कुछ तो है गांधी में…. 

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

डॉ घनश्याम बादल

30 जनवरी 1948 को गोली खाकर देह त्यागने वाले गांधी की आज एक बार फिर देश में पुण्यतिथि मनाई जा रही है। प्रधानमंत्री राष्ट्रपति समेत देश के बड़े-बड़े नेता मंत्री, मुख्यमंत्री राजघाट पर जाकर एक बार फिर चार फूल गांधी की समाधि पर चढा रहे हैं लेकिन बहुत बड़ा सवाल यह है कि देश को आज़ादी दिलाने में अपने समय का अद्भुत योगदान देने वाले गांधी को हमने कितना समझा और कितना समझ कर भी न समझने का स्वांग रचा है।

1947 में आज़ादी पाने के बाद से ही गांधी की भूमिका पर सवाल उठने शुरू हो गए थे । देश का बंटवारा, पाकिस्तान को एक बड़ी रकम दिलवाना, खुद सत्ता में जिम्मेदारी न लेने के बावजूद सरकार को अपनी ही सोच के साथ चालवाने का अनशनकारी प्रयास गांधी जी के आज़ादी के बाद के व्यक्तित्व पर कई सवाल खड़े करता है लेकिन फिर भी कुछ तो चमत्कार रहा उसे डेढ़ पसली के व्यक्ति में जिसे आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक ने एक चमत्कार कहा और माना कि आने वाली नस्लें इस बात पर यक़ीन नहीं करेंगी की कभी गांधी जैसा हाड़ मांस का बना इंसान भी पैदा हुआ होगा।

1947 के बाद से ही देश में नई सोच और नया चिंतन शुरू हो गया था । कुछ संकीर्णता वादियो की घातक सोच के चलते हुए ही गांधी जी आज़ादी के मैच डेढ़ साल बाद ही हिंसा का शिकार हो गए। वही हिंसा, जिसके ख़िलाफ़ वे जीवन भर लड़ते रहे और बिना हिंसा का सहारा लिए हुए उसे समय की दुनिया की सबसे बड़ी ताकत के पंजों से देश की आज़ादी छीन कर ले आए । गांधी जी खुद उस हिंसा के शिकार हो गए तो सोचने वाली बात यह है कि कहीं न कहीं उनके जीते जी ही कुछ ऐसा चल रहा था जो उन्हें पसंद नहीं करता था और जब यह वैचारिक सोच प्रतिशोध पर उतरी तो हमने गांधी जैसे महान पुरुष को खो दिया।

आज हम गांधी जी को याद करते हैं और याद करते हैं उन तीन गोलियां को जिन्होंने ‘हे राम’ कहने के बाद गांधी को एक शरीर से आत्मा में बदल दिया था । भले ही जिस पिस्टल से गोलियां निकली उसका ट्रिगर दबाने वाली उंगलियां नाथूराम गोडसे नाम के उन्मादी युवक की थी लेकिन ट्रिगर दबाने की सोच और ताकत उन उंगलियों को कहां से मिली इस पर आज भी विवाद है।

गांधी की मौत के बाद जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि आज एक रोशनी की रुखसती का दिन है तो सारा देश उनसे सहमत था । हर तरफ एक अंदेशा और डर था कि अब क्या होगा और देश देश की दिशा, दशा कैसी होगी लेकिन यह सारे अंदेशे एक बार फिर भारतीयों के जज्बे और आज़ादी के प्रति उनके जुनून ने हाशिए पर पहुंचा दिए ।

जैसे गांधी चले गए वैसे ही इस लोकतांत्रिक देश में एक के बाद एक अलग-अलग सरकारें आती और जाती रहीं । एक लंबा समय उन सरकारों को मिला जो गांधी और उनके विचारों को प्रयोग करके सत्ता में आती रहीं और गांधी की गुण गाती रहीं। विपक्ष में बैठी एक खास सोच दबे स्वर में ही सही गांधी के विचारों, उनके आचरण, सोच , योगदान और उनके व्यक्तित्व पर उंगलियां उठती रहीं लेकिन यह आवाज़ बेहद कमजोर और अप्रासंगिक बनी रहीं।

दिल्ली में पहली बार 1977 में जब तक पार्टी की सरकार के रूप में ऐसी सत्ता ने दामन थामा जो उससे पहले की सरकारों से अलग थी। मगर उसका नेता भी गांधीवादी आंदोलन की देन था और गांधीवादी विचारों से ही ओतप्रोत था इसलिए उसे दौर में भी गांधी बन रहे । बदलाव की एक और हवा 1989 में आई जब विश्वनाथ प्रताप सिंह के सिर पर ताज रखा गया और उस छोटे से कार्यकाल में ही मंडल और कमंडल की भारी तबाही वाली राजनीति केंद्र में आ गई। अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में हिंदूवादी चिंतन सत्ता पर सवार रहा लेकिन गांधी पर उस दौर में भी कोई बड़ा आक्षेप नहीं लगा।

अटल सरकार के बाद 10 साल मनमोहन सिंह की सरकार के नाम रहा और फिर 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार का 2014 से वह दौर शुरू हुआ जब गांधी विरोधी ताकतों ने भी वोट तो गांधी के नाम के लिए लेकिन गांधी के निर्णय पर खुलकर उंगलियां उठाने से भी वह चूके नहीं।

आज तो गांधी जी को राष्ट्रपिता मानने जैसे विचार पर भी आपत्ति व्यक्त की जाती है उन्हें देश के बंटवारे का सीधा-सीधा दोषी कहकर एक तरफ सरकाने की कोशिश की जाती और गांधी को अलग-अलग रखने की राजनीतिक कोशिश में भी जारी रहती हैं ।

आज गांधी की पुण्यतिथि है इसलिए गांधी को श्रद्धापूर्वक याद किए जाने की ज़रूरत है लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि गांधी की हर गलती को भुला दिया जाए। पर, यदि गांधी ग़लती करके भी प्रासंगिक बने रहते हैं, देश का आम आदमी उन्हें आज भी पूजता है और दुनिया भर में जब-जब भी कहीं अहिंसा की बात के राजनीतिक मायने निकाले जाते हैं तो केवल और केवल गांधी ही याद आते हैं, जब भी स्वदेशी या अहिंसक आंदोलन की बात की जाती है तब भी केवल और केवल गांधी का ही स्मरण होता है, जब सत्ता में रहकर भी सत्ता से विरक्त रहने, सबके लिए सब कुछ करने और अपने लिए कुछ भी न चाहने के राजनीतिक निहित अर्थ ढूंढे जाते हैं तब भी केवल और केवल गांधी ही जीवन में आते हैं तो गांधी की प्रासंगिकता अपने आप सिद्ध हो जाती है।

बेशक गांधी भी एक हाड़ मांस के बने व्यक्ति थे उनके शरीर में भी मानव का वही मस्तिष्क था जो अपने प्रिय के लिए उसे पक्षपात ग़लत नहीं लगता तो अपनी सोच से अलग व्यक्ति को एक तरफ कर देने को भी वह सही मानता है । गांधी जी ने निश्चित ही कुछ गलतियां की लेकिन उसकी हर उपलब्धि पर उंगली उठाना उचित नहीं है।

जहां तक गांधी की सोच, दर्शन और नीतियों का सवाल है तो आज भी भारत के विकास की नींव में उनकी सोच की ईट सबसे मजबूत और सबसे व्यावहारिक लगती है। चाहे स्वदेशी की बात हो, दक्षता का विकास हो, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, शिक्षा का दर्शन और दिशा हो, लघु उद्योगों के विकास की बात हो गांधी की तोड़ अभी भी कहीं नहीं है।

चलिए गलतियों के पुतले ही सही, देश के महान नायक और सर्वमान्य बापू को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन करें।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

Leave a Comment

और पढ़ें

error: Content is protected !!