प्रदूषण के बढ़ते स्तर ने फेफड़ों पर बढ़ाया दबाव, बच्चों से बुजुर्गों तक हर उम्र को बन रहा शिकार
—डॉ. विजय गर्ग, सेवानिवृत्त प्रिंसिपल, मलोट

ठंड की शुरुआत के साथ देश के कई हिस्सों में वायु प्रदूषण एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। सेवानिवृत्त प्रिंसिपल डॉ. विजय गर्ग बताते हैं कि इस मौसम में हवा के घनीभूत होने के कारण प्रदूषक तत्व शरीर में तेजी से प्रवेश करते हैं, जिससे सांस लेने में तकलीफ, खांसी, घरघराहट और श्वसन नली में सूजन की समस्या बढ़ जाती है।
फेफड़ों की समस्या पहचानना जरूरी
प्रदूषण की वजह से फेफड़े प्रभावित हैं या नहीं, इसकी पहचान व्यक्ति को स्वयं करनी पड़ती है। असहजता महसूस होने पर तुरंत पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट जैसे चिकित्सीय परीक्षण आवश्यक हैं। इसी आधार पर आगे का इलाज शुरू किया जाता है।
सबसे बड़ा खतरा—अस्थमा और सीओपीडी मरीजों पर
डॉ. गर्ग बताते हैं कि वायु प्रदूषण अस्थमा, सीओपीडी और श्वसन संक्रमण को गंभीर बना देता है। लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से दिल के दौरे और फेफड़ों के कैंसर तक का खतरा बढ़ जाता है। वाहनों के अधिक आवागमन वाले क्षेत्रों में लोगों का जोखिम कई गुना अधिक होता है।
ओजोन प्रदूषण वाले दिनों में बाहर खेलने वाले बच्चों में अस्थमा की संभावना सबसे ज्यादा पाई गई है।
घर के अंदर भी बढ़ रहा प्रदूषण
घरेलू प्रदूषण के स्रोतों में तंबाकू का धुआं, गैस स्टोव, निर्माण कार्य और विशेष रूप से बायोमास ईंधन—लकड़ी, कचरा या पराली का धुआं—मुख्य कारण हैं, जो सांस संबंधी समस्याओं को बढ़ाते हैं।
कैसे मिले राहत?
- अस्थमा में इस्तेमाल होने वाली ब्रोंकोडाइलेटर्स दवाएं अस्थायी राहत दे सकती हैं।
- प्रदूषण के दिनों में बाहर का व्यायाम कम किया जाए।
- हृदय व श्वसन रोगियों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
- धूम्रपान और घर के अंदर धुएं के स्रोतों को कम करना जरूरी है।
(नोट: यह जानकारी जन-जागरूकता के लिए है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए चिकित्सक से परामर्श लें।)









