-कमलेश भारतीय

बच्चे अपने माता पिता की ओर सिर्फ फुटबॉल ही नहीं फेंकते बल्कि अपने विचार और सपने भी थ्रो करते हैं, इन्हें कैच करना सीखिए । यह बात बहुत बारीकी से ‘वेलकम ज़िंदगी’ नाटक में कही गयी है और यह मध्यवर्गीय समाज के इर्द गिर्द घूमता नाटक सबकी आंखें नम कर गया !

मध्यवर्गीय परिवारों में बेटा सीधे पापा से बात करने की बजाय मां को माध्यम बनाता है तो पिता भी जवाब अपनी पत्नी की और से ही देता है। इस तरह बाप और बेटे के बीच पिसती है एक माँ और पत्नी ! वही पुल भी बनती है बाप और बेटे के बीच ! हालांकि उसके गिले शिकवे हैं लेकिन वह कहती है कि मुंह न खुलवाओ नहीं तो ब्रहमांड दिख जायेगा !

बेटा बिजनेस करने के लिए चार लाख रुपये देने के लिए मां के माध्यम से फाइल पापा को देता है लेकिन पापा की आशंकाओं और डर को दूर नहीं कर पाता ! इसलिए वह नाराज़ होकर कुछ दिन बाहर रहता है । इधर पिता की सेवानिवृत्ति निकट आ रही है और पिता एक भाषण लिखता है, जिसे वह अपनी पत्नी को सुनाता है, जैसे अपना पक्ष रख देता है! आंसुओं के साथ ! तभी उसकी पत्नी फोन देकर कहती है कि लो बेटे से बात कर लो‌ क्योंकि उसने भाषण शुरू होने के साथ ही बेटे का फोन ऑन कर दिया था ! इस फोन पर वह पापा से बात करने की बजाय सुबकता ही रह जाता है ! आखिर वह उसी समय घर लौटता है और कहता है कि मैं पूरी तरह घर छोड़ने वाला था लेकिन अब वह यहीं रहेगा और वह स्काॅच की बोतल पापा की ओर फेंक कर कहता है कि पापा कैच और‌ पापा कैच कर लेते हैं ! यही है जैसे भी हालात हैं, वेलकम ज़िंदगी! जिसमें काॅमेडी भी है! हंसी खुशी के पल भी हैं। पिता अरूणांचल के रूप में खुद नाटक लेखक, निर्देशक सौम्य जोशी, मां के रूप में जिग्ना और बेटे की भूमिका में मोहित रहे और तीनों एक्टिंग में एक दूसरे से कहीं कम न थे! तीनों ने ही सुख दुख के उतार चढ़ाव का जी कर अभिनय किया ! यह कहा जा सकता है कि तीन दुखों के बीच एक सुख है।

इस अवसर पर स्थानीय निकाय मंत्री डाॅ कमल गुप्ता व प्रसिद्ध समाजसेवी श्रीमती पंकज संथीर मुख्यातिथियों के तौर पर मौजूद रहे और दोनों ने इसकी जमकर तारीफ की। डाॅ कमल गुप्ता ने स्वैच्छिक कोष से दो लाख रुपये देने की घोषणा की । यह मनीष जोशी व मनोज बंसल की जोड़ी के रंग आंगन नाट्य महोत्सव की शुरुआत थी, जिसने इस वर्ष दसवें पड़ाव में प्रवेश कर लिया है। शुरुआत और श्रीगणेश बहुत ही शानदार रहा ।

error: Content is protected !!