लोहड़ी पर्व आप सभी के लिए मंगलमय हो।
— आचार्य डॉ. महेन्द्र शर्मा ‘महेश’ पानीपत

धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि ऐसे धारण करने योग्य मर्यादित सिद्धांत, संस्कार और नियमन हैं, जिनसे मानवता का समग्र विकास और संरक्षण संभव हो। धर्म शास्त्र और मर्यादा से चलता है, न कि अस्त्र-शस्त्र से।
मनुस्मृति के अनुसार धर्म का प्रथम लक्षण धृति—अर्थात धैर्य, सहनशीलता और संयम है। यदि इनमें से कोई भी हमारे आचरण में नहीं है, तो हम स्वयं को धार्मिक कहने का अधिकार खो देते हैं।
सनातन धर्म का विषय इतना विशाल और उदार है कि जो भी श्रद्धा से इसमें प्रवेश करता है, सनातन उसे हृदय से स्वीकार करता है।
भागवत कथा रसखान के छंदों के बिना पूर्ण नहीं मानी जाती। “छछिया भर छाछ पे नाच नचावे” जैसे पद आज भी कृष्ण भक्ति का शिखर हैं। बृजभूमि में श्रीकृष्ण भक्त ताज बीबी का मकबरा इसकी जीवंत मिसाल है।
“दर्शन दो घनश्याम, आज मेरी अखियां प्यासी रे” जैसे कालजयी भजन के रचयिता साहिर लुधियानवी, संगीतकार नौशाद और गायक मोहम्मद रफ़ी—तीनों मुस्लिम थे। इस गीत की रिकॉर्डिंग के समय सभी कलाकारों को श्वेत वस्त्र धारण करने का निर्देश दिया गया था, क्योंकि इसे एक पवित्र और मुकद्दस भजन के रूप में गाया जाना था। श्रद्धा से ओतप्रोत वह क्षण आज भी भारतीय संस्कृति की साझा विरासत है।
रामायण के रसिया अनेक मुस्लिम कवि रहे हैं—दीन मोहम्मद दीन, इकबाल बिस्वानी, मौलवी बादशाह हुसैन राणा, इकबाल कादरी, आसिया खातून, कैफ़ी आज़मी, शबनम शेख और मोहम्मद इस्लाम, जो पिछले 35 वर्षों से रामायण पाठ कर रहे हैं।
1978 से पानीपत में स्वामी राजेश्वरानन्द जी सरस्वती (वास्तविक नाम राजेश मोहम्मद) सत्संग हेतु आते रहे, जिन्होंने संन्यास धारण किया। उनकी बेटियों का विवाह ब्राह्मण परिवारों में हुआ और उनके परिजन आज वृंदावन में निवास करते हैं।
मेरे एक सुशिक्षित मुस्लिम मित्र—जो वरिष्ठ अधिवक्ता हैं—पिछले कई वर्षों से मंगलवार का व्रत रखते हैं, शिव उपासक हैं और नियमित रूप से सूर्य व शिव को जल अर्पित करते हैं। हर अवकाश के दिन वे मेरे घर आकर हवन करते हैं।
स्पष्ट है—जो ईश्वर से प्रेम करता है, वही ईश्वर का हो जाता है; वहाँ न वर्ण पूछा जाता है, न जाति और न ही मज़हब।
आज ईश्वर की कृपा से हमारे समाज के बच्चे डॉक्टर, सीए, इंजीनियर, प्रोफेसर, शिक्षक, बैंकर, व्यापारी बन रहे हैं और कई विदेशों में सेवाएँ दे रहे हैं। यह सब श्रद्धा, सेवा और संस्कार का ही प्रतिफल है।
हम ब्राह्मण स्वयं को ईश्वर की वाणी और अभिव्यक्ति मानते हैं, इसलिए हमारा आचरण और भी संयमित, उदार और लोककल्याणकारी होना चाहिए।
मैं किसी की निंदा या खंडन नहीं करता, क्योंकि मैं वसुधैव कुटुम्बकम् के सिद्धांत में विश्वास रखता हूँ। मतभेद हो सकते हैं, पर अधीरता और क्रोध हमें विभाजन की ओर ले जाते हैं। संयम और सम्मान ही समाधान है—क्योंकि हमें सबको इसी समाज, इसी नगर में साथ रहना है।
गीता के नवें अध्याय में स्वयं ईश्वर ने कहा है—योगक्षेमं वहाम्यहम्—अर्थात ईश्वर अपने भक्तों की आवश्यकताओं की जिम्मेदारी स्वयं लेते हैं। कोई भी भूखा न सोए, इसकी गारंटी ईश्वर ने दी है।
लोहड़ी केवल पर्व नहीं, साम्प्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है। इसका संबंध मुगल काल के वीर मुस्लिम सरदार दुल्ला भट्टी से है, जिन्होंने एक ब्राह्मण की दो बेटियों का विवाह धर्म परिवर्तन के दबाव से बचाते हुए सम्पन्न कराया। उत्तरायण की पूर्व संध्या को, पौष मास के खरमास में, उन्होंने अन्याय के विरुद्ध खड़े होकर मानवता और सनातन मूल्यों की रक्षा की।
आज यदि 1556 से 2026 तक यह लगभग 470 वर्षों का लोकपर्व बन चुका है, तो क्या इसे केवल इसलिए न मनाया जाए कि इसकी कथा एक मुस्लिम नायक से जुड़ी है? क्या प्रेम, साहस और धर्मरक्षा पर कोई फतवा लागू हो सकता है?
लोहड़ी का वैज्ञानिक महत्व भी है। सर्दी में रक्त की गाढ़ापन बढ़ता है, जिससे हृदय व श्वसन संबंधी समस्याएँ बढ़ती हैं। अग्नि में तिल, गुड़ और अन्न अर्पित करने की परंपरा इसके समाधान से जुड़ी है।
तिल शनि का प्रतीक है, जो रक्तसंचार को संतुलित करता है; गुड़ मंगल का प्रतीक है, जो रक्त विकारों में लाभकारी है; और अन्न अर्पण से कृषि व समृद्धि की कामना जुड़ी है। हमारी परंपराओं के पीछे गहरे वैज्ञानिक और सामाजिक रहस्य छिपे हैं।
अतः आइए, हिन्दू-मुस्लिम के भेद से ऊपर उठकर लोहड़ी को प्रेम, एकता और मानवता के पर्व के रूप में मनाएँ।
साम्प्रदायिक सौहार्द का पर्व—लोहड़ी—आप सभी के लिए मंगलमय हो।







