युवाओं का सुरक्षित भविष्य, राष्ट्र की बुनियाद

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शिक्षा, रोजगार और सही मार्गदर्शन से ही राष्ट्रनिर्माण में सार्थक होगी युवाशक्ति की भागीदारी

चेतन चौहान

किसी भी राष्ट्र के विकास की कल्पना युवाओं की सक्रिय भागीदारी के बिना अधूरी है। उनकी वैचारिक ऊर्जा, रचनात्मकता और कार्यक्षमता समाज को नई दिशा दे सकती है। युवा केवल भविष्य की आशा नहीं, वर्तमान के निर्माण की शक्ति भी हैं। लेकिन इस शक्ति का सार्थक उपयोग तभी संभव है, जब उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार और अपनी प्रतिभा निखारने के पर्याप्त अवसर मिलें। इसलिए युवाओं का सुरक्षित और स्थिर भविष्य सुनिश्चित करना राष्ट्रनिर्माण की बुनियादी आवश्यकता है।

भारत की विशाल युवा आबादी उसकी बड़ी ताकत है। विज्ञान, तकनीक, खेल, उद्यमिता, कला और सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों में युवा अपनी क्षमता का परिचय देते रहे हैं। फिर भी अनेक युवाओं के सामने शिक्षा से रोजगार तक पहुंचने का रास्ता कठिन बना हुआ है। प्रतिभा और परिश्रम के बावजूद अवसर न मिलना उनके आत्मविश्वास को प्रभावित करता है। ऐसे में केवल युवाशक्ति का गुणगान करना पर्याप्त नहीं; उसके विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाना भी जरूरी है।

आकांक्षाओं और अवसरों के बीच दूरी

देश की आर्थिक प्रगति का वास्तविक महत्व तब है, जब उसका लाभ युवाओं के जीवन में दिखाई दे। पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार की अनिश्चितता, व्यावहारिक कौशल की कमी और अवसरों तक असमान पहुंच जैसी बाधाएं उनके सामने खड़ी होती हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के युवाओं के लिए यह संघर्ष और कठिन हो जाता है। उन्हें अपने सपनों के साथ परिवार की अपेक्षाओं और जिम्मेदारियों का बोझ भी उठाना पड़ता है।

बेरोजगारी केवल आय का प्रश्न नहीं है। इसका संबंध आत्मसम्मान, सामाजिक पहचान और भविष्य की सुरक्षा से भी है। लगातार असफलता या अनिश्चितता का सामना कर रहे युवाओं को दोष देने के बजाय उनकी परिस्थितियों को समझना आवश्यक है। परिवार, शिक्षण संस्थानों और समाज को ऐसा वातावरण बनाना चाहिए, जिसमें युवा अपनी परेशानी खुलकर साझा कर सकें और समय पर मार्गदर्शन तथा मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता प्राप्त कर सकें।

राजनीतिक भागीदारी हो सार्थक

युवाओं का राजनीति और सार्वजनिक जीवन में रुचि लेना स्वाभाविक है। लोकतंत्र को जागरूक, प्रश्न करने वाले और जिम्मेदार युवाओं की आवश्यकता होती है। छात्रसंघ तथा शैक्षणिक परिसरों में होने वाला विचार-विमर्श नेतृत्व क्षमता और लोकतांत्रिक चेतना विकसित कर सकता है। समस्या तब पैदा होती है, जब युवाओं की आकांक्षाओं का उपयोग केवल दलगत हितों के लिए किया जाए और शिक्षा, संवाद तथा स्वतंत्र चिंतन पीछे छूट जाएं।

शिक्षण संस्थानों में असहमति के सम्मान, तर्कपूर्ण बहस और सामाजिक जिम्मेदारी की संस्कृति विकसित होनी चाहिए। युवाओं को किसी विचार का अंधानुकरण करने के बजाय तथ्यों को परखने और अपना विवेक विकसित करने का अवसर मिलना चाहिए। राजनीतिक नेतृत्व का दायित्व भी है कि वह युवाओं को केवल समर्थक या भीड़ के रूप में न देखे, बल्कि नीति निर्माण और सार्वजनिक निर्णयों में उनकी सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करे।

मूल्यों के साथ पीढ़ियों का संवाद

बदलते सामाजिक परिवेश में युवाओं और पुरानी पीढ़ी के बीच अपेक्षाओं तथा जीवन-दृष्टि का अंतर दिखाई देना असामान्य नहीं है। लेकिन इस अंतर को संवाद से दूर करने के बजाय पूरी युवा पीढ़ी को संस्कारहीन या गैरजिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। अनेक युवा अपने परिवारों का सहारा बन रहे हैं, जरूरतमंदों की मदद कर रहे हैं और समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए काम कर रहे हैं।

आवश्यकता अनुभव और नई सोच के बीच सहयोग की है। पुरानी पीढ़ी युवाओं की आकांक्षाओं को समझे और युवा अपने बड़ों के अनुभव से सीखें। ईमानदारी, संवेदनशीलता, परिश्रम और सार्वजनिक संपत्ति के प्रति जिम्मेदारी जैसे मूल्य केवल उपदेश से नहीं, व्यवहार से मजबूत होते हैं। परिवार और समाज को भी अपने आचरण से इनका उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।

राष्ट्र के प्रति समर्पण का अर्थ अपने कार्य को ईमानदारी से करना, संविधान और कानून का सम्मान करना, विविधता को स्वीकार करना तथा समाज के कमजोर लोगों के प्रति संवेदनशील रहना भी है। युवाओं को ऐसी व्यापक नागरिक चेतना से जोड़ना राष्ट्रनिर्माण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

नशे से बचाव, प्रतिभा को अवसर

नशे और दूसरी हानिकारक आदतों की चपेट में आने वाले युवाओं को समय रहते सहायता मिलनी चाहिए। इस चुनौती का समाधान केवल डांट, दंड या सामाजिक बहिष्कार में नहीं है। जागरूकता, परामर्श, उपचार और पुनर्वास के साथ खेल, कला तथा रचनात्मक गतिविधियों के अवसर भी आवश्यक हैं। बच्चों और किशोरों के लिए सुरक्षित तथा सहयोगपूर्ण वातावरण बनाना परिवार, विद्यालय और प्रशासन की साझा जिम्मेदारी है।

युवा सशक्तीकरण का अर्थ केवल योजनाओं की घोषणा करना नहीं है। उसका मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि युवाओं को वास्तव में क्या अवसर मिले और उनका जीवन कितना बेहतर हुआ। शिक्षा को व्यावहारिक कौशल से जोड़ना, करियर संबंधी मार्गदर्शन उपलब्ध कराना, भर्ती प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाना और स्वरोजगार के इच्छुक युवाओं को प्रशिक्षण तथा वित्तीय सहायता देना जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों के युवाओं तक भी ये अवसर पहुंचने चाहिए।

साझा जिम्मेदारी से बनेगा भविष्य

युवाओं की अपनी भूमिका भी महत्वपूर्ण है। निरंतर सीखने, बदलती तकनीक को समझने, अनुशासन बनाए रखने और सामाजिक जिम्मेदारियां निभाने की इच्छाशक्ति उन्हें आगे बढ़ाती है। सफल युवाओं की उपलब्धियां प्रेरणा बन सकती हैं, लेकिन हर व्यक्ति की परिस्थितियां और अवसर अलग होते हैं। इसलिए तुलना का दबाव बढ़ाने के बजाय प्रत्येक युवा की क्षमता पहचानना और उसे आगे बढ़ने में सहयोग देना अधिक उपयोगी होगा।

इक्कीसवीं सदी का भारत युवाओं से बड़े बदलाव की उम्मीद रखता है। इन उम्मीदों को पूरा करने के लिए युवाओं पर जिम्मेदारियां डालने के साथ उनके अधिकारों, अवसरों और भविष्य की सुरक्षा पर भी ध्यान देना होगा। सरकार, शिक्षण संस्थान, उद्योग, परिवार और युवा—सभी को अपनी भूमिका निभानी होगी। युवाशक्ति को सही दिशा तभी मिलेगी, जब उसके सपनों को सम्मान और प्रयासों को अवसर मिलेगा। सुरक्षित, स्वावलंबी और जागरूक युवा पीढ़ी ही सशक्त राष्ट्र की सबसे मजबूत बुनियाद बन सकती है।

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Author: Bharat Sarathi

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