कमलेश भारतीय

कोई भी सरकार हो , तबादलों में कर्मचारियों की जान अटकी और फंसी रहती है बिल्कुल जैसे पुरानी कहानियों में पिंजरे में बंद तोते में राजकुमार की जान फंसी रहती थी । तबादला रुकवाने या करवाने या विरोधी को परेशान करने का एक जाल फैला हुआ है सरकारी तंत्र में । आप चाहें तो इसे तबादला माफिया भी कह सकते हैं । कुछेक तबादले जरूर राजनेताओं के करीब होने के नाते बिन खर्ची के होते होंगे नहीं तो पैसा बोलता है तो तबादले का खत खुलता है ।

इसका ताज़ा उदाहरण राजस्थान में देखने सुनने को मिला जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बिड़ला सभागार में आयोजित शिक्षक दिवस सम्मान समारोह में शिक्षकों से पूछ लिया कि क्या तबादले के लिए आपको पैसे खिलाने पड़ते हैं ? मुख्यमंत्री के इतना पूछते ही शिक्षकों ने भरे सभागार में एकसाथ कहा-हां । इस अवसर पर राजस्थान के शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह जटासरा भी मौजूद थे । मुख्यमंत्री ने फिर पूछा वही सवाल और फिर आया वही जवाब कि हां , पैसे खिलाने पड़ते हैं । इस पर मुख्मंतंत्रो ने कहा कि कमाल है । यह बड़े दुख की बात है । शिक्षक पैसे देकर तबादलों के लिए लालयित रहते हैं । तबादला नीति बननी चाहिए । शिक्षक को पहले से पता हो कि तबादला कब होना है । न पैसे चलेंगे और न ही विधायकों को तंग करने की जरूरत रह जायेगी ।

हालांकि शिक्षा मंत्री ने सफाई दी कि मेरे रहते स्टाफ में से किसी ने एक प्याली चाय भी नहीं पी किसी से । मज़ेदार बात यह है कि तबादला नीतियां भी इस माफिये के आगे दम तोड़ देती हैं, अगर मुख्यमंत्री किसी और विभाग में भी सवाल करेंगे तो वहां भी जवाब ‘हां’ में ही मिलेगा ।

हर शाख पे उल्लू बैठा है
अंजाम ए गुलिस्तान क्या होगा,,,

यह कोई राजस्थान की बात नहीं है । अपने हरियाणा में भी यदि मुख्यमंत्री भरी सभा में पूछें कि पर्ची/खर्ची चलती है कि नहीं तो ऐसा ही जवाब आयेगा । हालांकि मुख्यमंत्री महोदय हर जनसभा में यह दावा करते हैं कि हरियाणा में पर्ची/खर्ची सिस्टम बंद करवा दिया । हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इन्हें ईमानदार मुख्यमंत्री का स्वर्ण पदक दे चुके हैं लेकिन फील्ड में आकर कभी हकीकत जानने की कोशिश कीजिए ।

पंजाब में एक समय एक ऐसे राजस्व मंत्री रहे जो पुराने जमाने की तरह भेष बदल कर साधारण ग्रामीण बन कर तहसील में जाते और पूछते कि रजिस्ट्री करवाने का कितना खर्चा लगेगा और वे रेट जान जाते । हमारे शहर में पंजाब की पहली महिला तहसीलदार सरोजिनी शारदा के सामने भी ऐसे ही बदले भेष में कटहरे के सामने जा खड़े हुए और उन्हें पहचान कर सरोजिनी ने कहा कि मंत्री जी आइए । आपका स्वागत् है । जब तक मैं यहां तहसीलदार हूं तब तक कोई खर्च नहीं और कागज़/दस्तावेज देखकर ही रजिस्ट्री की जाती है । मंत्री उन्हें शाबाशी देकर गये । ऐसे मंत्री और ऐसे तहसीलदार कहां ? यदि मुख्यमंत्री जी भी भेष बदल कर तहसील पहुंचे तो उन्हें खर्ची और पर्ची की असलियत मालूम पड़ जाये । अनिल विज कभी कभी औचक निरीक्षण करने जाते हैं और कुछेक लोगों को निलम्बित करने के आदेश भी देते हैं ।

खुद सत्रह बरस शिक्षक रहा हूं । शिक्षक मुख्य सड़क पर आने वाले स्कूल में तबादले से बचते थे । उनका मानना था कि कोई भी मंत्री जब मुख्य सड़क से जायेगा तो कभी भी छापा पड़ सकता है । इसलिए लिंक रोड वाले स्कूल ही चुनते थे । कुछ तबादलों के लिए राजधानी में सचिवालय के चक्कर भी काटने का कड़वा अनुभव है । खैर । बड़ी बात उठाई राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने । बेशक विरोधियों ने इसे वायरल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी पर क्या और किसी मुख्यमंत्री ने शिक्षक सम्मान समारोह में ऐसा सवाल किया ?
-पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी ।

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