सीसा प्रदूषण : सेहत पर अदृश्य खतरा

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बच्चों के विकास को नुकसान पहुंचा सकता है सीसा, जागरूकता के साथ प्रभावी निगरानी जरूरी

अमरपाल सिंह वर्मा

विश्व स्वास्थ्य संगठन की अगुवाई में इस वर्ष 18 से 24 अक्टूबर तक ‘अंतरराष्ट्रीय सीसा विषाक्तता रोकथाम सप्ताह’ मनाया जा रहा है। इस वर्ष का विषय है—‘पहचान से रोकथाम तक’। इसका उद्देश्य सीसे के खतरों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और इसके संपर्क को रोकने के लिए ठोस कार्रवाई को प्रोत्साहित करना है। सीसा युक्त पेंट, कुछ खिलौनों, सौंदर्य प्रसाधनों, दूषित खाद्य पदार्थों और बर्तनों के जरिये शरीर में पहुंचने वाला यह जहरीला तत्व स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। मुश्किल यह है कि इसके दुष्प्रभाव हमेशा तुरंत दिखाई नहीं देते। लक्षण सामने आने तक शरीर को नुकसान पहुंच चुका हो सकता है।

भारत में सीसा प्रदूषण को सार्वजनिक स्वास्थ्य की चर्चा में अधिक जगह मिलनी चाहिए। विशेष चिंता बच्चों की है, जिनका मस्तिष्क और शरीर विकास की अवस्था में होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, सीसे के संपर्क का कोई ज्ञात सुरक्षित स्तर नहीं है। इसलिए कम मात्रा में संपर्क को भी पूरी तरह निरापद नहीं माना जा सकता।

अनुमान बताते हैं खतरे का पैमाना

यूनिसेफ और प्योर अर्थ की वर्ष 2020 में प्रकाशित रिपोर्ट ‘द टॉक्सिक ट्रुथ’ ने इस समस्या की व्यापकता की ओर ध्यान खींचा था। रिपोर्ट के अनुसार, विश्व में लगभग 80 करोड़ बच्चों के रक्त में सीसे का स्तर पांच माइक्रोग्राम प्रति डेसीलीटर या उससे अधिक होने का अनुमान था। भारत में पांच माइक्रोग्राम प्रति डेसीलीटर से अधिक स्तर वाले बच्चों की अनुमानित संख्या करीब 27.5 करोड़ बताई गई थी।

ये आंकड़े सभी बच्चों की व्यक्तिगत जांच के परिणाम नहीं, बल्कि उपलब्ध अध्ययनों और सांख्यिकीय आकलनों पर आधारित थे। इन्हें वर्ष 2026 की ताजा गणना के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। इसके बावजूद ये समस्या के बड़े पैमाने को समझने का महत्वपूर्ण आधार हैं। पांच माइक्रोग्राम का उल्लेख भी सुरक्षित सीमा के अर्थ में नहीं है।

घर से उद्योग तक संपर्क के स्रोत

सीसे का खतरा इसलिए जटिल है क्योंकि इसके स्रोत हमारे आसपास मौजूद हो सकते हैं। पुराने सीसा युक्त पेंट की पपड़ियां और धूल, दूषित मिट्टी, कुछ खिलौने तथा कुछ पारंपरिक सौंदर्य प्रसाधन इसके संपर्क का कारण बन सकते हैं। छोटे बच्चों में हाथ या वस्तुएं मुंह में डालने की आदत होने से दूषित धूल शरीर में पहुंचने की आशंका बढ़ जाती है।

पुरानी सीसा-अम्ल बैटरियों की असुरक्षित रीसाइक्लिंग भी चिंता का विषय है। ऐसी गतिविधियों से निकलने वाला प्रदूषण श्रमिकों के साथ आसपास की बस्तियों को प्रभावित कर सकता है। दूषित धूल और मिट्टी के संपर्क में आने वाले बच्चे विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं।

खाद्य पदार्थों में सीसे की मौजूदगी इस चुनौती को और गंभीर बनाती है। भारत सहित दक्षिण एशिया में हुए अध्ययनों में हल्दी के कुछ नमूनों में लेड क्रोमेट की मिलावट के प्रमाण मिले हैं। हल्दी का पीला रंग अधिक चमकीला बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला यह पदार्थ स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। हालांकि, किसी अध्ययन के निष्कर्षों को बाजार में उपलब्ध समस्त हल्दी पर लागू नहीं किया जाना चाहिए। जरूरी है कि मिलावट की पहचान और रोकथाम के लिए नियमित जांच हो।

बच्चों और गर्भवती महिलाओं पर असर

सीसा बच्चों की सीखने-समझने की क्षमता, ध्यान और व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। इसका असर उनकी पढ़ाई और भविष्य की संभावनाओं पर भी पड़ सकता है। यह हीमोग्लोबिन बनने की प्रक्रिया में बाधा डालकर एनीमिया का कारण बन सकता है। लंबे समय तक संपर्क में रहने से गुर्दों को नुकसान, उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम भी बढ़ सकता है।

गर्भावस्था के दौरान सीसे का संपर्क गर्भस्थ शिशु के विकास को प्रभावित कर सकता है। शोध में इसे गर्भपात, समय से पहले प्रसव और भ्रूण की वृद्धि बाधित होने जैसे प्रतिकूल परिणामों से भी जोड़ा गया है। इसलिए सीसा प्रदूषण को केवल औद्योगिक श्रमिकों की समस्या मानना गलत होगा। यह मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य का भी महत्वपूर्ण प्रश्न है।

कुपोषण इस खतरे को बढ़ा सकता है। आयरन और कैल्शियम की कमी होने पर शरीर सीसे का अधिक अवशोषण कर सकता है। पर्याप्त पोषण से वंचित बच्चे इस कारण अतिरिक्त जोखिम में पड़ सकते हैं। पोषण सुधार महत्वपूर्ण है, लेकिन सीसे के स्रोतों को समाप्त करना भी उतना ही जरूरी है।

नियमों के साथ निगरानी जरूरी

भारत में घरेलू और सजावटी पेंट के लिए सीसे की अधिकतम सीमा 90 पार्ट्स प्रति मिलियन यानी पीपीएम निर्धारित है। यह सीमा सूखी पेंट फिल्म के निर्धारित भार-आधार पर लागू होती है। बैटरी अपशिष्ट के सुरक्षित प्रबंधन के लिए भी नियम मौजूद हैं।

लेकिन नियमों की उपयोगिता उनके प्रभावी पालन से तय होती है। पेंट के नमूनों की जांच, बैटरी रीसाइक्लिंग इकाइयों का निरीक्षण और खाद्य पदार्थों में मिलावट की निगरानी नियमित होनी चाहिए। जांच के परिणाम और उल्लंघन पर हुई कार्रवाई सार्वजनिक होने से जवाबदेही बढ़ेगी। इससे यह समझने में भी मदद मिलेगी कि किन क्षेत्रों और उत्पादों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।

सीसा प्रदूषण का नुकसान व्यक्ति और परिवार से आगे भी जाता है। बच्चों की बौद्धिक क्षमता और शिक्षा पर पड़ने वाला प्रभाव भविष्य की उत्पादकता को प्रभावित कर सकता है। यूनिसेफ और प्योर अर्थ की रिपोर्ट इस व्यापक सामाजिक एवं आर्थिक नुकसान की ओर भी ध्यान दिलाती है। इस दृष्टि से सीसे की रोकथाम बच्चों के भविष्य और देश की विकास क्षमता में निवेश है।

जिम्मेदारी केवल उपभोक्ता की नहीं

लोगों को संभावित स्रोतों और बचाव के उपायों की जानकारी देना जरूरी है, लेकिन सारी जिम्मेदारी उपभोक्ताओं पर नहीं डाली जा सकती। आम व्यक्ति किसी उत्पाद को देखकर उसमें सीसे की मात्रा नहीं जान सकता। सुरक्षित उत्पाद उपलब्ध कराना, उद्योगों की निगरानी करना, मिलावट रोकना और प्रदूषण से प्रभावित बस्तियों की पहचान करना सरकार तथा संबंधित संस्थाओं का दायित्व है।

सीसे का प्रभाव कई बार स्पष्ट लक्षण दिखाई देने से पहले ही बच्चों के विकास को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए रोकथाम को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय सीसा विषाक्तता रोकथाम सप्ताह की सार्थकता तभी होगी, जब जागरूकता के साथ बाजार में बिकने वाले उत्पादों की जांच, प्रदूषणकारी गतिविधियों पर नियंत्रण और नियमों का प्रभावी पालन सुनिश्चित हो।

बच्चों को सुरक्षित वातावरण देना साझा जिम्मेदारी है। इसे निभाने के लिए घोषणाओं से आगे बढ़कर ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें प्रदूषण के स्रोत समय रहते पहचाने जाएं और उन्हें रोकने की कार्रवाई हो।

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Author: Bharat Sarathi

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