जाट समुदाय में उभरता आक्रोश—क्या भीतर ही भीतर बदल रहा है सत्ता का समीकरण?
ऋषिप्रकाश कौशिक
हरियाणा में सत्ता की बागडोर संभाले नायब सिंह सैनी सरकार ने एक वर्ष पूरा ही किया था कि प्रदेश की राजनीति एक बार फिर अशांत और संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गई। जातीय बयानों की बाढ़ ने जहां सामाजिक ताने-बाने को झकझोरा है, वहीं राजनीतिक मंशाओं को लेकर भी नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

बीते दिनों एक मंत्री, एक राज्यसभा सांसद और एक विधायक द्वारा जाट समुदाय को लेकर की गई विवादित टिप्पणियों ने प्रदेश में गहरी बेचैनी पैदा की है। सफीदों के विधायक रामकुमार गौतम और राज्यसभा सांसद रामचंद्र जांगड़ा के उत्तेजक बयान जाट संगठनों को आंदोलित करने के लिए काफी रहे। वहीं वरिष्ठ मंत्री नरबीर सिंह की लगातार की गई टिप्पणियों ने अहीरवाल क्षेत्र में असंतोष की चिंगारी तेज़ कर दी है।
राजनीतिक विश्लेषक इन घटनाओं को महज़ संयोग मानने को तैयार नहीं। उनका मानना है कि 2014 से भाजपा की रणनीति में जाट–नॉन जाट ध्रुवीकरण केंद्रीय भूमिका निभाता रहा है, और अब सैनी सरकार के एक वर्ष पूर्ण होते ही विवादों का अचानक उभरना किसी नई “राजनीतिक स्क्रिप्ट” का हिस्सा भी हो सकता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह पहला मौका नहीं जब सरकार के भीतर अस्थिरता की चर्चा तैर रही है। कुछ समय पहले आईपीएस वाई. पूरण सिंह और एक पुलिसकर्मी की आत्महत्या के बाद भी वातावरण तनावपूर्ण हो गया था, और उस समय राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तक उठी कि—
“वास्तविक शक्ति खट्टर के पास है, नायब सिंह सैनी सिर्फ औपचारिक मुख्यमंत्री हैं।”
बढ़ती अटकलों को शांत करने के लिए बाद में खट्टर और सैनी—दोनों को सार्वजनिक रूप से सफाई देनी पड़ी थी।
लेकिन अब जब नई विवादित टिप्पणियाँ लगातार सामने आ रही हैं, फिर वही सवाल उठने लगा है—
क्या यह सब स्वतःस्फूर्त है, या फिर किसी बड़े राजनीतिक समीकरण का ट्रायल रन?
कुछ सूत्र दावा कर रहे हैं कि बयानबाज़ी “ऊपर के इशारे” पर हो रही है, ताकि आगामी राजनीतिक ज़रूरतों के अनुसार जमीन तैयार की जा सके। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि किसी भी स्तर पर नहीं हुई है।
फिलहाल इतना तय है कि हरियाणा जैसे जातीय रूप से संवेदनशील प्रदेश में ऐसी बयानबाज़ी किसी भी समय बड़ा आंदोलन खड़ा कर सकती है।
विपक्ष पहले ही सरकार को “जातीय विभाजन की राजनीति” के लिए कटघरे में खड़ा कर चुका है, जबकि जाट संगठन लगातार सक्रिय हो रहे हैं।
इस पूरे परिदृश्य में कुछ अहम सवाल खड़े होते हैं—
✔︎ क्या भाजपा नेतृत्व विवादित नेताओं पर कार्रवाई करेगा?
✔︎ क्या जाट संगठनों की सक्रियता बड़े आंदोलन का रूप लेगी?
✔︎ और क्या नायब सिंह सैनी की कुर्सी सच में खतरे में है?
हरियाणा की राजनीति इन दिनों संक्रमण के दौर में है। आने वाले कुछ सप्ताह प्रदेश के सत्ता समीकरणों में बड़ा फेरबदल ला सकते हैं। संकेत साफ हैं—राज्य की राजनीतिक तस्वीर में बड़े बदलाव अभी बाकी हैं।







