— सुरेश गोयल ‘धूप वाला’

परम पिता परमात्मा ने मनुष्य को विवेक रूपी अनुपम उपहार दिया है, जो उसे अन्य सभी प्राणियों से श्रेष्ठ बनाता है। विवेक के सहारे ही मनुष्य सही–गलत का निर्णय करता है, जीवन की दिशा तय करता है और अपने साथ-साथ समाज का भी हित करता है। विवेकपूर्ण जीवन से संतुलन, आत्मसंतोष और सामाजिक सौहार्द संभव होता है।
लेकिन जब यही मनुष्य विवेक को त्यागकर जिद, हठ और आलस्य का दामन थाम लेता है, तो ये गुण उसके सबसे बड़े शत्रु बन जाते हैं।
जिद, दरअसल अहंकार का ही एक रूप है। जब व्यक्ति अपनी बात को ही अंतिम सत्य मान लेता है और दूसरों की बात सुनने को तैयार नहीं होता, तब जिद जन्म लेती है। जिद में फंसा मनुष्य न तर्क सुनता है, न अनुभव से सीखता है और न ही परिस्थितियों का यथार्थ मूल्यांकन करता है। इसका दुष्परिणाम केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवार, समाज और कार्यस्थल तक फैल जाता है। अनेक टूटते रिश्तों और बढ़ते विवादों की जड़ में यही जिद होती है।
जिद का ही अधिक उग्र और कठोर रूप हठ है। हठी व्यक्ति अपनी कही बात को अंतिम सत्य मान बैठता है। उसे न दूसरों की भावनाओं की चिंता रहती है और न ही निर्णयों के परिणामों की। “मैंने कह दिया, बस वही सही है”—यह मानसिकता विवेक को शिथिल कर देती है। हठ के कारण व्यक्ति लाभ–हानि, समय और परिस्थिति की अनदेखी कर बैठता है और ऐसे निर्णय ले लेता है, जिनका खामियाजा उसे लंबे समय तक भुगतना पड़ता है।
जिद और हठ दोनों ही आत्ममंथन के मार्ग को बंद कर देते हैं। ये व्यक्ति को अपनी गलती स्वीकार करने से रोकते हैं, जबकि वास्तविक बुद्धिमानी गलती मानने और उससे सीखने में ही है। जो स्वयं के भीतर झाँकने का साहस रखता है, वही आगे बढ़ता है; अन्यथा मनुष्य अपने ही अहंकार की जेल में कैद रह जाता है।
आलस्य भी मनुष्य का उतना ही घातक शत्रु है। यह धीरे-धीरे उसके लक्ष्य और सपनों को निगल जाता है। आलसी व्यक्ति काम को टालता रहता है, समय को व्यर्थ करता है और “कल कर लेंगे” के भ्रम में जीता है। लेकिन समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। जब तक वह जागता है, अवसर हाथ से निकल चुके होते हैं।
आलस्य मनुष्य को गैर-जिम्मेदार बना देता है। कार्य के प्रति उदासीनता उसकी विश्वसनीयता को समाप्त कर देती है। पढ़ाई में लापरवाही, व्यवसाय में ढिलाई और स्वास्थ्य के प्रति अनदेखी—ये सभी आलस्य के ही दुष्परिणाम हैं, जिनकी कीमत व्यक्ति को देर-सवेर चुकानी ही पड़ती है।
वास्तव में जिद, हठ और आलस्य—तीनों ही विवेक को कुंद कर देते हैं और आत्मविकास की राह में बाधा बनते हैं। इन दुर्गुणों का एकमात्र उपचार विवेक का सही उपयोग है। जब मनुष्य खुले मन से दूसरों की बात सुनता है, तर्क को महत्व देता है और समय पर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है, तभी वह स्वयं उन्नति करता है और समाज के लिए प्रेरणा बनता है।
आज के तेज़ रफ्तार और प्रतिस्पर्धात्मक जीवन में इन दुर्गुणों से बचना और भी आवश्यक हो गया है। सफलता उसी को मिलती है, जो समय का सम्मान करता है, परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालता है और अपनी गलतियों से सीखता है। विवेकपूर्ण निर्णय, विनम्रता और कर्मठता ही जीवन को सार्थक बनाते हैं।
अतः आवश्यक है कि हम आत्मनिरीक्षण करें और देखें—कहीं जिद, हठ या आलस्य हमारे जीवन की दिशा तो नहीं बिगाड़ रहे। यदि ऐसा है, तो समय रहते स्वयं को सुधारें। विवेक को अपना मार्गदर्शक बनाएं, दूसरों की भावनाओं का सम्मान करें और अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करें। यही मार्ग उत्तम जीवन, आत्मसंतोष और सच्ची सफलता की ओर ले जाता है।







