सुनहु तात अब राम कहानी : आस्था, मर्यादा और लोकमंगल की अनन्त कथा

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डॉ. नीरज भारद्वाज

‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता’—इस उक्ति का भाव है कि भगवान की महिमा और उनकी कथा का विस्तार अनन्त है। श्रीरामकथा की व्यापकता भी ऐसी ही है। भारतीय साहित्य, संस्कृति और लोकजीवन में यह कथा अनेक रूपों में प्रवाहित होती रही है। महर्षि वाल्मीकि की रामायण में इसका विस्तृत स्वरूप मिलता है, तो गोस्वामी तुलसीदास का श्रीरामचरितमानस इसे लोकभाषा में जन-जन के और निकट ले आता है। विभिन्न भाषाओं की रामायणों, लोकगीतों और रामलीलाओं ने भी इस परंपरा को समृद्ध किया है।

रामकथा केवल घटनाओं का वर्णन नहीं, जीवन के आदर्शों और मानवीय मूल्यों का परिचय भी है। इसमें धर्म, सत्य, करुणा, त्याग, कर्तव्य और लोककल्याण का संदेश मिलता है। रामरहस्योपनिषद् में श्रीराम को परब्रह्म तथा संसार के बंधनों से पार लगाने वाला तारक ब्रह्म माना गया है। भक्त के लिए श्रीराम आराध्य हैं और उनके चरित्र में जीवन को दिशा देने वाले आदर्श भी विद्यमान हैं।

महर्षि वाल्मीकि की रामायण के बालकाण्ड के प्रथम सर्ग में नारद जी श्रीराम के गुणों का वर्णन करते हुए कहते हैं—

धर्मज्ञः सत्यसन्धश्च प्रजानां च हिते रतः।
यशस्वी ज्ञानसम्पन्नः शुचिर्वश्यः समाधिमान्॥

अर्थात श्रीराम धर्म के ज्ञाता, अपने वचन के प्रति निष्ठावान और प्रजा के हित में निरंतर संलग्न रहने वाले हैं। वे यशस्वी, ज्ञानसम्पन्न, पवित्र, संयमी और एकाग्रचित्त हैं। श्रीराम का यह स्वरूप बताता है कि महानता केवल सामर्थ्य में नहीं, बल्कि उसके लोकहितकारी उपयोग में निहित है।

श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय के इकतीसवें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—‘रामः शस्त्रभृतामहम्’, अर्थात शस्त्र धारण करने वालों में मैं राम हूँ। धनुर्धर श्रीराम की प्रतिष्ठा धर्म और सदाचार के रक्षक के रूप में है। उनका पराक्रम मर्यादा और उत्तरदायित्व से जुड़ा हुआ है।

कथा की जीवंत परंपरा

भारतीय संस्कृति, भक्ति, साधना और मूल्यबोध को आकार देने में रामकथा की असाधारण भूमिका रही है। संतों, मनीषियों और सामान्य जनों ने इसे सुना, समझा और आगे बढ़ाया है। कथा कहने और सुनने की यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, पीढ़ियों के बीच संस्कारों और जीवन-दृष्टि का संवाद भी है।

श्रीरामचरितमानस में चार प्रमुख वक्ता-श्रोता युगलों की पहचान की जाती है—भगवान शिव और पार्वती, काकभुशुण्डि और गरुड़, याज्ञवल्क्य और भारद्वाज तथा तुलसीदास और संत-समाज अथवा सामान्य पाठक-श्रोता। इन संवादों में जिज्ञासा, श्रद्धा और विवेक के माध्यम से रामकथा के विविध अर्थ खुलते हैं।

शिव-पार्वती संवाद

भगवान शिव और पार्वती का संवाद रामकथा का महत्त्वपूर्ण आधार है। पार्वती की जिज्ञासाएँ कथा को आगे बढ़ाती हैं और शिव उनके प्रश्नों का समाधान करते हैं। बालकाण्ड में शिव कहते हैं—

सोइ मम इष्टदेव रघुबीरा।
सेवत जाहि सदा मुनि धीरा॥

अर्थात रघुवीर श्रीराम ही मेरे इष्टदेव हैं, जिनकी सेवा धीर और ज्ञानी मुनि सदा करते हैं।

पार्वती की रामकथा सुनने की इच्छा पर शिव उनकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं—

धन्य धन्य गिरिराजकुमारी।
तुम्ह समान नहिं कोउ उपकारी॥
पूँछेहु रघुपति कथा प्रसंगा।
सकल लोक जग पावनि गंगा॥

इसका भाव है कि पार्वती ने रामकथा के विषय में पूछकर सबका उपकार किया है। यह कथा गंगा के समान संसार को पवित्र करने वाली है। यहाँ जिज्ञासा का सम्मान भी है और कथा के लोकमंगलकारी स्वरूप की प्रतिष्ठा भी।

काकभुशुण्डि और गरुड़

श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि और गरुड़ का संवाद भक्ति तथा ज्ञान की दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है। गरुड़ की जिज्ञासाओं और संशयों का समाधान करते हुए काकभुशुण्डि रामकथा सुनाते हैं। इस प्रसंग में कथा का श्रवण मोह और भ्रम से मुक्ति तथा भक्ति की दृढ़ता का माध्यम बनता है।

यह संवाद बताता है कि श्रद्धा के साथ उठे प्रश्न आध्यात्मिक यात्रा में बाधा नहीं हैं। उचित संवाद और विवेकपूर्ण श्रवण से समझ विकसित होती है। रामकथा का रस तभी गहरा होता है, जब श्रोता खुले मन और विनम्र भाव से उसे ग्रहण करता है।

याज्ञवल्क्य और भारद्वाज

रामकथा की परंपरा का वर्णन करते हुए तुलसीदास लिखते हैं—

तेहि सन जागबलिक पुनि पावा।
तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा॥
ते श्रोता बकता समसीला।
सवँदरसी जानहिं हरिलीला॥

अर्थात याज्ञवल्क्य ने यह कथा प्राप्त की और फिर भारद्वाज को सुनाई। यहाँ वक्ता और श्रोता समान शील वाले तथा भगवान की लीला के मर्म को समझने वाले हैं।

इस संवाद में ज्ञान और विनम्रता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। कथा का प्रभाव केवल कहने वाले की विद्वत्ता पर निर्भर नहीं करता; सुनने वाले की ग्रहणशीलता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण होती है।

तुलसीदास की विनम्रता

गोस्वामी तुलसीदास ने रामकथा को अवधी में प्रस्तुत कर व्यापक लोकसमाज से जोड़ा। अपनी रचना के विषय में उनका स्वर अत्यंत विनम्र है—

संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी।
रामचरितमानस कबि तुलसी॥
करइ मनोहर मति अनुहारी।
सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी॥

तुलसीदास कहते हैं कि भगवान शिव की कृपा से उनके हृदय में सुबुद्धि का विकास हुआ और वे अपनी बुद्धि के अनुरूप रामचरितमानस को मनोहर बनाने का प्रयास कर रहे हैं। साथ ही, वे सज्जनों से आग्रह करते हैं कि उसे निर्मल चित्त से सुनें और जहाँ कोई कमी दिखाई दे, उसे सुधार लें। इतनी महान रचना के रचयिता का यह विनयभाव अपने आप में सीख है।

श्रीरामकथा आस्था को दृढ़ करने के साथ मनुष्य को अपने आचरण पर विचार करने की प्रेरणा देती है। राम के जीवन में सत्य के प्रति निष्ठा, संबंधों के प्रति उत्तरदायित्व, विपरीत परिस्थितियों में धैर्य और लोकहित की चिंता दिखाई देती है। कथा सुनने की सार्थकता इन मूल्यों को जीवन में स्थान देने में है।

भक्तिपरंपरा का विश्वास है कि श्रद्धापूर्वक रामकथा का श्रवण और मनन मन को निर्मल करता है तथा भवसागर से पार होने का मार्ग दिखाता है। श्रीराम हमारी आस्था के केंद्र हैं और उनकी कथा हमारी सांस्कृतिक चेतना का अमूल्य आधार। यह कथा जितनी बार सुनी जाती है, उतनी बार जीवन को समझने का कोई नया सूत्र दे जाती है।

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Author: Bharat Sarathi

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