बच्चे भारत का भविष्य: आजीवन स्वस्थ उत्पादकता और कल्याण की नींव बचपन में ही रखी जा सकती है

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माता-पिता व परिवार द्वारा बच्चों के स्वस्थ जीवन शैली जीने में सतर्कता से ध्यान देने पर उनका पूरा जीवन सफ़लता से जीने की संभावना बढ़ती है

-एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

बच्चों के स्वास्थ्य, उनके जीवन शैली और विकास पर विशेष ध्यान देने से ही हम उन्हें एक स्वस्थ, गुणवान और जीवनभर फलदार वृक्ष की तरह तैयार कर सकते हैं। यह ध्यान बचपन में ही दिया जाना चाहिए, ताकि वे जीवनभर स्वस्थ रहें और समाज में योगदान देने के योग्य बनें।

बचपन में यदि किसी पौधे की तरह बच्चों का सही तरीके से पालन-पोषण और देखभाल की जाए, तो वह न केवल अपने शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, बल्कि उसका मानसिक और भावनात्मक विकास भी सही दिशा में होता है। आज की दुनिया में, जहाँ हर किसी की किस्मत अलग-अलग है, वहीं यह जरूरी है कि हम बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहें। ठीक वैसे ही जैसे एक किसान अपने खेत में बीज बोकर उसकी देखभाल करता है, ठीक वैसे ही हमें बच्चों के स्वास्थ्य, जीवन शैली और उनके विकास पर ध्यान देना चाहिए।

बच्चों के स्वास्थ्य पर ध्यान:

अतीत में, बच्चों के इलाज के लिए समर्पित कोई संस्थाएं नहीं थी, और उनका इलाज घर पर ही किया जाता था। हालांकि समय के साथ अब बच्चों के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए वैश्विक स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने बाल स्वास्थ्य के मामले में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जिसमें 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर को घटाने के लिए विभिन्न कदम शामिल हैं। 1990 से 2019 के बीच, वैश्विक बाल मृत्यु दर में 60% की कमी आई।

आज भी, कई देशों में बच्चों की मौतों का प्रमुख कारण गरीबी, अपर्याप्त पोषण और खराब स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली है, लेकिन यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि सभी बच्चों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हों, ताकि वे अपना 10वां जन्मदिन अच्छे स्वास्थ्य में मना सकें।

प्रारंभिक वर्षों में पोषण और देखभाल का महत्व:

बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए सबसे निर्णायक कारक उनका प्रारंभिक पोषण और देखभाल है। माता-पिता, परिवार और देखभालकर्ताओं का बच्चों के शुरुआती वर्षों में पालन-पोषण उनके शारीरिक और मानसिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बच्चों को सुरक्षित और संरक्षित वातावरण, पोषण, स्वास्थ्य देखभाल, समय पर टीकाकरण, और मानसिक विकास के अवसर प्रदान करना आवश्यक है।बच्चों के पालन-पोषण में स्वच्छ पानी, स्वच्छता, और सुरक्षित स्थानों का भी योगदान होता है। जब देखभाल करने वालों को समर्थन मिलता है, तो उनका मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर रहता है, जिससे वे बच्चों के स्वास्थ्य और विकास में और बेहतर योगदान दे सकते हैं।

राष्ट्रीय पोषण सप्ताह और कुपोषण का समाधान:

भारत में, हर साल राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मनाया जाता है, ताकि लोगों में पोषण के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके। यह सप्ताह विशेष रूप से बच्चों और युवाओं के सही पोषण के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि शरीर को सही मात्रा में पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है ताकि उनका शारीरिक और मानसिक विकास सही ढंग से हो सके।दुर्भाग्यवश, बहुत से बच्चे कुपोषण का शिकार होते हैं, और इसे रोकने के लिए परिवारों को सही आहार और जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। पोषण की कमी बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती है, जिससे उनकी उत्पादकता और जीवन की गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

निष्कर्ष:

आज के बच्चों में स्वास्थ्य देखभाल, पोषण और जीवनशैली सुधार के बीज बोकर उन्हें कल एक स्वस्थ और उत्पादक समाज का हिस्सा बनाना हमारे हाथ में है। माता-पिता और परिवारों को इस दिशा में सतर्कता से ध्यान देना चाहिए ताकि उनके बच्चे जीवनभर स्वस्थ रहें और समाज में सक्रिय योगदान दे सकें।

-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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