अस प्रभ छांड़ि भजहि जे आना ……

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(एकाकीपन, टूटते परिवार और सांस्कृतिक विस्मृति पर विचार)

आचार्य डॉ. महेन्द्र शर्मा ‘महेश’, पानीपत

जीवन में एकाकीपन से बचने के लिए अब गंभीर मंथन का समय आ गया है। परिस्थितियाँ अत्यंत तीव्र गति से बदल रही हैं। वह दिन दूर नहीं लगता जब यूरोप की भाँति हमारे नगरों की हर गली के कोने पर मनोरोग विशेषज्ञों के क्लिनिक होंगे, जहाँ प्रौढ़ और बुजुर्ग लोग मानसिक अवसाद के उपचार हेतु नींद की गोलियाँ लेते दिखाई देंगे।

जीवन में कहीं से भी, किसी से भी यदि कोई सद्गुण मिल जाए तो उसे उसी प्रकार ग्रहण कर लेना चाहिए, जैसे राह में चमकता-दमकता पड़ा हुआ सोना हर कोई उठा लेता है। किंतु आज की विडंबना यह है कि हम स्वयं बिखरते चले जा रहे हैं।

एक पुत्र है, एक पुत्री है। पुत्र अपनी पत्नी के साथ समुद्र पार विदेश में रहता है। पुत्री का विवाह हो चुका है। घर में कमरे तो बहुत हैं, पर उनमें रौनक नहीं, किलकारियाँ नहीं। खाली दीवारें मानो खाने को दौड़ती हैं। अब कमरे केवल कभी-कभार झाड़-पोंछ के लिए खुलते हैं।
युवा मिलने से कतराते हैं—कहीं ताऊ जी कोई काम न बता दें।

कच्चे घरों में कंदील जलाता नहीं कोई,
अब तो हमसे मिलने आता नहीं कोई।

हमारी उम्र के लोग अब प्रौढ़ नहीं, बल्कि दवाओं पर निर्भर हो चले हैं। कहीं आना-जाना समस्या बन गया है। संवाद अब केवल फोन तक सीमित रह गया है। जीवन-मरण जैसे अवसरों पर भी संवेदना मोबाइल कॉल से व्यक्त कर दी जाती है, क्योंकि घर में कोई ऐसा नहीं जो हमें परिजनों तक ले जा सके।

अब तो शरीर में एक अनजानी सिहरन और कंपन उठता है—क्या हमारे अंतिम संस्कार में कोई आएगा भी या नहीं?
हम स्वयं कहीं जा नहीं पा रहे, बेटा बाहर है, दूरी और परिस्थितियाँ आड़े हैं।

पुश्तैनी संपदा पर भाई-भाई मुकदमे लड़ रहे हैं। जिन कच्चे चूल्हों के चारों ओर बैठकर करपात्रों में रोटियाँ खाई थीं, वहाँ अब स्टील के बर्तन हैं और रक्त-संबंध वकील बन चुके हैं।

बुजुर्गों ने भी संयुक्त परिवार की वकालत करना लगभग छोड़ दिया है, क्योंकि उनके अपने घरों में भी वही अधिकारों का संघर्ष चल रहा है। ‘कर्तव्य’ शब्द मानो संयुक्त परिवार की अवधारणा से लुप्त हो गया है।
दूसरों के झगड़े सुलझाने वाले माता-पिता भी अब यही कहते हैं—“हर कोई अपने-अपने घर खुश रहे।”

यह समय की विकृत और विपरीत परिस्थितियाँ हैं। इनकी नकारात्मकता को नकारात्मकता से ही काटा जा सकता है, क्योंकि गणित में भी दो ऋण (–) चिन्ह मिलकर धन (+) बन जाते हैं।

यदि हम और कुछ नहीं कर सकते, तो कम से कम अपने ग्रंथों के विपरीत प्रतीत होने वाले चरित्रों से भी पारिवारिक और सामाजिक एकता के सद्गुण तो ग्रहण कर ही सकते हैं।
रामचरितमानस में कुंभकर्ण को देखिए—उसने रावण को सीता-हरण के लिए फटकारा, पर परिवार नहीं छोड़ा।
महाभारत में कर्ण जानता था कि दुर्योधन अधर्म पर है, फिर भी मित्र-धर्म निभाया।

परिवार और समाज इस सृष्टि की प्रथम इकाइयाँ हैं। प्रश्न यह है कि विषम परिस्थितियों का शिकार होने से बचने के लिए हम परिवार को संयुक्त रखने हेतु क्या करें?

भाषा छूटी, संस्कृति रूठी, भूल गए हम संस्कार।
अपनी मिट्टी से कटे तो टूट गए परिवार।

अब न कोई बड़ा रहा, न छोटा, पहचान और अपनापन पड़ा टोटा।

उठो मित्रो! अब ऐसी जुगत भिड़ाओ, नन्हे-मुन्नों का संस्कृति से पुनः परिचय करवाओ।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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