भारत का जन-मन-गण …..

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दीपशिखा श्रीवास्तव ‘दीप’

भारत विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है—बहुरंगी विविधता, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और निरंतर परिवर्तनशील चेतना के साथ। समय के प्रवाह में स्वयं को ढालते हुए भारत ने सदियों की औपनिवेशिक दासता के पश्चात् विश्व के सबसे बड़े गणराज्य के रूप में अपनी पहचान स्थापित की।

भारत में गणतंत्र का उद्भव स्वतंत्रता संग्राम की लंबी और संघर्षपूर्ण यात्रा का परिणाम है। 26 जनवरी 1950 को संविधान के लागू होने के साथ भारत एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य बना। यह यात्रा 1930 के ‘पूर्ण स्वराज’ संकल्प से आरंभ होकर 1947 की स्वतंत्रता और डॉ. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में निर्मित विश्व के सबसे विस्तृत लिखित संविधान के माध्यम से पूर्ण हुई, जिसे तैयार करने में 894 दिन लगे।

26 जनवरी 1950 को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 21 तोपों की सलामी के साथ ध्वजारोहण कर भारत को पूर्ण गणतंत्र घोषित किया। यह क्षण भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पलों में सदैव अंकित रहेगा। तभी से प्रतिवर्ष 26 जनवरी को यह राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है।

भारत आज विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक गणराज्य है। 2025 के आंकड़ों के अनुसार, सौ करोड़ से अधिक मतदाताओं की सहभागिता इसे विश्व का सबसे व्यापक लोकतांत्रिक गणराज्य बनाती है। किंतु भारत में गणतंत्र की अवधारणा केवल आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था तक सीमित नहीं है। यदि हम छठी शताब्दी ईसा-पूर्व के इतिहास पर दृष्टि डालें तो पाते हैं कि बिहार का वैशाली (लिच्छवी गणराज्य) विश्व के प्रथम ज्ञात गणराज्यों में से एक था, जहाँ राजशाही के स्थान पर जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि शासन करते थे। यह तथ्य भारत की लोकतांत्रिक चेतना की प्राचीनता और गहराई को प्रमाणित करता है।

गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति राष्ट्र के नाम संदेश देते हैं, जिसमें देश की उपलब्धियों, चुनौतियों और भविष्य की दिशा का विवेचन होता है। 26 जनवरी को कर्त्तव्य पथ पर ध्वजारोहण, राष्ट्रगान और 21 तोपों की सलामी के साथ समारोह का शुभारंभ होता है। इसके पश्चात् थल, जल और वायु सेना की परेड, सैन्य शक्ति का प्रदर्शन उनके शस्त्रों व आयुधों की प्रभावशाली परेड द्वारा किया जाता है। विभिन्न राज्यों और मंत्रालयों की सांस्कृतिक झांकियां, वीरता पुरस्कार, बाल पुरस्कार तथा वायुसेना का फ्लाई-पास्ट इस आयोजन को गरिमा प्रदान करता है।

प्रत्येक वर्ष किसी अंतरराष्ट्रीय राष्ट्राध्यक्ष या राष्ट्रप्रमुख को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाना भारत की वैश्विक कूटनीति और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को सशक्त रूप से अभिव्यक्त करता है।

गणतंत्र दिवस उन असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों को स्मरण करने का अवसर है, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। उनके त्याग और बलिदान के कारण ही आज हम स्वतंत्र और संप्रभु गणराज्य में रह रहे हैं।

यह दिवस हमें स्मरण कराता है कि भारतीय संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व जैसे मूल्यों पर आधारित है। 26 जनवरी को हम इन मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः नवीनीकृत करते हैं।

परंतु आज यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक है—क्या हम वास्तव में उन संवैधानिक आदर्शों पर खरे उतर पा रहे हैं, जिनके लिए यह गणराज्य स्थापित हुआ था? क्या महिलाओं, दलितों, वंचितों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को व्यवहार में समानता प्राप्त हो सकी है? राजनीतिक स्वार्थों के कारण बार-बार हुए संवैधानिक संशोधन, संसद और विधानसभाओं में बढ़ती असहिष्णुता तथा मर्यादाओं का ह्रास हमें आत्ममंथन के लिए बाध्य करता है।

हम अपने अधिकारों की बात तो करते हैं, परंतु अपने संवैधानिक कर्त्तव्यों को प्रायः विस्मृत कर देते हैं। संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के कर्त्तव्य जितने महत्वपूर्ण हैं, उतनी ही जिम्मेदारी समाज के प्रत्येक नागरिक की भी है। प्रश्न यह है—क्या हम सामाजिक स्तर पर अपने कर्त्तव्यों के प्रति सजग और संवेदनशील हैं?

इन्हीं पीड़ादायक प्रश्नों को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने अपनी पंक्तियों में व्यक्त किया था—

“जा कहो पुण्य यदि नहीं बढ़ा शासन में,
या आग सुलगती रही प्रजा के मन में—
तामस बढ़ता ही गया धकेल प्रभा को,
निर्बंध पथ मिल सका नहीं प्रतिभा को,
रिपु नहीं यही अन्याय हमें मारेगा—
अपने ही घर में फिर स्वदेश हारेगा।”

आइए, इस राष्ट्रीय गौरव और देशभक्ति के पर्व हम भारत के लोग संकल्प लें कि हम अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्त्तव्यों का भी हृदय से अनुपालन करेंगे तथा इस गणतंत्र को सुदृढ़ बनाने तथा इसके वास्तविक लक्ष्य की प्राप्ति हेतु सदैव प्रयत्नशील रहेंगे।

जय हिंद!
जय भारत!
जय जन-मन-गण!!

© दीपशिखा श्रीवास्तव ‘दीप’…… संस्थापिका अध्यक्ष
‘अहं ब्रह्मास्मि – नव उद्घोष फाउंडेशन’

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Author: Bharat Sarathi

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