सीजेपी के मुकाबले ‘लाल हिट’: विरोध की मर्यादा का सवाल

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असहमति का जवाब तर्क और संवाद से हो, अपमान और आरोपों से नहीं

सौरभ वार्ष्णेय

देश की राजनीति में विरोध और उसके प्रतिरोध की नई तस्वीर सामने आई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शनों के बीच अभिजीत दीपके से जुड़ी कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के विरोध में ‘लाल हिट जनता पार्टी’ नामक संगठन चर्चा में है। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, 18 अक्टूबर को दिल्ली के मालवीय स्मृति भवन में इसका पहला सदस्य मिलन समारोह आयोजित हुआ। बैठक में संगठन के प्रमुख अयान भटनागर और अन्य वक्ताओं ने सीजेपी, कांग्रेस तथा प्रदर्शनकारियों की आलोचना की। इस घटनाक्रम ने सवाल उठाया है कि लोकतंत्र में विरोध का जवाब देते समय भाषा, व्यवहार और सार्वजनिक जिम्मेदारी की सीमाएं क्या होनी चाहिए।

भटनागर का कहना है कि संगठन चुनाव लड़ने के लिए नहीं बनाया गया है। उसका उद्देश्य सीजेपी और उसके प्रदर्शनों के खिलाफ अपनी बात रखना है। उन्होंने सीजेपी को सार्वजनिक बहस की चुनौती भी दी है। फिलहाल इसे किसी स्थापित चुनावी विकल्प के बजाय विरोध प्रदर्शनों के प्रतिरोध में उभरी संगठनात्मक पहल के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

असहमति के लिए जगह जरूरी

लोकतंत्र में नागरिकों को सरकारी फैसलों, राजनीतिक दलों और सार्वजनिक संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठाने की जगह मिलनी चाहिए। इसी तरह किसी आंदोलन से असहमत लोगों को भी उसकी आलोचना करने और शांतिपूर्ण ढंग से अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। किसी एक पक्ष को असहमति का एकाधिकार नहीं दिया जा सकता।

इस दृष्टि से सीजेपी के विरोध में किसी संगठन का सामने आना अपने आप में अनुचित नहीं है। विचारों की विविधता लोकतंत्र को समृद्ध कर सकती है। प्रश्न यह है कि यह प्रतिरोध जनता के सामने तथ्य और तर्क रखता है या केवल विरोधी समूह को अपमानित करने तक सीमित रहता है।

किसी संवैधानिक संस्था के निर्णय पर सवाल उठाना और उस संस्था के प्रति हिंसा या घृणा भड़काना अलग-अलग बातें हैं। संस्थाओं की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए उनके कामकाज पर उठे गंभीर प्रश्नों का तथ्यपूर्ण उत्तर भी आवश्यक है। आलोचना को स्वतः संस्थाविरोधी मान लेने से संवाद की गुंजाइश घटती है।

भाषा से तय होती है दिशा

एबीपी की रिपोर्ट के अनुसार, बैठक में भटनागर ने प्रदर्शनकारियों के लिए कीड़े-मकोड़ों और तिलचट्टों जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। ऐसी भाषा पर विचार करना जरूरी है। किसी संगठन का नाम व्यंग्यात्मक हो सकता है, लेकिन उससे जुड़े मनुष्यों को तुच्छ बताना स्वस्थ राजनीतिक संवाद का विकल्प नहीं बन सकता।

यह कसौटी सभी पक्षों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। सरकार समर्थक हों या विरोधी, किसी को भी असहमति रखने वालों के अपमान को राजनीतिक उपलब्धि नहीं मानना चाहिए। तीखे सवाल और कठोर आलोचना लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन उनका आधार सार्वजनिक कार्य और प्रमाण होने चाहिए।

जब राजनीतिक भाषा विरोधी को सुनने के बजाय उसे मिटा देने की भावना पैदा करने लगे, तब बहस अपने उद्देश्य से भटक जाती है। विचार का प्रभाव उसकी तार्किकता से तय होना चाहिए, उत्तेजक शब्दों से नहीं।

आरोपों की कसौटी प्रमाण

किसी संगठन की गतिविधियों या वित्तीय संसाधनों को लेकर गंभीर आरोप हों तो उनकी जांच जरूरी है। लेकिन आरोप लगाने और आरोप सिद्ध होने के बीच का अंतर बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। केवल राजनीतिक असहमति के आधार पर किसी समूह की निष्ठा या वैधता पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया जा सकता।

पारदर्शिता की अपेक्षा एकतरफा भी नहीं होनी चाहिए। जनता के नाम पर आंदोलन करने वाले संगठनों को अपने उद्देश्यों, नेतृत्व और संसाधनों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। यही अपेक्षा उन समूहों से भी होनी चाहिए जो इन आंदोलनों का विरोध करने के लिए गठित होते हैं।

एक पक्ष पर संदेह दूसरे पक्ष की स्वतः विश्वसनीयता का प्रमाण नहीं है। सार्वजनिक विश्वास प्रत्येक संगठन को अपने काम और व्यवहार से अर्जित करना पड़ता है। मीडिया की जिम्मेदारी भी है कि वह आरोप, संबंधित पक्ष का जवाब और सत्यापित तथ्य स्पष्ट रूप से अलग रखे।

बहस हो, प्रदर्शन नहीं

सीजेपी को खुली बहस की चुनौती संवाद का अवसर बन सकती है, बशर्ते उसका उद्देश्य किसी को नीचा दिखाना न हो। उपयोगी बहस में पहले विषय तय हों, दोनों पक्ष अपने दावों के प्रमाण रखें और एक-दूसरे को पूरा बोलने दें।

चुनावी पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और आंदोलन के तरीकों जैसे विषयों पर चर्चा जनता को दोनों पक्षों का दृष्टिकोण समझने में मदद कर सकती है। लेकिन यदि मंच पर भी केवल नारे और आरोप दोहराए जाएं, तो उससे समझ बढ़ने के बजाय ध्रुवीकरण बढ़ेगा।

बहस की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि किसने अधिक तालियां बटोरीं। उसका मूल्य इस बात से तय होना चाहिए कि कौन-से प्रश्न स्पष्ट हुए, किन दावों की पुष्टि हुई और किस पक्ष ने अपनी गलती स्वीकार करने का साहस दिखाया।

जनजीवन और विरोध का संतुलन

भटनागर ने प्रदर्शनों से कारोबार प्रभावित होने और पुलिसकर्मियों के साथ कथित बदसलूकी की शिकायत भी की है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। केवल किसी पक्ष के बयान के आधार पर पूरे आंदोलन के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

फिर भी आंदोलन के दौरान आम नागरिकों की सुविधाओं का ध्यान रखना जरूरी है। व्यापारी, दैनिक मजदूर, विद्यार्थी और मरीज किसी राजनीतिक विवाद का बोझ अनावश्यक रूप से न उठाएं। आयोजकों और प्रशासन को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिसमें विरोध की आवाज भी सुनी जाए और आवश्यक सेवाएं भी सुचारु रहें।

असुविधा की आशंका को हर प्रदर्शन रोकने का स्थायी आधार बना देना समाधान नहीं है। उसी तरह आंदोलन के नाम पर हिंसा या दुर्व्यवहार को उचित नहीं ठहराया जा सकता। शिकायतों की निष्पक्ष जांच और शांतिपूर्ण नागरिकों की सुरक्षा—दोनों प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा होने चाहिए।

विश्वसनीयता की असली परीक्षा

भीड़ जुटा लेना किसी विचार की व्यापक स्वीकार्यता का अंतिम प्रमाण नहीं होता। किसी संगठन की पहचान समय के साथ उसके काम, आचरण और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता से बनती है। केवल दूसरे संगठन का विरोध स्थायी सार्वजनिक भूमिका का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।

‘लाल हिट जनता पार्टी’ को अपनी कार्ययोजना और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट करना होगा। सीजेपी के लिए भी अपने दावों, उद्देश्यों और आंदोलन के तरीकों के प्रति जवाबदेही जरूरी है। जनता को नारों के साथ ठोस उत्तर भी चाहिए।

इस घटनाक्रम का महत्व इस बात में है कि इससे सार्वजनिक बहस किस दिशा में जाती है। यदि दोनों पक्ष तथ्य और शांतिपूर्ण संवाद का रास्ता अपनाते हैं, तो मतभेद उपयोगी चर्चा में बदल सकते हैं। यदि मुकाबला अपमान, आरोपों और भीड़ जुटाने तक सीमित रहा, तो नागरिकों के वास्तविक प्रश्न पीछे छूट जाएंगे।

लोकतंत्र में विचार का उत्तर विचार, आरोप का उत्तर प्रमाण और विवाद का बेहतर समाधान संवाद है। सीजेपी हो या उसके विरोध में बना संगठन, दोनों की असली परीक्षा जनता के सामने अपनी विश्वसनीयता साबित करना है। विरोध और प्रतिरोध की स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब उसके साथ मानवीय गरिमा, जवाबदेही और जनहित का सम्मान भी जुड़ा हो।

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Author: Bharat Sarathi

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